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Application में तथ्य सही तो गलती चेक करके उसे रिजेक्ट करना रिक्रूटमेंट एजेंसी का काम, आवेदक हेराफेरी या धोखाधड़ी का दोषी नहीं, 7 साल बाद बर्खास्गी का फैसला रद

इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच ने सिंगल बेंच और बीएसए मुरादाबाद का आदेश किया रद, कर्मचारी को ड्यूटी पर रखने का आदेश

Application में तथ्य सही तो गलती चेक करके उसे रिजेक्ट करना रिक्रूटमेंट एजेंसी का काम, आवेदक हेराफेरी या धोखाधड़ी का दोषी नहीं, 7 साल बाद बर्खास्गी का फैसला रद

नियुक्ति के लिए Application भरते समय आवेदनकर्ता ने कोई गलत सूचना नहीं दी. रजिस्ट्रेशन Application को न सिर्फ एक्सेप्ट किया गया बल्कि ई चालान भी जेनरेट किया गया. इसके बाद आवेदनकर्ता ने फीस जमा की और नियुक्ति प्रकिया में शामिल हुई. इसमें आवेदनकर्ता की कोई गलती नहीं है. यह चूक नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने में लगे अफसरों से हुई थी. इसके बाद आवेदनकर्ता को नौकरी पर रख लिया गया. ऐसे मामले में आवेदनकर्ता का सात साल क काम करते रहना, उसकी चूक नहीं मानी जा सकती है.

इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस इन्द्रजीत शुक्ला और जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह की बेंच ने बेसिक शिक्षा अधिकारी मुरादाबाद द्वारा दिये गये आदेश और इसे लेकर हाई कोर्ट की सिंगल बेंच द्वारा दिये गये फैसले को रद कर दिया है. बेंच ने आवेदनकर्ता को नौकरी में बरकरार रखने का आदेश दिया है.

यह शर्त जरूर लगायी है कि पीलकर्ता को संबंधित पद पर बने रहने की अनुमति दी जाएगी, लेकिन उसे उस अवधि के लिए वेतन का भुगतान नहीं किया जाएगा जब उसने अपनी ड्यूटी नहीं की/सेवा से बाहर रही. बता दें कि इस मामले की सुनवाई डबल बेंच के सामने 8 जनवरी 2026 को पूरी हो जाने के बाद फैसला रिजर्व कर लिया गया था. इसे 27 जनवरी को सुनाया गया.

यह रिट याचिका मुरादाबाद की अनीता रानी की ओर से दाखिल की गयी थी. याचिकाकर्ता ने 2012 को स्पेशल बीटीसी ट्रेनिंग कोर्स पूरा किया. जरूरी योग्यता हासिल करने के लिए उसे टीईटी भी पास करना अनिवार्य था. यह भी उसने पास कर लिया था. इस बीच उसकी उम्र निकल गयी थी. याचिकाकर्ता अनुसूचित जाति की उम्मीदवार थी तो उसने 2014 में निकली भर्ती के लिए आवेदन (Application) कर दिया. Application के समय वह 45 वर्ष की आयु सीमा पार कर चुकी थी.

इसके बाद भी न सिर्फ उसका Application स्वीकार किया गया बल्कि उस पर ई चालान भी जेनरेट हुआ. फीस जमा करके याचिकाकर्ता चयन प्रक्रिया में शामिल हुई और उसका सेलेक्शन भी हो गया. 2016 में नियुक्ति दी गयी तब वह 50 साल की अधिकतम आयु सीमा पार कर ली थी.

याचिकाकर्ता को दिसंबर 2017 में एक नोटिस जारी किया गया जिसमें उससे यह स्पष्टीकरण देने के लिए कहा गया कि चूंकि अपीलकर्ता ने नियुक्ति की तारीख को पचास वर्ष से अधिक की आयु पूरी कर ली थी, इसलिए उसकी नियुक्ति रद्द की जा सकती है. उक्त नोटिस का जवाब दाखिल किया गया. इसके बाद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी मुरादाबाद द्वारा 28 अक्टूबर 2023 को दिये गये आदेश के माध्यम से अपीलकर्ता की नियुक्ति को शुरू से ही अमान्य घोषित कर दिया गया.

