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मथुरा में 43 साल पहले हुए Gang Rape केस के तीनों आरोपितों को हाई कोर्ट ने दिया संदेह का लाभ, किया बरी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, जहाँ रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत संकेत देते हैं कि अभियोजन पक्ष अपराध उचित संदेह से परे साबित करने में विफल है वहाँ अपीलीय न्यायालय को आरोपी को संदेह का लाभ देने से पीछे नहीं हटना चाहिए

मथुरा में 43 साल पहले हुए Gang Rape केस के तीनों आरोपितों को हाई कोर्ट ने दिया संदेह का लाभ, किया बरी

अपीलीय न्यायालय को निचली अदालत द्वारा Gang Rape केस में दी गई दोषसिद्धि और सजा में हस्तक्षेप करने में सावधानी बरतनी चाहिए. लेकिन, जहाँ रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत यह संकेत देते हैं कि अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है. जहाँ ट्रायल कोर्ट द्वारा व्यक्त किए गए दृष्टिकोण से भिन्न कोई अन्य संभावित दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है वहाँ अपीलीय न्यायालय को आरोपी को संदेह का लाभ देने से पीछे नहीं हटना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जितेंद्र कुमार मिश्रा उर्फ जित्तू बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2024) 2 SCC 666 के मामले में दिये गए इस फैसले पर सहमति जताते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अवनीश सक्सेना की बेंच ने मथुरा में 43 साल पहले दलित जाति की महिला के साथ हुए Gang Rape के तीनों आरोपितों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है. कोर्ट ने द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश, मथुरा द्वारा सत्र विचारण संख्या 259/1983 (राज्य बनाम हेतराम व अन्य) में धारा 376 IPC (Gang Rape) के तहत सुनाये अये फैसले को रद कर दिया है.

ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपितों को Gang Rape का दोषी मानते हुए सात वर्ष के कठोर कारावास के साथ पांच सौ रुपये जुर्माने की सजा सुनायी

सीआरपीसी की धारा 374 के तहत यह आपराधिक अपील हेतराम, शंकर और भूदत द्वारा सत्र विचारण संख्या 259/1983 (राज्य बनाम हेतराम व अन्य) में पारित किये गये आदेश के खिलाफ दायर की गयी थी. ट्रायल कोर्ट ने तीनों आरोपितों को Gang Rape के जुर्म का दोषी मानते हुए उन्हें सात वर्ष के कठोर कारावास के साथ पांच सौ रुपये जुर्माने की सजा सुनायी थी.

इस घटना के संबंध में प्रथम सूचना रिपोर्ट मथुरा जिले के बरसाना थाने में 14.05.1983 को दर्ज करायी गयी थी. इसमें आरोप लगाया गया था कि घटना के दिन 09 मई को दिन के समय पीड़िता घर में अकेली थी. पड़ोस के रहने वाले तीनों आरोपितों समेत कुल चार लोग उसके घर में जरबन घुस आये और चाकू के नोक पर लेकर उसके साथ बारी बारी से Gang Rape किया. दलित जाति की महिला ने आरोप लगाया कि उसने बचाव के लिए चीख पुकार मचाई लेकिन कोई मदद के लिए आगे नहीं आया.

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संयोग से इसी दौरान पीड़िता के परिवार के सदस्य घर पहुंचे. उन्होंने दरवाजा भीतर से बंद देखा को चहारदीवारी फांदने लगे तो उन्होंने चारों लोगों को घर से भागते हुए देखा.घर के भीतर पहुंचने पर महिला ने बताया कि चारों लोगों ने उसके साथ Gang Rape किया है. रिपोर्ट दर्ज करने के बाद पुलिस ने Gang Rape पीड़िता की मेडिकल जांच करायी. इसमें पता चला कि वह 26-28 सप्ताह की गर्भवती है. पैथोलॉजिकल रिपोर्ट से पता चला कि उसे प्रसव पीड़ा नहीं हो रही है. Gang Rape के संबंध में कोई पक्की राय नहीं दी गयी थी.

उधर अपने बयान में अपीलकर्ताओं ने पीड़िता के साथ Gang Rape करने के आरोप से इनकार किया. उन्होंने कहा कि वे सूचना देने वाली के पड़ोसी हैं. हेतराम और शंकर ने बताया कि सूचना देने वाली की बकरियाँ उनके खेत में घुस गई थीं और फसल को नुकसान पहुँचाया था. जिसके चलते उन्होंने सूचना देने वाली को पीटा था. इसी के बदले में उसने एक झूठी और बेबुनियाद Gang Rape की एफआईआर दर्ज करवा दी. भूदत ने कहा कि गाँव की गुटबाजी के कारण उसे झूठा फँसाया गया है.

