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बिना Notice चार्जशीट पर धारा 447 की कार्यवाही रद, हाई कोर्ट ने कहा, पहले आरोपी को नोटिस देना जरूरी

बिना Notice चार्जशीट पर धारा 447 की कार्यवाही रद, हाई कोर्ट ने कहा, पहले आरोपी को नोटिस देना जरूरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि आपराधिक अतिचार के अपराध में आरोपी को Notice दिया जाना जरूरी है यदि इस कानूनी बाध्यकारी उपबंध का पालन नहीं किया गया तो धारा 447 के तहत कार्यवाही अवैध होगी. कोर्ट ने याची के खिलाफ धारा 447 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत केस कार्यवाही रद कर दिया किन्तु कहा कि अन्य धाराओं के तहत आपराधिक केस चलेगा. यह आदेश जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव ने नेब्बू लाल उर्फ किशोरी लाल की याचिका पर दिया है.

यह आवेदन केस नंबर 153/2025 (राज्य बनाम नेब्बुलाल और अन्य) की पूरी कार्यवाही को रद्द करने की प्रार्थना करते हुए दायर किया गया है, जो केस क्राइम नंबर 310/2022 के तहत धारा 434, 447, 504, 506 आईपीसी थाना मांडा, जिला प्रयागराज के तहत दर्ज है. याचिका में अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोर्ट नंबर 10, इलाहाबाद द्वारा पारित संज्ञान आदेश 7 अप्रैल 2025 और चार्जशीट 19 जनवरी को भी रद्द करने की प्रार्थना की गई थी.

आवेदकों के वकील द्वारा उठाया गया एकमात्र तर्क यह है कि चार्जशीट में धारा 447 IPC के तहत आवेदकों पर आरोप लगाना अनुचित है क्योंकि धारा 447 IPC के तहत आरोप लगाने के लिए, यूपी संशोधन अधिनियम, 1961 के अनुसार पूर्व Notice अनिवार्य है. अपने तर्क के समर्थन में आवेदक के वकील ने राहु लाल राहु राम @ दिव्यानांद और अन्य के मामले में हाई कोर्ट की बेंच द्वारा दिये गये फैसले का हवाला दिया गया.

“आवेदकों को घुसपैठिया नहीं कहा जा सकता और न ही उन पर सेक्शन 447 आईपीसी के प्रावधानों के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है, क्योंकि उस सेक्शन के तहत आवेदकों के खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता है. संशोधित सेक्शन 441 आईपीसी के तहत Notice देना अनिवार्य है, लेकिन इसे पूरा नहीं किया गया है. इस अनिवार्य प्रावधान (Notice)  का पालन न करने के कारण, “आपराधिक अतिचार” का अपराध, जिसे सेक्शन 441 आईपीसी में परिभाषित किया गया है, नहीं बनता है, इसलिए, सेक्शन 447 I.P.C. के तहत आवेदकों के खिलाफ दायर चार्जशीट कानूनी रूप से मान्य नहीं है.”
राहु लाल राहु राम @ दिव्यानांद और अन्य केस में हाई कोर्ट के फैसले का अंश

विपक्षी पार्टी और राज्य के अधिवक्ता ने आवेदकों की ओर से दी गई दलीलों का जोरदार विरोध करते हुए कहा कि संशोधित सेक्शन 441 आईपीसी के तहत Notice न भेजने के प्रभाव को संबंधित विद्वान अदालत द्वारा देखा जाना चाहिए और आवेदक संबंधित विद्वान अदालत के समक्ष डिस्चार्ज के लिए आवेदन कर सकते हैं.

“जो कोई किसी दूसरे व्यक्ति के कब्जे वाली संपत्ति में अपराध करने या ऐसे संपत्ति के कब्जे वाले किसी व्यक्ति को डराने, अपमानित करने या परेशान करने के इरादे से प्रवेश करता है या, ऐसी संपत्ति में कानूनी रूप से प्रवेश करने के बाद, वहां गैर-कानूनी रूप से इस इरादे से रहता है कि ऐसे किसी व्यक्ति को डराए, अपमानित करे या परेशान करे, या अपराध करने के इरादे से, या, ऐसी संपत्ति में प्रवेश करने के बाद, चाहे आपराधिक कानून (आई.पी. संशोधन) अधिनियम, 1961 के लागू होने से पहले या बाद में, ऐसी संपत्ति पर अनधिकृत कब्जा करने या उसका अनधिकृत उपयोग करने के इरादे से, ऐसे दूसरे व्यक्ति द्वारा लिखित Notice द्वारा, जो उसे विधिवत दिया गया हो, Notice में निर्दिष्ट तारीख तक, ऐसी संपत्ति से, या उसके कब्जे या उपयोग से हटने में विफल रहता है तो उसे “आपराधिक अतिचार” करने वाला कहा जाएगा.
441आईपीसी में परिभाषित आपराधिक अतिचार

“जो कोई आपराधिक अतिचार करेगा, उसे किसी भी तरह की कैद की सजा दी जाएगी, जिसकी अवधि तीन महीने तक हो सकती है, या जुर्माना, जो पांच सौ रुपये तक हो सकता है, या दोनों.”
447 आईपीसी में आपराधिक अतिचार के लिए सजा

लिखित Notice विधिवत दिया गया हो

कोर्ट ने कहा कि संशोधित धारा 441 आईपीसी को पढ़ने से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति जो आपराधिक कानून (यू.पी. संशोधन अधिनियम, 1961) के लागू होने से पहले या बाद में किसी दूसरे व्यक्ति की किसी संपत्ति पर अनधिकृत कब्ज़ा करने या उसका अनधिकृत उपयोग करने के इरादे से प्रवेश करता है और दूसरे व्यक्ति के लिखित Notice का पालन करते हुए, जो उसे विधिवत दिया गया हो, नोटिस में निर्दिष्ट तारीख तक ऐसी संपत्ति से, या उसके कब्ज़े या उपयोग से हटने में विफल रहता है, तो उसे “आपराधिक अतिचार” करने वाला कहा जाएगा.

कोर्ट ने कहा कि, यह माना जाता है कि ऐसी संपत्ति या उसके कब्जे या जमीन के इस्तेमाल से पीछे हटने के लिए जो कथित तौर पर किसी दूसरे व्यक्ति यानी विपक्षी पार्टी नंबर 2 की है, आवेदकों को कोई लिखित Notice नहीं दिया गया है, इसलिए आवेदकों के लिए ऐसे नोटिस का पालन करने का कोई मौका नहीं था और इसके विपरीत, नोटिस का पालन न करने के कारण, “आपराधिक अतिचार” का कोई अपराध नहीं माना जा सकता.

इन तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए, आवेदक के खिलाफ धारा 447 I.P.C. के तहत चार्जशीट दायर की गई है, जिस पर संबंधित माननीय न्यायालय द्वारा अपराध का संज्ञान लिया गया था, जो कानून की नजर में गलत है. इसे देखते हुए, धारा 447 आईपीसी के तहत पारित संज्ञान आदेश को केवल आवेदक के संबंध में रद्द किया जाता है.

जहाँ तक धारा 434, 504, 506 IPC के तहत अपराधों का संबंध है, वे ट्रायल का विषय हैं और इसलिए, संबंधित माननीय न्यायालय को निर्देश दिया जाता है कि वह आवेदक के खिलाफ धारा 447 आईपीसी को छोड़कर केवल धारा 434, 504, 506 IPC के तहत ट्रायल आगे बढ़ाए.

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