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छात्र को मिला Punishment ‘लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार नहीं करूंगा’ लिखकर पोस्टर 30 दिन दिखाने का आदेश डबल बेंच ने किया रद

सिंगल बेंच के फैसले के केवल Punishment के एक क्लाज को चीफ जस्टिस की बेंच ने पलटा, बाकी शर्तें यथावत रहेंगी

छात्र को मिला Punishment 'लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार नहीं करूंगा' लिखकर पोस्टर 30 दिन दिखाने का आदेश डबल बेंच ने किया रद

दूसरे यूनिवर्सिटी की छात्राओं के साथ दुर्व्यवहार और क्लासमेट्स के साथ क्लास बंक करने के आरोप में छात्र को मिले Punishment पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जजों की बेंच ने बड़ी राहत दे दी है. चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस ​क्षितिज शैलेन्द्र की बेंच ने छात्र को मिली सजा (Punishment) ‘लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार नहीं करूंगा’ पोस्टर पर लिखकर एक महीने तक दिखाने का सिंगल बेंच के जज का फैसला पलट दिया है.

फैसला सुनाते हुए दो जजों की बेंच ने कहा कि इस तरह के Punishment निर्देश जिसमें अपीलकर्ता एक तख्ती लेकर जाएगा जिस पर संदेश होगा कि वह कभी भी किसी लड़की के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा और 30 दिनों तक 30 मिनट के लिए तख्ती लेकर विश्वविद्यालय के गेट पर खड़ा रहेगा न केवल अपमानजनक है बल्कि अपीलकर्ता के चरित्र पर स्थायी दाग लगाएगा जो मामले की परिस्थितियों में आवश्यक नहीं है।

यह स्पेशल अपील डिफेक्टिव छात्र की तरफ से दाखिल की गयी थी. यह मामला पिछले साल का है. अपीलकर्ता और उसके कुछ साथियों का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें नोएडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के कुछ छात्र दूसरी यूनिवर्सिटी की छात्राओं के साथ मिसविहैब कर रहे थे. इसकी शिकायत हुई तो यूनिवर्सिटी ने छात्र को नोटिस जारी करके जवाब मांगा और 30 मार्च 2025 तो उसे यूनिव​र्सिटी से निष्कासित (Punishment) कर दिया गया.

यह छात्र बैचलर इन मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी कोर्स के पांचवें सेमेस्टर का था. यूनिवर्सिटी के स्तर पर बर्खास्तगी रद करने पर कोई राहत नहीं मिली तो छात्र ने इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपनी अधिवक्ता के माध्यम से रिट याचिका दाखिल की.

इस याचिका पर जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी ने सुनवाई की. सिंगल बेंच ने माना था कि प्रतिवादी-विश्वविद्यालय के वकील द्वारा प्रस्तुत सामग्री के आधार पर याचिकाकर्ता का आचरण नेकनीयत नहीं लगता है और उसकी अटेंडेंस भी पचास फीसदी के आसपास ही थी.

कोर्ट ने छात्र पर लगे आरोपों को भी गंभीर माना था. इस रिट सी याचिका पर सुनवाई के बाद यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता के पिता एक गरीब किसान हैं और बड़ी मुश्किल से उसे पढ़ा रहे हैं, संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए सिंगल बेंच ने 30.03.2025 का निष्कासन आदेश रद्द कर दिया था.