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ट्रायल कोर्ट ने तीन गवाहों की गवाही के आधार पर दोषसिद्धि दर्ज की थी क्योंकि दस्तावेजी सबूत इस बारे में चुप थी. ट्रायल जज ने पाया कि शिकायतकर्ता, पीड़िता और गवाह भरोसेमंद हैं. FIR दर्ज करने में हुई देरी का कारण शिकायतकर्ता का अभियुक्तों से डरना बताया गया है क्योंकि शिकायतकर्ता गाँव में एकमात्र अनुसूचित जाति का परिवार था. ट्रायल जज ने पाया कि पीड़िता के इस बयान में दम है कि अपीलकर्ताओं सहित चार लोगों ने उसके साथ Gang Rape किया. चौथा व्यक्ति, जिसे ड्राइवर के नाम से जाना जाता है, उसका पता नहीं लगाया जा सका.

ट्रायल जज ने पाया कि यह स्वाभाविक ही है कि पीड़िता ने अपने कपड़े धो लिए होंगे, क्योंकि उसे कानूनी प्रक्रिया के बारे में जानकारी नहीं थी. पीड़िता के हाथों पर लगी चोटें सूख गई होंगी, जो उसे टूटी हुई चूड़ियों के कारण लगी थीं. पीड़िता यौन संबंधों की आदी है क्योंकि वह विवाहित है इसलिए उसके गुप्तांगों पर कोई चोट नहीं थी.

पीड़िता ने मदद के लिए गुहार लगाई थी लेकिन उसकी आवाज पड़ोसियों तक नहीं पहुँच सकी, क्योंकि यह गर्मियों का महीना था और सभी लोग अपने-अपने घरों में हो सकते थे. यह भी माना गया कि पीड़िता के साथ चाकू की नोक पर बलात्कार किया गया था.

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता के अधिवक्ता की तरफ से एफआईआर दर्ज कराने में देरी, Gang Rape के चौथे आरोपित को गायब कर दिये जाने, चूड़ियां टूटने से हाथ में हुए जख्म का मेडिकल रिपोर्ट में कोई जिक्र न होने और पीड़िता की मेडिकल जांच में कोई इंटरनल चोट न आने को आधार बनाया गया और सवाल खड़े किये गये.

कोर्ट ने इन तथ्यों को नोटिस लिया और पाया कि मेडिकल-लीगल रिपोर्ट से यह तथ्य सामने आया कि उसके गुप्तांग या शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं था और Gang Rape के बारे में कोई पक्की राय नहीं दी जा सकती.

कोर्ट ने माना कि चूंकि मेडिको-लीगल जाँच रिपोर्ट में सामूहिक बलात्कार के कोई संकेत नहीं मिलते हैं और पूरा मामला गवाहों की प्रत्यक्ष गवाही पर आधारित है, इसलिए गवाहों के बयानों की जाँच अत्यंत सावधानी से करना उचित होगा. ड्राइवर की भूमिका और पीड़िता पर चाकू तानने की भूमिका के बारे में बयानों में स्पष्ट विसंगति है.

बेंच ने अपने फैसले में लल्लीराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य [(2008) 10 SCC 69] मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का उदाहरण कोर्ट कराया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह माना है कि यह सच है कि Gang Rape हुआ है या नहीं, यह तय करने के लिए चोट का होना अनिवार्य शर्त नहीं है, लेकिन इसका निर्णय प्रत्येक मामले के तथ्यात्मक आधार पर किया जाना चाहिए.

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कोर्ट ने कहा​ कि अगर तीन गवाहों के बयानों पर अभियोजन पक्ष के मामले की सच्चाई को परखने के लिए विचार किया जाए तो यह पाया जाता है कि आरोपी शिकायत करने वाले के पड़ोसी हैं. घटना की तारीख से पहले वे कभी भी शिकायतकर्ता के घर नहीं गए थे. आरोपी और महिला के बीच खेत में बकरी चराने को लेकर कहा-सुनी हुई थी.

कोर्ट ने कहा कि यदि घटना में चार लोगों द्वारा सात महीने की गर्भवती महिला के साथ Gang Rape किया गया था तो इस बलात्कार के कारण गंभीर चिकित्सीय आपात स्थिति उत्पन्न हो सकती थी जिसका उल्लेख मेडिको-लीगल रिपोर्ट में नहीं किया गया है. इसके विपरीत गर्भावस्था को सामान्य बताया गया है. यह अभियोजन पक्ष की कहानी में संदेह उत्पन्न करता है. इसलिए आरोपी संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं.

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