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Rape का केस दर्ज कराने में देरी माफ, सजा 7 साल जेल

दोषसिद्धि बरकरार, उम्र के चलते HC ने कम की सजा

Rape का केस दर्ज कराने में देरी माफ, सजा 7 साल जेल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म (Rape) की एफआईआर दर्ज कराने में हुई 13 दिन की देरी को यह कहते हुए नजरअंदाज कर दिया कि कभी-कभी सामाजिक और आर्थिक स्थिति गरीब व वंचित नागरिकों के भाग्य को नियंत्रित करती हैं. कोर्ट ने एफआईआर में देरी के बावजूद आरोपी की दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन उसकी 70 वर्ष की आयु को देखते हुए दुष्कर्म के आरोप में 10 साल की कठोर कारावास की सजा को घटाकर 7 साल के साधारण कारावास में बदल दिया और 10 हजार का जुर्माना लगाया.

कोर्ट ने एससीएसटी एक्ट के अपराध से बरी कर दिया किन्तु अन्य अपराध में दंड व दो हजार रुपए के जुर्माने की सजा को बरकरार रखा. कोर्ट ने दुष्कर्म (Rape) के आरोपी को अदालत में समर्पण कर शेष सजा भुगतने का निर्देश दिया है.

यह फैसला जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने भगवानदीन की सजा के खिलाफ अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दिया है.

कानपुर देहात निवासी अपीलकर्ता पर 9 नवंबर 1996 को दुष्कर्म (Rape) और एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज हुआ था. आरोप लगाया कि वह मजदूरी पर गया था. उसकी गैरमौजूदगी में अपीलकर्ता ने उसकी पत्नी के साथ घर में घुसकर दुष्कर्म (Rape) किया. विशेष न्यायाधीश ने 4 मार्च 2011 को आरोपी को दोषी करार देते हुए 10 साल के सश्रम कारावास व अन्य  सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई.

अपीलकर्ता के वकील ने एफआईआर में देरी को अनुचित बताया, जबकि अभियोजन पक्ष ने स्पष्ट किया कि पीड़िता और उसके पति ने घटना के तुरंत बाद पुलिस से संपर्क किया था, लेकिन उनकी शिकायत दर्ज नहीं की गई. उन्हें लगातार धमकियां भी मिल रही थीं.

आखिरकार, 8 नवंबर 1996 को सीओ घाटमपुर को लिखित रिपोर्ट सौंपने के बाद 9 नवंबर को एफआईआर दर्ज हुई. हाईकोर्ट ने कहा अपराध साबित करने के पर्याप्त सबूत हैं. किंतु आयु को देखते हुए सजा घटा दी है.

Gang Rape केस समझौते के आधार पर हर्जाने के साथ रद
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सामूहिक दुष्कर्म (Rape), लूट और धमकी जैसे आरोपों से जुड़े एक मामले की अपराधिक कार्यवाही समझौते के आधार पर रद्द कर दी है. साथ ही दोनों पक्षों पर दो दो हजार रुपए का हर्जाना लगाया है. यह आदेश जस्टिस गौतम चौधरी ने बदायूं के मुनीश व अन्य दो की याचिका दिया है. मामले के मुताबिक पीड़िता ने याचियों के खिलाफ सामूहिक बलात्कार (Rape), लूट व धमकी के आरोप में मुकदमा दर्ज कराया था. ट्रायल के दौरान पक्षकारों में समझौता हो गया. इसके बाद याची हाईकोर्ट आए.

कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए याचियों के खिलाफ दर्ज मुकदमा रद्द कर दिया. कहा कि आज कल झूठे मुकदमे दर्ज करवा मुकरने का प्रचलन बढ़ गया है. इसे कोर्ट नजरअंदाज नहीं कर सकतीं लिहाजा, समझौते के आधार पर मुकदमा तो रद्द किया जा रहा है, लेकिन इसके लिए पक्षकारों को दो दो हजार रूपये तीन सप्ताह में हाईकोर्ट विधिक सेवा प्राधिकरण में बतौर हर्जाना जमा करना होगा.

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