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किसी को Arrest सिर्फ इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि पुलिस के लिए ऐसा करना कानूनी है, पीड़ित को 1 लाख मुआवजा देने का आदेश

किसी को Arrest सिर्फ इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि पुलिस के लिए ऐसा करना कानूनी है, पीड़ित को 1 लाख मुआवजा देने का आदेश

किसी को Arrest सिर्फ इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि पुलिस के लिए ऐसा करना कानूनी है. पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी (Arrest) को कानूनी प्रावधानों के आधार पर सही ठहराना होगा न कि सिर्फ अपनी शक्ति के आधार पर. जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाये गये फैसले में लिखी गयी उपरोक्त पंक्तियों पर भरोसा करते हुए हाईकोर्ट के जस्टिस अरिंदम सिनहा और सत्यवीर सिंह की बेंच ने गोरखपुर में सुनील कंडू उर्फ सुनील कुमार गुप्ता की गिरफ्तारी (Arrest)  को पुलिस की लापरवाही भरी कार्रवाई बताया. कोर्ट ने उसे मुआवजे के रूप में एक लाख रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है.

दो जजों की बेंच मानवाधिकार आयोग में बिना वजह देरी से सम्पर्क करने के आधार पर याचिका खारिज करने की मांग को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि याची के खिलाफ आपराधिक मामला 14 जुलाई 2022 को निपटा दिया गया. इसके एक साल से भी कम समय बाद याची ने मानवाधिकार आयोग से संपर्क किया. इसे अनावश्यक देरी नहीं माना जा सकता.

यह मानते हुए कि उसकी गिरफ्तारी (Arrest)  कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार नहीं थी बेंच ने 1 लाख रुपये का मुआवजा देने के आदेश को उचित बताया. बेंच ने कहा कि गिरफ्तार (Arrest)  करने वाले पुलिस कर्मियों की मनमानी और लापरवाही वाली कार्रवाई से याचिकाकर्ता के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है और वह उस कृत्य का एक असहाय शिकार था.

बता दें कि गोरखपुर में 30 मार्च 2017 को एक शिकायत दर्ज करायी गयी. इसमें कथित तौर पर हुई एक घटना का जिक्र किया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि पीड़िता पर हमला किया गया. विरोध करने पर पीड़िता की गर्दन दबाने की कोशिश की गयी. उसके गाल पर काटा गया. शिकायतकर्ता का कहना था कि आरोपित ने पहले उसे मदद की पेशकश की थी.

बाद में उसकी नीयत खराब हो गयी और उसने छेड़छाड़ शुरू कर दी और बलात्कार का प्रयास किया. उसके शोर मचाने पर राहगीरों ने उसे बचाया. बता दें कि तहरीर के आधार पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया तब किसी को नामजद नहीं किया गया था.

याचिकाकर्ता को लखनऊ से Arrest  किया

प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के बाद इस पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने घटना के दो हफ्ते से ज्यादा समय बाद 17 अप्रैल 2017 को याचिकाकर्ता को लखनऊ से गिरफ्तार (Arrest)  किया. उसे जमानत मिलने से पहले 79 दिनों तक हिरासत में रहना पड़ा. इस बीच पुलिस की जांच जारी रही. जांच के दौरान सामने आया कि घटना के दिन याचिकाकर्ता गोरखपुर में मौजूद ही नहीं था. उधर की केस की प्रोसीडिंग के दौरान शिकायतकर्ता को बार-बार नोटिस जारी करके पेश होने के लिए कहा गया लेकिन उसकी तरफ से कोई रिस्पांस नहीं दिया गया. इसके बाद 2022 में आपराधिक मामला खत्म कर दिया गया.

बेंच ने कहा कि CrPC की धारा 41(1)(ba) (जो अब रद्द हो चुकी है) के तहत पुलिस अधिकारी बिना वारंट के तभी गिरफ्तार (Arrest)  कर सकता है, जब जानकारी विश्वसनीय हो और अधिकारी के पास यह मानने का कारण हो कि उस व्यक्ति ने अपराध किया है. कोर्ट ने पुलिस के बयान में कई बड़ी कमियां भी देखीं. एफआईआर और बयानों में आरोप लगाया गया कि हमलावर ने पीड़िता की गर्दन पकड़ी और उसके गाल पर काटा जबकि पुलिस मेडिको लीगल रिपोर्ट में इन खास आरोपों की पुष्टि करने के लिए चोट का कोई निशान नहीं दिखा.

छेड़छाड़ और बलात्कार के प्रयास के मामले में बरी होने के बाद याचिकाकर्ता ने मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 18 (a) (i) के तहत गलत गिरफ्तारी (Arrest)  और हिरासत के लिए मुआवजे की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की. याचिकाकर्ता ने पहले मानवाधिकार आयोग से शिकायत की थी. इस शिकायत के आधार पर संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच की गयी और दोषी पाये जाने पर उन्हें दण्डित भी किया गया. सुनवाई के दौरान बेंच को इन तथ्यों से अवगत कराया गया.

मुआवजे की मांग में दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि मानवाधिकार आयोग याचिकाकर्ता द्वारा दायर शिकायत पर विचार नहीं कर सकता क्योंकि यह मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 36 में निर्धारित समय के बाद दायर की गई. बेंच ने स्टेट की तरफ से दिये गये इस तर्क को अस्वीकार कर दिया. मामले के तथ्यों की जांच करने पर बेंच संतुष्ट थी कि पुलिस के पास विश्वसनीय जानकारी नहीं थी, इसलिए उसके पास यह मानने का कोई कारण नहीं था कि याचिकाकर्ता ने कथित अपराध किया. 

“रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है और न ही हमारे सामने ऐसा कुछ पेश किया गया, जिससे यह पता चले कि मिली जानकारी के आधार पर कोई जांच की गई हो, जिससे यह मानने का कारण हो कि याचिकाकर्ता ने उक्त अपराध किया.”
बेंच ने आदेश में कहा

“किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी (Arrest)  और पुलिस लॉक-अप में हिरासत से उसकी इज्जत और आत्म-सम्मान को बहुत नुकसान हो सकता है. किसी व्यक्ति पर अपराध करने के सिर्फ आरोप के आधार पर रूटीन तरीके से गिरफ्तारी (Arrest)  नहीं की जा सकती (2011) 14 SCC 481.

एक पुलिस अधिकारी के लिए नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा के हित में और शायद अपने खुद के हित में भी, यह समझदारी होगी कि किसी शिकायत की सच्चाई और ईमानदारी के बारे में कुछ जांच के बाद उचित संतुष्टि के बिना कोई गिरफ्तारी न की जाए और व्यक्ति की मिलीभगत और गिरफ्तारी की जरूरत दोनों के बारे में उचित विश्वास होना चाहिए. किसी व्यक्ति की आजादी छीनना एक गंभीर मामला है.”
बेंच ने टिप्पणी की

Sunil Kandu @ Sunil Kumar Gupta vs. Secretary, Ministry Of Home Affairs And 2 Others

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