अच्छे इरादे वाले नेक विचार भी तब विफल हो जाते हैं जब वे खराब Administrators के हाथों में पड़ते हैं: इलाहाबाद हाई कोर्ट
गैंगस्टर एक्ट और कमिश्नरेट प्रणाली पर हाईकोर्ट सख्त, अपर मुख्य सचिव गृह को कारण बताओ नोटिस जारी

सबसे अच्छे इरादे वाले और स्पष्ट रूप से नेक विचार भी तब विफल हो जाते हैं जब वे खराब Administrators के हाथों में पड़ते हैं. यानी, जो Administrators अपर्याप्त रूप से प्रशिक्षित हैं और संस्थागत क्षमता की कमी है, फिर भी अत्यधिक महत्वाकांक्षी हैं और संवैधानिक अधिकारियों को संभालने में माहिर हैं. पारंपरिक नौकरशाही (Administrators) नैतिकता की एक मौलिक कमी यह है कि यह नैतिकता को प्रशासन के दिन-प्रतिदिन के अभ्यास से बाहरी चीज के रूप में मानती है, न कि निर्णय लेने के एक अभिन्न अंग के रूप में.
इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गैंगस्टर एक्ट लगाये जाने के लिए कमिश्नरेट प्रणाली वाले शहरों में डीएम की राय न लिये जाने के प्रकरण पर सुनवाई करते हुए एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) को कारण बताओ नोटिस जारी करके पूछा है कि कोर्ट के आदेश का अनुपालन करने में कोई कानूनी रुकावट है तो उसका खुलासा करें. उन्हें यह स्पष्ट करने के लिए कहा गया है कि किन कारणों की वजह से होम डिपार्टमेंट बार-बार इस कोर्ट द्वारा समय-समय पर दिए गए आदेशों के अनुसार मांगी गई खास और सटीक जानकारी देने में नाकाम रहा है. प्रकरण में अगली सुनवाई 20 जनवरी को होगी.
सुनवाई के दौरान जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने कहा कि सरकार की विधायी शाखा द्वारा सिविल सेवकों को दिया गया विवेक सख्ती से कानून के तहत नीति और उद्देश्य को आगे बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाना है. किसी भी राजपत्र अधिसूचना की नीति और उद्देश्य का पता यूपी गैंगस्टर्स एक्ट को समग्र रूप से समझकर लगाया जाना चाहिए. न्यायालयों को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करने के अपने अधिकारों को फिर से स्थापित करने में कोई कठिनाई नहीं हुई है जहां प्रशासनिक (Administrators) निर्णय तर्कहीन, अपमानजनक और मनमाने हैं.
यह मामला शुरू में 22.02.2025 को सूचीबद्ध किया गया था. इस दिन आवेदकों के वकील ने आवेदकों के खिलाफ उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1986 के प्रावधानों को लागू करने में पुलिस शक्तियों के कथित दुरुपयोग से संबंधित कुछ मुद्दे उठाए थे. राज्य के वकील ने जवाब में, कमिश्नरेट प्रणाली के तहत गैंग चार्ट की मंजूरी के लिए जिला मजिस्ट्रेट की शक्तियों के पुलिस आयुक्त को सौंपने से संबंधित प्रासंगिक अधिसूचना को रिकॉर्ड पर रखने के लिए समय मांगा और दिया गया.

इसके बाद कोर्ट ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को आदेश के अनुपालन में व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया. अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस आयुक्त, गाजियाबाद ने अपने-अपने हलफनामे दाखिल किए, लेकिन मामले में शामिल मुख्य मुद्दे को संबोधित करने वाला औचित्य अपर्याप्त पाया गया.
इससे पूर्व कोर्ट ने गृह सचिव स्तर के अधिकारी से हलफनामे पर पूछा था कि जिले या कमिश्नरेट से इकट्ठा किया गया डाटा, जिसके आधार पर विभाग इस नतीजे पर पहुंचा है कि गैंगस्टर एक्ट के मामलों में काम करने वाला कमिश्नरेट सिस्टम, नियम 5(3)(ए) के तहत जरूरी संयुक्त बैठक से डीएम को बाहर रखना सही है या नहीं. यह राज्य व नागरिकों के हित में है, और उद्देश्य पूरा करता है या नहीं.
