‘गो वध’ के 3 accused पर रासुका बरकरार, हाईकोर्ट ने कहा, इनके कृत्यों ने ‘जीवन की सामान्य गति को बाधित किया’

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (रासुका), के तहत 3 accused की निरूद्धि को बरकरार रखा है . मार्च 2025 में चैत्र नवरात्रि के पहले दिन व ईद के अवसर पर, जालौन के कालपी कस्बे में अवैध रूप से मवेशियों का वध करने का आरोप है. जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जस्टिस देवेंद्र सिंह-प्रथम की खंड पीठ ने कहा कि कथित कृत्य, जो हमारे जैसे प्राचीन और विविधतापूर्ण राष्ट्र में प्रमुख धार्मिक त्योहारों के संगम के ठीक समय पर किया गया था, वह केवल “कानून और व्यवस्था” की समस्या नहीं थी. यह स्पष्ट रूप से “लोक व्यवस्था”को भंग करने के दायरे में आता है.
हाईकोर्ट ने कहा “आरोपित (accused) गतिविधि और उसके बाद के परिणाम-नामित इलाकों में साम्प्रदायिक भय और व्यवहार में बदलाव, हिंदू और मुसलमानों के बीच आपसी तनाव, सांप्रदायिक हिंसा का वास्तविक खतरा, दंगा नियंत्रण अभ्यास और शांति समिति के हस्तक्षेप सहित असाधारण प्रशासनिक प्रतिक्रिया और सार्वजनिक व्यवस्था के पतन का स्थानीय खुफिया इकाई का समकालीन आकलन-सामूहिक रूप से सामुदायिक जीवन की सामान्य गति में व्यवधान स्थापित करते हैं जो एक अलग अपराध से कहीं अधिक है”.
न्यायालय का यह भी मत था कि जब कोई कृत्य जानबूझकर, सुनियोजित सटीक समय पर किया जाता है और किसी समुदाय के सबसे पवित्र क्षण में उसकी गहरी धार्मिक भावनाओं पर प्रहार करता है, तो उसमें उन बंधनों को “तेजी से और विनाशकारी प्रभाव” के साथ ‘तोड़ने’ की क्षमता होती है.
तीनों accused प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को खारिज कर दिया
इस प्रकार अदालत ने सिकंदर, सैय्याज अली और हसनेन द्वारा अपनी रासुका निरूद्धि को चुनौती देने वाली तीनों बंदी (accused) प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि रासुका के तहत प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों और अनुच्छेद 22 (5) के संवैधानिक जनादेश का अधिकारियों द्वारा विधिवत अनुपालन किया गया था.
मामले के अनुसार 31 मार्च, 2025 को उत्तर प्रदेश गौहत्या निवारण अधिनियम, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम और शस्त्र अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत, तीनों याचिकाकर्ताओं (accused) सहित आठ आरोपियों (accused) के खिलाफ, मवेशियों के कथित अवैध वध के संबंध में एफआईआर दर्ज की गई थी.