Litigant से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि उसे कानून की बारीकियों की जानकारी होगी, 2 हफ्ते में नियमानुसार कार्रवाई करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि वादकारी (Litigant) अधिक पढ़ा-लिखा नहीं होता. उससे (Litigant) यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि कानून की बारीकियों और अनुकंपा नियुक्ति के लिए लागू नियमो की जानकारी होगी. प्रशासनिक अधिकारियों की वैधानिक जिम्मेदारी है कि अपना काम पूरी सावधानी पूर्वक करें. याची (Litigant) को अधिकारियों की लापरवाही का खामियाजा भुगतने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता. कोर्ट ने राज्य सड़क परिवहन निगम को दो हफ्ते में नियमानुसार कार्रवाई कर 7 जनवरी तक कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया है. यह आदेश जस्टिस मंजू रानी चौहान ने अमित कुमार सिंह की याचिका की सुनवाई करते हुए दिया है.
याची (Litigant) के पिता निगम में कंडक्टर थे. जिनकी सेवाकाल में 30 जुलाई 2000 को मौत हो गई. याची की मां ने विभाग को सूचना दी कि पुत्र नाबालिग है, इसलिए बालिग होने पर आश्रित नियुक्ति पर विचार किया जाय. बालिग होने के बाद याची की अर्जी पर विचार किया गया और उसे संविदा पर नियुक्ति दी गई. कई वर्ष सेवा करने के बाद याची ने संविदा नियुक्ति को चुनौती देते हुए कहा मृतक आश्रित सेवा नियमावली के अंतर्गत स्थाई नियुक्ति का नियम है. इसलिए उसकी भी स्थाई नियुक्ति की जाय.
Litigant की नियुक्ति की कार्यवाही कर कोर्ट को जानकारी
याची का कहना है कि उसे पहले कानून की जानकारी नहीं थी. विभाग का दायित्व था कि उसकी नियुक्ति कानूनी उपबंधो के तहत करें. विभाग के अधिवक्ता का कहना था कि याची (Litigant) ने संविदा नियुक्ति स्वीकार की है इसलिए लंबी सेवा के बाद वह उसके विरुद्ध दावा नहीं कर सकता. जिसपर कोर्ट ने कहा कि कानून के अनुसार काम करने की जिम्मेदारी अधिकारियों की है. इसलिए नियमानुसार याची (Litigant) की नियुक्ति की कार्यवाही कर कोर्ट को जानकारी दें.
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