बीएसए के इस आदेश को याचिकाकर्ता ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में रिट ए के जरिए सिंगल बेंच के सामने चैलेंज किया. सिंगल बेंच ने रिट-ए नंबर 19644 ऑफ 2023 में दोनों पक्षों की ओर से पेश किये गये तथ्यों को परखने के बाद सुनवाई के बाद नियुक्ति को शुरू से ही अमान्य किये जाने के बीएसए के फैसले को सही ठहराया और याचिका खारिज कर दी. इसके बाद याचिकाकर्ता ने स्पेशल अपील दाखिल की. इस अपील में डबल बेंच के सामने बीएसए के आदेश और सिंगल बेंच द्वारा दिये गये निर्णय को चुनौती दी गयी ​थी.

अपीलकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि वह आरक्षित श्रेणी (अनुसूचित जाति) की उम्मीदवार है और उसके लिए ऊपरी आयु सीमा में 5 साल की छूट है. वह 45 साल की उम्र तक संबंधित पद के लिए आवेदन कर सकती थी.

यदि 1981 के नियमों के नियम 6 के तीसरे प्रोविजो के तहत 2 साल 6 महीने 21 दिन की और छूट दी जाती है, तब भी अधिकतम अनुमत आयु सीमा 47 साल 6 महीने 21 दिन होगी, जबकि अपीलकर्ता अपने आवेदन पत्र जमा करने की तारीख को 48 साल 7 महीने और 8 दिन की थी. आवेदन जमा करने की तारीख को आयु सीमा से अधिक थी, जिससे वह संबंधित पद के लिए आवेदन करने के अयोग्य हो गई, फिर भी, यह दिन के उजाले की तरह स्पष्ट है कि प्रतिवादी अधिकारियों ने खुली आँखों से Application स्वीकार किया और नियुक्ति की पेशकश की.

नौकरी पाने के लिए Application को कोई धोखाधड़ी वाला कार्य नहीं कहा जा सकता

दलील दी गई है कि नौकरी पाने के लिए आवेदन (Application) करने के प्रयास को कोई धोखाधड़ी वाला कार्य नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह स्वीकार किया गया है कि Application में जन्म की सही तारीख बताई गई थी और अपीलकर्ता की ओर से कुछ भी नहीं छिपाया गया था.

यह अधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि वे सतर्क रहें, जिसमें वे पूरी तरह विफल रहे. Application के जवाब में न केवल पंजीकरण स्वीकार किया गया बल्कि ई-चालान भी जेनरेट किया गया जिससे अपीलकर्ता को आवश्यक परीक्षा शुल्क जमा करने की अनुमति मिली. इसके बाद अपॉइंटमेंट दिया गया.

याचिकाकर्ता के वकील ने जोर देकर कहा कि प्रतिवादियों को इतनी देरी से यानी 7 साल से ज्यादा समय बीत जाने के बाद नियुक्ति रद्द करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. बता दें कि नियुक्ति 2 जुलाई, 2016 को हुई थी और बर्खास्तगी का आदेश 28.10.2023 को पारित किया गया है.

अपीलकर्ता के वकील ने नियुक्ति को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के राधेश्याम यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य के मामले में दिए गए फैसले के पैराग्राफ नंबर 26 और 27 पर विशेष रूप से भरोसा किया है, जो (2024) 11 SCC 770 में रिपोर्ट किया गया है, जिसमें अपीलकर्ता की 6 साल की सेवा के बाद उसकी नियुक्ति को बचा लिया गया था क्योंकि यह धोखाधड़ी और गलतबयानी का नतीजा नहीं था.

यह स्वीकार किया जाता है कि इस मामले में प्रतिवादी बोर्ड द्वारा उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के मामले में की गई गलती का श्रेय अपीलकर्ताओं को नहीं दिया जा सकता क्योंकि उन्हें पहली मेरिट सूची के संबंध में नियुक्त होने में कोई धोखाधड़ी या गलतबयानी करते हुए नहीं पाया गया है और न ही गलत मॉडल उत्तर कुंजी तैयार करने या गलत परिणाम में उनका कोई योगदान है. यदि इसके विपरीत होता, तो पुनर्मूल्यांकन पर उन्हें हटाने का औचित्य होता और उनकी सेवा की अवधि की परवाह किए बिना इस न्यायालय से उन्हें कोई सहानुभूति नहीं मिलती.
राधेश्याम यादव मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पैराग्राफ नंबर 27

SPECIAL APPEAL NO.-646 of 2025;  Anita Rani  Versus State of U.P. and 4 Others

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