प्राइमाफेसी मामले से ज्यादा Evidence हों तभी बुलाये जा सकते हैं सीआरपीसी की धारा 319 के तहत अतिरिक्त आरोपी
ट्रायल कोर्ट किसी अतिरिक्त आरोपी को सिर्फ ट्रायल के दौरान रिकॉर्ड किए गए Evidence के आधार पर ही बुला सकता है न कि चार्जशीट या केस डायरी में मौजूद चीजों के आधार पर. दहेज हत्या के एक मामले से जुड़ी एक क्रिमिनल रिवीजन याचिका को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की धारा 319 के तहत पावर के इस्तेमाल पर सख्त सीमाओं को साफ करते हुए कहा है कि अधिकार क्षेत्र खास तरह का है और इसे सिर्फ पहली नजर में संतुष्टि के आधार पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

यह रिवीजन याचिका एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज फास्ट ट्रैक कोर्ट कौशांबी द्वारा स्टेट बनाम मनोज यादव में 08 नवंबर 2024 को दिये गये आदेश के खिलाफ फाइल की गयी थी. इस संबंध में केस क्राइम नंबर 01/2020 अन्तर्गत धारा 498A, 302 आईपीसी और 3/4 दहेज निषेध एक्ट के तहत कौशांबी जिले के मोहब्बतपुर पसंथा थाने में दर्ज हुआ था. जिसके तहत रिवीजनिस्ट द्वारा फाइल की गई सेक्शन 319 सीआरपीसी की एप्लीकेशन रिजेक्ट कर दी गई थी.
तथ्यों के अनुसार शिकायतकर्ता की बेटी राधिका की शादी करीब पांच साल पहले मनोज के साथ हिंदू रीति-रिवाज से हुई थी. शादी के बाद पति मनोज, ससुर भैया लाल, सास और देवर अशोक कुमार दहेज में एक भैंस और सोने की अंगूठी की मांग करते हुए उसे परेशान करते थे. आरोप यह भी लगाया गया कि मनोज के साली सुनीता के साथ नाजायज रिश्ते थे. घटना से एक महीने पहले शिकायतकर्ता ने सुनीता और मनोज को बुलाया था. 07 जनवरी 2020 को पति और ससुराल वालों ने उसकी बेटी को मारकर फांसी पर लटका दिया.
मान सिंह द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर ससुर भैया लाल, सास और देवर अशोक कुमार और सुनीता देवी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया. जांच अधिकारी ने केवल पति मनोज के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की. ट्रायल के दौरान आरोपी विनोद के खिलाफ आरोप तय किए गए. इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने 08 नवंबर 2024 के आदेश द्वारा ट्रायल का सामना करने के लिए तलब किया गया. समन आदेश को याचिका में चैलेंज किया गया था.
रिविजनिस्ट ने तर्क दिया कि ट्रायल के दौरान मुखबिर और एक अन्य अभियोजन गवाह के दर्ज बयानों (Evidence) से परिवार के अन्य सदस्यों की संलिप्तता का पता चलता है, जिससे उन्हें अतिरिक्त आरोपी के रूप में बुलाना सही ठहराया जा सके. तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट यह समझने में विफल रहा कि धारा 319 CrPC के तहत सबूतों की सीमा पूरी हो गई थी.
रिकॉर्ड पर मौजूद Evidence सामान्य आरोपों से आगे नहीं जाते
राज्य और विरोधी पक्षों ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि रिश्तेदार मृतक और उसके पति से अलग रह रहे थे और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत (Evidence) सामान्य आरोपों से आगे नहीं जाते हैं. प्रस्तुत किया गया कि जांच अधिकारी को उनके खिलाफ कोई सामग्री (Evidence) नहीं मिली थी और ट्रायल कोर्ट ने धारा 319 सीआरपीसी को नियंत्रित करने वाले स्थापित सिद्धांतों को सही ढंग से लागू किया था.
जस्टिस चवन प्रकाश ने दोहराया कि प्रावधान में इस्तेमाल किए गए सबूत (Evidence) शब्द का एक संकीर्ण और विशिष्ट अर्थ है. सुप्रीम कोर्ट के आधिकारिक निर्णयों पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने माना कि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री को अतिरिक्त आरोपी को बुलाने के उद्देश्य से सबूत के रूप में नहीं माना जा सकता है.
सेक्शन 319 सीआरपीसी के तहत आरोपी को बुलाने के कानून के बारे में यह तय है कि यह एक असाधारण शक्ति है, जिसका इस्तेमाल सावधानी से और सोच-समझकर किया जाना चाहिए. समन जारी करते समय कोर्ट को यह देखना चाहिए कि क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं. सेक्शन 319 सीआरपीसी के तहत अतिरिक्त आरोपी को बुलाने के लिए सिर्फ प्रथम दृष्टया मामला काफी नहीं है.
कोर्ट ने कहा

हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले में संविधान पीठ के फैसले के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि सेक्शन 319 (1) सीआरपीसी में सबूत (Evidence) शब्द सिर्फ ट्रायल कोर्ट के सामने पेश किए गए सबूतों (Evidence) तक ही सीमित है. चार्जशीट की सामग्री या केस डायरी पर भरोसा करना गलत है, क्योंकि ऐसी सामग्री सही मायने में सबूत (Evidence) नहीं मानी जाती है.
कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी, जिसे अभियोजन पक्ष के गवाह के तौर पर पेश किया गया था, ने कहा था कि पति मृतक के साथ अलग रह रहा था और दहेज की मांग सिर्फ उसी ने की थी. इस आधार पर कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस निष्कर्ष में कोई कमी नहीं पाई कि सेक्शन 319 CrPC लागू करने के लिए जरूरी सबूतों की शर्त पूरी नहीं हुई थी.
हाई कोर्ट ने कहा कि सेक्शन 319 सीआरपीसी के तहत आवेदन खारिज करने का आदेश सही कारणों के साथ पारित किया गया था और उसमें कोई गैर-कानूनी बात नहीं थी. कोर्ट ने आपराधिक रिवीजन याचिका खारिज कर दी और ससुराल वालों को अतिरिक्त आरोपी के तौर पर बुलाने से इनकार करने के फैसले को बरकरार रखा.
Case Title: Man Singh v. State of Uttar Pradesh and Ors Case No.: Criminal Revision No. 6573 of 2024