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100 साल के Accused को 40 साल बाद मिला न्याय, हाई कोर्ट ने किया बरी, 1982 के हुए मर्डर केस में था आरोपित

100 साल के Accused को 40 साल बाद मिला न्याय, हाई कोर्ट ने किया बरी, 1982 के हुए मर्डर केस में था आरोपित

जब कोई व्यक्ति (accused) जीवन के आखिरी पड़ाव पर कोर्ट के सामने खड़ा होता है तो दशकों की प्रक्रियात्मक देरी के बाद दंडात्मक परिणामों पर ज़ोर देना न्याय को एक ऐसे अनुष्ठान में बदलने का जोखिम पैदा करता है जो अपने मूल उद्देश्य से अलग हो जाता है. जब सिस्टम खुद ही उचित समय के भीतर अंतिम फैसला देने में असमर्थ रहा है तो राहत देते समय कोर्ट एक संतुलित, मानवीय दृष्टिकोण अपनाने में सही है.

इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस चंद्रधारी सिंह और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने 100 साल के आरोपित (accused) को सुनायी गयी सजा रद करते हुए उसे आरोपों से बरी कर दिया है. याचिकाकर्ता को 1982 में हुए मर्डर केस में सजा सुनायी गयी थी.

यह मामला हमीरपुर जिले से जुड़ा हुआ था. अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि 9 अगस्त, 1982 को शिकायतकर्ता और उसका भाई (मृतक) घर लौट रहे थे. रास्ते में वे मैकू से मिले जिसके पास बंदूक थी. सत्ती दीन जिसके पास भाला/बल्लम था और अपीलकर्ता-धानी राम (accused) जिसके पास कुल्हाड़ी/फरसा था.

कथित तौर पर सत्ती दीन और धानी राम (accused) ने मैकू को गुनुआ को मारने के लिए उकसाया क्योंकि उसने एक बार उसकी पिस्तौल जब्त करवा दी थी और उसकी छह बीघा जमीन भी ले ली थी. पुरानी दुश्मनी के कारण मैकू ने उस पर गोली चला दी. गोली मृतक की पीठ में लगी, जिससे वह गिर गया और मर गया.

गोली चलने की आवाज सुनकर लोग घटना स्थल की ओर दौड़े और बीच-बचाव करने की कोशिश की. उधर, मौके का फायदा उठाते हुए आरोपी (accused) भाग निकले. मामले में एफआईआर दर्ज करके पुलिस ने जांच की और साक्ष्यों को जुटाने के बाद चार्जशीट ट्रायल कोर्ट में पेश की.

ट्रायल कोर्ट ने accused को धारा 302 के साथ धारा 34 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई

ट्रायल कोर्ट के जस्टिस एडिशनल सेशन जज हमीरपुर ने 1984 में सत्ती दीन और धनी राम (accused) को धारा 302 के साथ धारा 34 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई. मुख्य आरोपी मैकू फरार हो गया. सत्तीदीन की अपील के दौरान ही मौत हो गई. हाईकोर्ट के सामने धनी राम (accused) ही अकेले जीवित अपीलकर्ता बचे.

उसका पक्ष रखते हुए अधिवक्ता ने तर्क दिया कि अपीलकर्ता (accused) की उम्र लगभग 100 साल है और उसे सिर्फ उकसाने का रोल दिया गया. मुख्य आरोपी यानी मैकू जिसने कथित तौर पर मृतक को गोली मारी थी उसे पुलिस ने कभी गिरफ्तार नहीं किया. स्टेट ने आपराधिक अपील का विरोध किया. उन्होंने यह भी माना कि अपीलकर्ता अब 100 साल का है.

मामले और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का विश्लेषण करने के बाद हाईकोर्ट ने दो मुख्य गवाहों की गवाही और अन्य दस्तावेजी सबूतों को अविश्वसनीय माना. पहला घटना की शुरुआत में विरोधाभास. दूसरा चश्मदीद गवाह के तौर पर अनुचित व्यवहार. तीसरा प्रथम सूचना रिपोर्ट में कमी और चौथा स्वाभाविक रूप से असंभव बातें.

बेंच ने आँखों देखे और मेडिकल सबूतों के बीच एक महत्वपूर्ण विसंगति की ओर भी इशारा किया. कोर्ट ने कहा कि जबकि प्रॉसिक्यूशन के गवाहों ने दावा किया कि गोली लगने के बाद मृतक जमीन पर गिर गया और सत्ती दीन ने फिर उसके सीने में भाला घोंप दिया, वहीं पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में चोट नंबर 5 को “आगे से पीछे और थोड़ा ऊपर” की दिशा वाला एक पंक्चर घाव बताया गया.

कोर्ट ने कहा कि अगर मृतक जमीन पर सीधा लेटा हुआ था तो ऐसी ऊपर की ओर जाने वाली दिशा कानूनी और वैज्ञानिक रूप से असंभव थी. कोर्ट ने खुद प्रथम सूचना रिपोर्ट पर भी शक किया. डिवीजन बेंच ने कहा कि जबकि शिकायतकर्ता (accused) ने माना कि उसके अंगूठे के निशान की स्याही ‘रॉयल ब्लू’ थी जबकि प्रथम सूचना रिपोर्ट असल में ‘ब्लू-ब्लैक’ स्याही से लिखी गई. कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रथम सूचना रिपोर्ट शायद जांच अधिकारी के आने के बाद सोच-समझकर तैयार की गई होगी.

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि जबकि अपीलकर्ता-धानी राम (accused) पर कुल्हाड़ी (फरसा) से लैस होने का आरोप था. मेडिकल रिपोर्ट में ऐसे हथियार से लगी कोई चोट नहीं दिखाई गई. यह मानते हुए कि घटना की शुरुआत और तरीका संदिग्ध है और प्रॉसिक्यूशन ने घटना की असलियत को छिपाया, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता (accused) को संदेह का लाभ मिलना चाहिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि धनी राम (accused) अब लगभग 100 साल के हैं जिन्होंने पेंडिंग अपील के साये में बेल पर लगभग 40 साल बिताए.

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“न्याय कोई ऐसी चीज नहीं है, जो इंसानी हालात से अलग हो. कानून इस सच्चाई से अनजान नहीं हो सकता कि बढ़ती उम्र अपने साथ शारीरिक कमज़ोरी, निर्भरता और जीवन के सीमित होते दायरे को लाती है.”
जस्टिस चंद्र धारी सिंह ने कहा

Satti Din and another vs. State of U.P 2026 LiveLaw (AB) 57

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