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Civil cases को क्रिमिनल केस की तरह ट्रीट नहीं कर सकते, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका

बिजनेस जगत में Civil cases को आपराधिक मामलों में बदलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है. यह स्पष्ट रूप से इस आम धारणा के कारण है कि सिविल कानून के उपाय समय लेने वाले होते हैं और उधारदाताओं, लेनदारों के हितों की पर्याप्त रूप से रक्षा नहीं करते हैं. ऐसी प्रवृत्ति कई पारिवारिक विवादों में भी देखी जाती है, जिससे परिवारों में अपरिवर्तनीय दरार आ जाती है. यह भी एक धारणा है कि यदि किसी व्यक्ति को किसी तरह आपराधिक मुकदमे में फंसाया जा सकता है, तो तत्काल निपटारे की संभावना होती है.

Civil cases को क्रिमिनल केस की तरह ट्रीट नहीं कर सकते, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका

Civil cases और दावों को निपटाने के किसी भी प्रयास को, जिसमें कोई आपराधिक अपराध शामिल नहीं है, आपराधिक अभियोजन के माध्यम से दबाव डालकर निपटाने की निंदा की जानी चाहिए और इसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए. इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन बनाम एनईपीसी इंडिया लि. और अन्य (2006) 6 SCC 726 में सुप्रीम कोर्ट ​द्वारा दिये गये फैसले को आधार बनाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 156 Cr.P.C. के तहत आवेदन पर बरेली की कोर्ट द्वारा दिये गये फैसले को चुनौती देने वाली रिवीजन याचिका खारिज कर दी है. यह फैसला जस्टिस दिवेश चंद्र सामंत की सिंगल बेंच ने ​​सुनाया है.

यह रिवीजन याचिका स्मॉल कॉजेज कोर्ट/अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जिला बरेली द्वारा शिकायत केस (Civil cases) नंबर 416 ऑफ 2023 (सूरज पाल सिंह बनाम परमेश्वरी सिंह) द्वारा धारा 156 Cr.PC के तहत थाना सुभाष नगर में एफआईआर दर्ज किये जाने की मांग खारिज कर दिये जाने के खिलाफ दाखिल की गयी थी.

तथ्यों के अनुसार रिवीजनिस्ट ने विपक्षी के भरोसे पर पनीर और खोया की सप्लाई के प्रस्तावित व्यवसाय और वाहन क्रय करने में कुल 2,50,000 रुपये का निवेश किया. काफी समय बीत जाने के बाद भी विपक्षी ने न तो कोई लाभ दिया और न ही निवेश की गई राशि वापस की. आरोप लगाया गया था कि इंवेस्टमेंट की रकम मांगने पर उसे गाली और धमकी दी गयी और पुनर्भुगतान से इनकार कर दिया गया.

इसके बाद शिकायतकर्ता पुलिस के पास पहुंचा तो उसकी शिकायत पर रिपोर्ट दर्ज नहीं की गयी. इसके बाद धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत आवेदन दायर करके एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने की गुजारिश की गयी. आवेदन को स्मॉल कॉजेज कोर्ट/अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बरेली ने 04.09.2025 के आदेश द्वारा खारिज कर दिया.

हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान रिवीजनिस्ट के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा धारा 156(3) के तहत आवेदन को खारिज करना एक यांत्रिक, बिना कारण और बिना तर्क का आदेश था. मजिस्ट्रेट ने रिकॉर्ड पर पहले से मौजूद महत्वपूर्ण दस्तावेजी सबूतों को नजरअंदाज करके गलती की.

तर्क दिया गया कि ट्रायल कोर्ट ने इस धारणा पर आवेदन को गलत तरीके से खारिज कर दिया कि मामला पूरी तरह से Civil cases है. ट्रायल कोर्ट ने धोखाधड़ी और धमकी भरे व्यवहार के स्पष्ट आरोपों को नजरअंदाज कर दिया. मांग की गयी कि महत्वपूर्ण तथ्यों और वैधानिक जनादेश पर विचार न करने के चलते आदेश को रद्द किया जाना चाहिए.

एजीए ने पुनरीक्षणकर्ता के वकील द्वारा दिए गए तर्क का विरोध किया और कहा कि धारा 156(3) के तहत आवेदन पुनरीक्षणकर्ता द्वारा विपक्षी पक्ष को परेशान करने के इरादे से झूठी और मनगढ़ंत कहानी के साथ दायर किया गया था.

पक्षों के बीच विवाद विशुद्ध रूप से Civil nature का

ट्रायल कोर्ट ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की जांच करने के बाद पाया कि पक्षों के बीच विवाद विशुद्ध रूप से सिविल प्रकृति (Civil cases) का है और पुनरीक्षणकर्ता ने दुर्भावनापूर्ण इरादे से इसे आपराधिक रंग देने का प्रयास किया है. ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई अवैधता या कमी नहीं है.

कोर्ट ने पक्षों के वकीलों द्वारा दिए गए विरोधी तर्कों पर विचार करने और रिकॉर्ड देखने के बाद माना कि ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के साथ-साथ इस तथ्य पर भी विचार करने के बाद खारिज कर दिया है कि पक्षों के बीच विवाद विशुद्ध रूप से सिविल प्रकृति (Civil cases) का है और पुनरीक्षणकर्ता ने दुर्भावनापूर्ण इरादे से इसे आपराधिक रंग देने का प्रयास किया है. कोर्ट ने याचिका को निस्तारित करते हुए कहा कि इस न्यायालय के पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है.

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