Tax evasion के इरादे का कोई सबूत न होने पर ट्रांसपोर्टर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ट्रांसपोर्टेशन फर्म के खिलाफ जारी जब्ती आदेश रद्द किया, जमा की गई रकम वापस करने का निर्देश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक ट्रांसपोर्टेशन फर्म के खिलाफ जारी जब्ती आदेश को रद्द करते हुए कहा है कि टैक्स चोरी (Tax evasion) के इरादे का कोई सबूत न होने पर ट्रांसपोर्टर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती. यह मामला जीएसटी सिस्टम के तहत ट्रांजिट में सामान को रोकने से जुड़ा था. कार्टन की संख्या कम मिलने पर ट्रांसपोर्टर के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई शुरू की गई थी.
कोर्ट ने कहा कि एक बार जब सामान का मालिकाना हक साबित हो जाता है और कोई सबूत यह नहीं बताता कि ट्रांसपोर्टर ने टैक्स चोरी (Tax evasion) की है तो गाड़ी को जब्त करना और कार्रवाई शुरू करना सही नहीं हो सकती. यह आदेश जस्टिस पियूष अग्रवाल की बेंच ने सुनाया है.
याचिकाकर्ता जीएसटी के तहत रजिस्टर्ड एक प्रोप्राइटरशिप फर्म है और सामान के ट्रांसपोर्टेशन का काम करती है. इस फर्म का एक वाहन देहरादून से दिल्ली खेप लेकर जा रहा था. गाड़ी को मेरठ में रोक कर फिजिकल वेरिफिकेशन किया गया. अधिकारियों ने ई-वे बिल में दर्ज मात्रा की तुलना में लोड किए गए कार्टन की संख्या में अंतर पाया. इसके बाद सामान और गाड़ी को जब्त कर लिया गया और जीएसटी एक्ट की धारा 129 (3) के तहत कार्रवाई शुरू की गई.
बाजार मूल्य के बराबर राशि का भुगतान करने के बाद सामान कंसाइनर को सौंप दिया गया, जिसने यह स्वीकार किया कि यह कमी मजदूरों द्वारा लोडिंग में हुई गलती के कारण हुई थी. गलत इरादे या ट्रेडिंग गतिविधि में शामिल होने का कोई सबूत न होने के बावजूद, अधिकारियों ने ट्रांसपोर्टर के खिलाफ कार्रवाई जारी रखी. इस कार्रवाई को याचिका में चुनौती दी गयी थी.
याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एक बार जब सामान कंसाइनर को मालिकाना हक मिलने पर जारी कर दिया गया तो ट्रांसपोर्टर के खिलाफ कोई गलत अनुमान नहीं लगाया जा सकता.
तर्क दिया गया कि फर्म केवल ट्रांसपोर्टेशन सेवाएं प्रदान करती है और किसी भी अधिकारी ने ऐसा कोई सबूत दर्ज नहीं किया कि याचिकाकर्ता का टैक्स चोरी (Tax evasion) करने का इरादा था या वह सामान की खरीद-बिक्री में शामिल था. खेप के साथ सभी जरूरी दस्तावेज थे और याचिकाकर्ता ने बताया कि यह कमी लोडिंग में लगे मजदूरों की गलती के कारण हुई थी.

दलील का विरोध करते हुए राज्य के वकील ने कहा कि कार्रवाई सही तरीके से शुरू की गई थी क्योंकि फिजिकली पाए गए सामान की मात्रा दस्तावेज में दर्ज मात्रा से कम थी. इसी आधार पर अधिकारियों ने जुर्माना लगाया (Tax evasion) और गाड़ी की जब्ती को सही ठहराया.
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता एक ट्रांसपोर्टर है और ट्रांसपोर्टेशन चार्ज लेकर एक जगह से दूसरी जगह सामान पहुंचा रहा है. शिपमेंट के साथ दस्तावेज थे. हालांकि फिजिकल वेरिफिकेशन में कमी पाई गई लेकिन किसी भी सबूत से यह पता नहीं चलता कि ट्रांसपोर्टर सामान की खरीद-बिक्री में शामिल था.
कोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि यह पता चलने के बाद कि सामान कंसाइनर का है सामान उसके फेवर में रिलीज कर दिया गया था और ट्रांसपोर्टर के खिलाफ कोई गलत सबूत नहीं था तो गाड़ी को जब्त नहीं किया जा सकता था और न ही याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई कार्रवाई शुरू की जा सकती थी.
Tax evasion के इरादे के बिना सिर्फ क्वांटिटी में गड़बड़ी के आधार पर ट्रांसपोर्टर को सजा नहीं दी जा सकती
कोर्ट ने कहा कि टैक्स बचाने (Tax evasion) के इरादे के बिना सिर्फ क्वांटिटी में गड़बड़ी के आधार पर ट्रांसपोर्टर को सजा नहीं दी जा सकती. इस कार्रवाई को गलत ठहराते हुए हाई कोर्ट ने 26.10.2021 के विवादित आदेश को रद्द कर दिया और रिट याचिका मंजूर कर ली. कोर्ट ने कानून के मुताबिक विवादित कार्यवाही के तहत जमा की गई किसी भी रकम (Tax evasion) को वापस करने का भी निर्देश दिया है.
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