सिंगल बेंच ने अपने फैसले में छात्र पर कुछ शर्तें भी लगाई थीं. ये शर्तें इस प्रकार थीं…

  • I. याचिकाकर्ता प्रतिवादी-विश्वविद्यालय के सामने एक नोटरीकृत हलफनामा दायर करेगा कि वह बाकी कक्षाओं में 95% उपस्थित रहेगा और अनुपस्थिति की स्थिति में उसे छुट्टी के लिए आवेदन देना होगा. वह क्लास के समय विश्वविद्यालय परिसर से बाहर नहीं जाएगा. किसी भी और या नई शिकायत की स्थिति में प्रतिवादी-विश्वविद्यालय बिना नोटिस जारी किए भी याचिकाकर्ता को रस्टिकेट करने के लिए स्वतंत्र है.
  • II. याचिकाकर्ता एक प्ले कार्ड ले जाएगा जिस पर संदेश होगा कि वह कभी भी किसी लड़की के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा. इसकी शुरुआत 03 नवंबर 2025 से 30 दिन के लिए थी. समय सुबह 08.45 बजे से 09.15 बजे तक निर्धारित किया था. रेस्पांडेंट यूनिवर्सिटी उपरोक्त कार्य की एक तस्वीर लेगा. डिफाल्ट की स्थिति में यूनिवर्सिटी छात्र को फिर से रेस्टिकेट करने के लिए स्वत्रंत होगी.
  • III. याचिकाकर्ता फैसले की तिथि से 72 घंटे के भीतर विश्वविद्यालय के सामने अपने कार्य के लिए लिखित माफी भी दायर करेगा.
  • IV. पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे कम से कम गलगोटिया विश्वविद्यालय और प्रतिवादी-विश्वविद्यालय के गेट खुलने और बंद होने के समय एंटी-रोमियो मोबाइल स्क्वाड तैनात करें.
  • V. स्थायी अधिवक्ता को निर्देश दिया जाता है कि वे इस आदेश को संबंधित पुलिस अधिकारियों को सूचित करें.”

अपीलकर्ता का Punishment रद्द कर दिया गया था

डबल बेंच के सामने स्पेशल अपील 29.10.2025 को पारित आदेश के खिलाफ दाखिल की गयी थी. हालांकि अपीलकर्ता का निष्कासन (Punishment) रद्द कर दिया गया था लेकिन कुछ निर्देश दिए गए थे जिनका पालन न करने को फिर से निष्कासन (Punishment) का आधार बनाया गया. प्रकरण की सुनवाई के दौरान 57 दिन की देरी से याचिका दाखिल करने को भी आधार बनाया गया.

बेंच ने देरी माफी के कारणों को स्वीकार करते हुए याचिका स्वीकार कर ली. सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि सिंगल बेंच द्वारा पारित आदेश का निर्देश संख्या (II) न केवल छात्र के लिए अपमानजनक है बल्कि यह उसके कॅरियर को भी हमेशा के लिए प्रभावित करेगा. इसलिए निर्देशों को रद्द किया जाना चाहिए.

यूनिवर्सिटी की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता ने विवादित आदेश का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि याचिका ही सुनवाई योग्य नहीं थी मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए सिंगल जज ने निर्देश पारित किए जिनमें किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है. दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद डबल बेंच ने कहा कि सिंगल बेंच द्वारा तय किये गये निर्देश संख्या (I), (III), (IV) और परिणामी निर्देश संख्या (V) अपीलकर्ता के पिछले शैक्षणिक वर्षों में 50% उपस्थिति के आचरण को देखते हुए उचित हैं.

बेंच ने कहा, हम दृढ़ता से इस राय के हैं कि निर्देश संख्या (II) की प्रकृति (Punishment) जो न केवल अपमानजनक है बल्कि अपीलकर्ता के चरित्र पर एक स्थायी दाग लगाएगा जो मामले की परिस्थितियों में आवश्यक नहीं है। तथ्यों को परखने के बाद बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले में दिये गये निर्देश के क्लॉज (II) को रद्द करने का आदेश दिया.

बेंच ने कहा कि यदि निर्देश संख्या (II) में डिफॉल्ट क्लॉज के कारण अपीलकर्ता को फिर से निष्कासित किया गया है तो उसे निर्देश संख्या (III) के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करने का एक अवसर दिया जाएगा. अनुपालन करने पर निष्कासन (Punishment) रद्द माना जाएगा और अपीलकर्ता ईमानदारी से निर्देश संख्या (I) का पालन करेगा.

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