जिन जिलों में कमिश्नरेट प्रणाली लागू की गई है, उन जिलों की तुलना में जहां कमिश्नरेट प्रणाली नहीं अपनाई गई है, वहां का डाटा तुलनात्मक अध्ययन का विवरण है और पुलिस अधिकारियों को दिए गए किसी भी प्रशिक्षण कार्यक्रम का विवरण, जिन्हें जिला मजिस्ट्रेटों द्वारा पूर्व में किए गए कार्यों का निर्वहन करने के लिए नियुक्त किया गया है, साथ ही राज्य सरकार के किसी भी अध्ययन का विवरण जो यह दर्शाता है कि गृह विभाग इच्छित उद्देश्य प्राप्त करने में सफल रहा है या नहीं.
कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (अभियोजन) को पिछले दस वर्षों के उत्तर प्रदेश गैंगस्टर व असामाजिक गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामलों के संबंध में व्यापक जिलावार डाटा पेश करने का भी निर्देश दिया था. कई तारीखों पर गृह विभाग की ओर से मांगी गई जानकारी संतोषजनक तरीके से उपलब्ध नहीं कराई जा सकी. इस पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि गृह विभाग की ओर से दायर किए गए शपथपत्रों के अवलोकन से प्रथमदृष्टया यह प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारी/अधिकारियों (Administrators) ने या तो इस न्यायालय द्वारा पारित आदेशों पर समुचित ध्यान नहीं दिया है अथवा मामले को अत्यंत लापरवाहीपूर्ण ढंग से लिया है.
कोर्ट ने कहा कि हलफनामे में उत्तर प्रदेश राज्य के कुछ जिलों में कमिश्नरेट प्रणाली अपनाने के पीछे कथित “महान उद्देश्य” पर प्रकाश डाला गया है, जिसे दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद की तर्ज पर अपराध और अपराधियों के प्रति ज़ीरो टॉलरेंस हासिल करने के घोषित लक्ष्य के साथ एक राष्ट्रीय सर्वोत्तम अभ्यास के रूप में वर्णित किया गया है, और जैसा कि पहले कहा गया है, इस पर इस कोर्ट को कोई आपत्ति नहीं है.
Administrators या तो इस न्यायालय द्वारा दिए गए आदेशों पर ध्यान देने में विफल रहे हैं या उन्होंने इस मामले को लापरवाही से लिया
गृह विभाग की ओर से दायर हलफनामे की जांच करने पर, पहली नजर में ऐसा लगता है कि संबंधित अधिकारी (Administrators) या तो इस न्यायालय द्वारा दिए गए आदेशों पर ध्यान देने में विफल रहे हैं या उन्होंने इस मामले को लापरवाही से लिया है. ऐसा लगता है कि यह दृष्टिकोण इस गलत धारणा पर आधारित है कि अधिसूचना जारी करने की शक्ति, जो कार्यपालिका शाखाओं में निहित है, का प्रयोग बिना सोचे-समझे, मनमाने विवेक का सहारा लेकर और इसके परिणामी प्रभावों की जांच किए बिना किया जा सकता है.
यह न्यायालय ऐसे आचरण के पीछे के कारणों में जाने से बचता है, लेकिन यह मूक दर्शक नहीं रह सकता है और राज्य के नागरिकों के हित में और न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता और अधिकार को बनाए रखने के लिए इसमें निहित शक्तियों का प्रयोग करने में संकोच नहीं करेगा. कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया है कि वे आदेश की एक कॉपी तुरंत एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) के ऑफिस और राज्य की ओर से पेश होने वाले माननीय एडिशनल एडवोकेट जनरल को भेजें ताकि जरूरी अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके.
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