हाई कोर्ट का जज पाता है कि Article 226 के तहत दायर याचिका आदर्श रूप से Article 227 के तहत दायर किया जाना चाहिए था तो वह उस पर सुनवाई और फैसला नहीं कर सकता

अगर हाई कोर्ट के जज को उसके चीफ जस्टिस द्वारा Article 226 के तहत याचिकाएं सुनने और फैसला करने के लिए सौंपी गई हैं और वह पाता है कि Article 226 के तहत दायर याचिका को आदर्श रूप से Article 227 के तहत दायर किया जाना चाहिए था, तो वह याचिका को Article 227 के तहत नहीं मान सकता और उस पर सुनवाई और फैसला नहीं कर सकता. यह तब संभव है जब चीफ जस्टिस उस जज को संविधान के Article 227 के तहत याचिकाएं सुनने और फैसला करने का काम सौपें.
अगर ऐसा नहीं सौंपा गया है, तो जज अपने विवेक से याचिका को Article 227 के तहत मानने का निर्देश दे सकते हैं ताकि इसे संबंधित जज के सामने रखा जा सके. इसके साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस चन्द्रधारी सिंह और जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला ने रिट याचिका खारिज कर दी है. बेंच ने संज्ञान आदेश को रद्द करने के लिए उचित अदालतों के समक्ष आवेदन या याचिका दायर करने की स्वतंत्रता दी है.
यह याचिका गौतमबुद्ध् नगर के संजय वाही की तरफ से दाखिल की गयी थी. इसमें ग्रेटर नोएड के थाना बीटा 2 में धारा 420, 406, 467, 468, 471, 120-B, 504, 507 IPC के तहत दर्ज मुकदमे को रद करने, एफआईआर के संबंध में याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दण्डात्मक कार्रवाई न करने के साथ ही राज्य बनाम संजय वाही केस में संज्ञान/समन आदेश को रद करने की मांग की गयी थी.
अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता एक साथ व्यापार कर रहे थे. 2018-19 की अवधि के बीच याचिकाकर्ता ने जमीन का एक टुकड़ा खरीदने का फैसला किया. प्रतिवादी दीपिका गुप्ता उस जमीन के टुकड़े में निवेश करने में दिलचस्पी रखती थीं. उन्होंने याचिकाकर्ता के साथ एक पार्टनरशिप एग्रीमेंट किया. 2019 में उक्त जमीन की खरीद के लिए समझौता किया गया. 2020 में याचिकाकर्ता ने एक सुनीत कोहली के साथ भी एक पार्टनरशिप एग्रीमेंट किया. 2024 में शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता को फोन किया और उसे नोएडा स्थित अपने घर बुलाया. यहां दीपिका गुप्ता और परिवार के अन्य सदस्यों ने याचिकाकर्ता के साथ दुर्व्यवहार किया और धमकी दी.
आरोप है कि शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी दीपिका गुप्ता ने याचिकाकर्ता से जबरदस्ती दो चेक पर हस्ताक्षर करवाए जिस पर 17.50 करोड़ रुपये की धनराशि अंकित थी. घटना के अगले दिन याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी के खिलाफ मारपीट, गलत तरीके से रोकने, जबरन हस्ताक्षर करवाने और 17,50,00,000 रुपये के चेक पर कब्जा करने की पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. इसके बाद शिकायतकर्ता प्रतिवादी नंबर 2 ने याचिकाकर्ता और अन्य के खिलाफ धारा 156(3) Cr.PC के तहत आवेदन दायर किया था.
अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-II, गौतम बुद्ध नगर की अदालत ने 156(3) के तहत आवेदन को स्वीकार कर लिया और FIR दर्ज करने का निर्देश दिया. इसके बाद याचिकाकर्ता और चार अन्य के खिलाफ धारा 420, 406, 467, 468, 471, 120-B, 504 और 507 IPC के तहत केस दर्ज किया गया.

