बिना किसी बुनियादी सिविल फैसले के Criminal Proceeding जारी रखना न्याय का उल्लंघन और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्रिमिनल प्रोसीडिंग के साथ एससी एसटी एक्ट की कार्रवाई को रद किया

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि है कि विवाद मुख्य रूप से सिविल और राजस्व प्रकृति का हो, Criminal Proceeding दो दशक से ज्यादा समय की देरी के बाद शुरू की गई हो और एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों को अनिवार्य कानूनी शर्तों को पूरा किए बिना लागू किया गया हो तथा बिना किसी बुनियादी सिविल फैसले के शुरू की गई हो, वहां Criminal Proceeding जारी रखने से न्याय का उल्लंघन होगा और यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग भी होगा.
इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस शेखर कुमार यादव ने Criminal Proceeding स्वीकार करते हुए स्पेशल जज (एससी/एसटी), गौतम बुद्ध नगर द्वारा सेशन ट्रायल नंबर 364/2023 (राज्य बनाम मालू और अन्य) में 20 मार्च 2023 पारित संज्ञान/समन आदेश, चार्जशीट/पूरक चार्जशीट और केस क्राइम नंबर 280/2022 से उत्पन्न होने वाली पूरी Criminal Proceeding (आपराधिक कार्यवाही) धारा 420, 467, 468, 471, 384, 120-B IPC और SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(f) को रद कर दिया है.
यह मामला बेसिकली गौतम बुद्ध नगर जिले के थाना दादरी का है. हाई कोर्ट में केस दाखिल करके अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 14-A(1) के तहत आपराधिक अपील विशेष न्यायाधीश, गौतम बुद्ध नगर द्वारा सत्र परीक्षण संख्या 364/2023 (राज्य बनाम मालू और अन्य) में पारित समन आदेश की चार्जशीट और केस क्राइम नंबर 280/2022 से उत्पन्न होने वाली पूरी Criminal Proceeding (आपराधिक कार्यवाही) को चुनौती देते हुए दाखिल किया गया था.
राजस्व निरीक्षक पंकज निरवाल द्वारा दर्ज करायी गयी एफआईआर में गांव चिताहेड़ा, तहसील दादरी की कृषि भूमि के आवंटन और बाद में हस्तांतरण में कथित अनियमितताओं के संबंध में आरोप लगाए गए. कहा गया कि वर्ष 1997 में, सक्षम प्राधिकारी द्वारा लगभग 282 व्यक्तियों को कृषि भूमि के पट्टे/लीज दिए गए थे. बाद में शिकायतें मिलीं कि कुछ आवंटी अपात्र थे और आवंटित भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में हेरफेर और जाली दस्तावेजों के माध्यम से बिक्री विलेख निष्पादित करके निजी व्यक्तियों को हस्तांतरित कर दिया गया.
कुछ व्यक्तियों ने दूसरों के साथ मिलीभगत करके राजस्व प्रविष्टियों में जालसाजी की, भूमि क्षेत्र में वृद्धि दिखाई और वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए भूमि हस्तांतरित की, जिससे राज्य के खजाने को नुकसान और लाभार्थियों को लाभ हुआ. कुछ मामलों में अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों के लिए तय जमीन को कानून के खिलाफ जाकर हड़प लिया गया. जिसके कारण एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(f) के साथ-साथ आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 384 और 120-B के तहत अपराध दर्ज किए गए.
एफआईआर मुख्य रूप से पुराने राजस्व रिकॉर्ड और दो दशक से भी पहले किए गए भूमि आवंटन से संबंधित पूछताछ पर आधारित थी और आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ आरोप मोटे तौर पर लिखे गए. प्रत्येक आरोपी पर विशिष्ट खुले कृत्य, तारीखें या व्यक्तिगत लेनदेन का आरोप नहीं लगाया गया. यह विवाद मूल रूप से कई वर्षों तक चले भूमि लेनदेन पर कथित नागरिक और राजस्व अनियमितताओं से उत्पन्न हुआ.

अपीलकर्ता के वकील का कहना था कि विवादित संज्ञान/समन आदेश और चार्जशीट के साथ केस क्राइम नंबर 280 ऑफ 2022 से उत्पन्न होने वाली पूरी कार्यवाही (Criminal Proceeding) स्पष्ट रूप से अवैध है और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है.
03 जुलाई 2022 को दर्ज की गई पहली सूचना रिपोर्ट में अपीलकर्ता का नाम भी नहीं था. अपीलकर्ता को बिना किसी ठोस सबूत के बाद के चरण में आपराधिक कार्यवाही में फंसाया गया है, जो उसे झूठा फंसाने के दुर्भावनापूर्ण इरादे को दर्शाता है.
आरोप गांव चिताहेरा की पट्टे की भूमि से संबंधित लेनदेन से संबंधित हैं जो CRLA No. 11855 of 2025 2 1997 के हैं, जो कई न्यायिक कार्यवाही के अधीन थे और अंततः सक्षम राजस्व न्यायालयों द्वारा मान्य किए गए थे. तर्क दिया गया कि मामले में की गई जांच में गंभीर अनियमितताएं हैं.
चार्जशीट में शामिल पांच गवाहों की जांच शुरू होने से कई साल पहले मृत्यु हो गई थी. जांच इतनी दोषपूर्ण, अनुचित और पक्षपातपूर्ण है कि मामले को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और न्याय का गर्भपात होगा. जांच अधिकारी मृत व्यक्तियों के बयान दर्ज नहीं कर सकते थे, फिर भी इन व्यक्तियों को अभियोजन पक्ष के गवाहों के रूप में दिखाया गया है.
पहले शिकायतकर्ता ने सेक्शन 161 Cr PC के तहत दर्ज अपने बयानों में कथित अपराधों के आधार बनने वाले जरूरी तथ्यों के बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञता दिखाई और सिर्फ यह कहा कि लीज डीड के आवंटन की कार्यवाही में पूरे रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, जो यह दर्शाता है कि FIR कथित आपराधिक कृत्यों की व्यक्तिगत जानकारी के बिना यांत्रिक रूप से दर्ज की गई थी.
विवाद वर्ष 1997 में किए गए भूमि आवंटन और बाद की राजस्व कार्यवाही से उत्पन्न होता है, और यह अनिवार्य रूप से नागरिक और राजस्व प्रकृति का है. आपराधिक कानून को दो दशकों से अधिक की अत्यधिक देरी के बाद गति में लाया गया है.
विशुद्ध रूप से नागरिक विवाद से उत्पन्न होने वाली Criminal Proceeding को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग
आनंद कुमार मोहता बनाम स्टेट (NCT ऑफ दिल्ली), (2019) 11 SCC 706 पर भरोसा किया गया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना कि विशुद्ध रूप से नागरिक विवाद से उत्पन्न होने वाली आपराधिक कार्यवाही (Criminal Proceeding) को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और संज्ञान के चरण में भी हस्तक्षेप का हकदार है.
सरकारी अधिवक्ता ने अपील का विरोध किया और कहा कि विचाराधीन संज्ञान आदेश में विशेष न्यायाधीश द्वारा उचित विचार-विमर्श किया गया है, जिन्होंने चार्जशीट और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखने के बाद आरोपी व्यक्ति के खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त आधार पाए.
आदेश में कोई क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि या विकृति नहीं है जिसके लिए अपीलीय क्षेत्राधिकार के तहत हस्तक्षेप की आवश्यकता हो. न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार और रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद यह फैसला सुनाया है.