याचिकाकर्ता ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, गौतम बुद्ध नगर की अदालत में अग्रिम जमानत याचिका दायर की जो खारिज कर दी गयी. इसके बाद इलाहाबाद हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत याचिका दायर की गयी, जिसमें, अदालत ने विवाद को निपटाने के लिए मामले को मध्यस्थता और सुलह केंद्र को भेजने का निर्देश दिया.
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि उनकी एकमात्र शिकायत प्रोजेक्ट से कमाए गए कथित लाभ को साझा करने से संबंधित थी, जो स्पष्ट रूप से इसे एक सिविल विवाद बनाता है, जिसमें अनुबंध करने वाले पक्षों के अधिकारों और देनदारियों का फैसला किया जाना चाहिए था. दलील दी गई कि शिकायतकर्ता की अन्य शिकायतें यह थीं कि याचिकाकर्ता को सुनील कोहली के साथ कोई साझेदारी समझौता नहीं करना चाहिए था, जब उसकी शिकायतकर्ता की पत्नी के साथ एक विशेष साझेदारी थी.
एडवोकेट ने दलील दी कि ऐसा कोई स्पष्ट कानून नहीं है जो किसी एक पक्ष को कई साझेदारी समझौतों में शामिल होने से रोकता हो. यदि इन सभी आरोपों को सच मान लिया जाए, तो यह केवल अनुबंध का उल्लंघन है, जिसका निपटारा या तो मध्यस्थता या सिविल मुकदमे के माध्यम से किया जाएगा.
दलील दी कि सिविल विवाद/देनदारियों को निपटाने के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली का दुरुपयोग करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. विवादित प्रथम सूचना रिपोर्ट कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है. याचिकाकर्ता के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण मुकदमा केवल पक्षों के बीच सिविल प्रकृति के गंभीर विवादों के कारण व्यक्तिगत हिसाब चुकाने के लिए दायर किया गया है.
न्यायालय को यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता और शिकायतकर्ता की पत्नी के बीच साझेदारी समझौते में एक स्पष्ट मध्यस्थता खंड है जिसका उपयोग लाभ साझा करने के संबंध में किसी भी विवाद के मामले में किया जाना चाहिए.
क्या यह न्यायालय भारत के संविधान के Article 226 के तहत क्षेत्राधिकार में संबंधित मजिस्ट्रेट के समन या संज्ञान आदेश को रद्द कर सकता है
वकीलों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों को परखने के बाद कोर्ट ने कहा कि यह एक स्वीकृत तथ्य है कि जांच पूरी होने के बाद, संबंधित न्यायालय में आरोप पत्र दायर किया गया है और आरोप पत्र के साथ सामग्री पर विचार करने के बाद, संबंधित न्यायालय ने संज्ञान लेने के लिए प्रथम दृष्टया मामला पाया और संज्ञान लिया. मुख्य रूप से, यह रिट याचिका एफआईआर को रद्द करने के लिए दायर की गई थी, लेकिन याचिका लंबित रहने के दौरान आरोप पत्र दायर किया गया तो रिट याचिका में संशोधन के लिए एक आवेदन किया तो समन्वय पीठ ने इसकी अनुमति भी दे दी.
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के साथ-साथ प्रतिवादियों के विद्वान वकील द्वारा उठाए गए तर्कों पर विचार करने के बाद, तय किया जाने वाला मुख्य प्रश्न यह है कि “क्या यह न्यायालय भारत के संविधान के Article 226 के तहत क्षेत्राधिकार में संबंधित मजिस्ट्रेट के समन या संज्ञान आदेश को रद्द कर सकता है?”

कोर्ट ने कोर्ट किया कि “सुप्रीम कोर्ट ने राधे श्याम और अन्य बनाम छबी नाथ और अन्य (2015) 5 SCC 423 में माना है कि न्यायिक आदेश संविधान के Article 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार के लिए सामान्य रूप से उत्तरदायी नहीं हैं और यह स्पष्ट किया है कि संविधान के Article 227 के तहत पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार के साथ-साथ धारा 482 Cr.PC के तहत अंतर्निहित क्षेत्राधिकार ऐसे मामलों में उचित मंच है.
यहां तक कि मेसर्स पेप्सी फूड्स लिमिटेड और अन्य बनाम विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट और अन्य (1998) 5 SCC 749 के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि उच्च न्यायालय भारत के संविधान के Article 226 या धारा 482 Cr PC के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने के लिए कर सकते हैं जहां प्रक्रिया का दुरुपयोग स्पष्ट है.
हालांकि, प्रज्ञा प्रांजल कुलकर्णी बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य 2025 SCC OnLine SC 1948 में नवीनतम फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां याचिका दोहरे क्षेत्राधिकार का आह्वान करती है, एक संविधान के Article 226 के तहत और दूसरा धारा 482 Cr PC के तहत, जो अब धारा 528 BNSS के बराबर है, हाई कोर्ट के पास संज्ञान लेने के बाद भी एफआईआर/चार्जशीट को रद्द करने का अधिकार क्षेत्र बना रहता है, बशर्ते याचिका में दलीलों को सही तरीके से शामिल किया गया हो, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर रोस्टर इसकी अनुमति देता है.
इस कोर्ट के पास भारत के संविधान के Article 226 के तहत ही अधिकार क्षेत्र है. रोस्टर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस द्वारा तैयार किया जाता है और किसी भी कोर्ट द्वारा इसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता. रोस्टर सिस्टम संवैधानिक परंपरा और इस कोर्ट / सुप्रीम कोर्ट के नियमों पर आधारित है.
Criminal Misc. Writ Petition No. 18905 of 2025; Sanjay Wahi Versus State of U.P. and 3 Others