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Cognizance लेते समय मजिस्ट्रेट धाराएं जोड़ या हटा नहीं सकते

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, मजिस्ट्रेट इस शक्ति का इस्तेमाल आरोप तय करते समय कर सकते हैं

Cognizance लेते समय मजिस्ट्रेट धाराएं जोड़ या हटा नहीं सकते

न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास केस का Cognizance लेने के स्टेज पर चार्जशीट में बताए गए किसी भी दंड प्रावधान को जोड़ने, घटाने, शामिल करने या हटाने का अधिकार नहीं है. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि ऐसी शक्ति (Cognizance) का इस्तेमाल न्यायिक मजिस्ट्रेट केवल आरोप तय करने के स्टेज पर कर सकता है. बेंच ने साफ किया कि एक बार पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञान लेने के बाद, आरोपी चार्जशीट में बताए गए अपराधों की लागू होने पर विवाद होने पर डिस्चार्ज का कानूनी उपाय अपना सकता है.

आवेदकों के वकील ने बताया कि आवेदक के छेड़छाड़ और उसके खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने के आरोप में फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट दर्ज कराई है. फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों के आधार पर केस क्राइम नंबर 369/2023, थाना कोतवाली चुनार, मिर्जापुर में भारतीय दंड संहिता की धारा 354A, 504 और 506 के तहत दर्ज किया गया था.

आवेदकों के वकील ने बताया कि पीड़िता ने धारा 161 के तहत दर्ज अपने बयानों और धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज गवाही में एफआईआर के वर्जन का समर्थन नहीं किया है. जांच के बाद, पुलिस ने आवेदकों के खिलाफ धारा 354A, 504 और 506 I.P.C. के तहत चार्जशीट दाखिल की है. आवेदकों के वकील ने आगे बताया कि यह मामला एक जवाबी कार्रवाई है, क्योंकि विभाग द्वारा पहले पीड़िता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई थी.

बेंच सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एक एप्लीकेशन पर सुनवाई कर रही थी. जांच के बाद दायर चार्जशीट के आधार पर एक ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा पारित Cognizance-सह-समन आदेश को रद्द करने की मांग की गई थी. यह मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 354A, 504 और 506 के तहत अपराधों के लिए याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दर्ज FIR से शुरू हुआ. जांच पूरी होने पर पुलिस ने उन्हीं प्रावधानों के तहत चार्जशीट दाखिल की.

कोर्ट ने याचिका में दखल देने से इनकार कर दिया. बेंच ने स्टेट ऑफ गुजरात बनाम गिरीश राधाकृष्णन वर्दे (2014) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए कानून का रिफरेंस केस में दिया. कोर्ट ने दोहराया कि न्यायिक मजिस्ट्रेट या कोर्ट काग्निजेंस लेते समय चार्जशीट में बताई गई किसी भी धारा को जोड़ या घटा नहीं सकते, क्योंकि यह आरोप तय करते समय ही संभव है.

कोर्ट ने कहा कि चार्ज फ्रेम करने की स्टेज से पहले, आरोपी के पास Arnesh Kumar vs. State of Bihar; 2014 (8) SCC 273 और Satyendra Kumar Antil vs. Central Bureau of Investigation and Another; 2021 (10) SCC 773 के फैसलों में बताई गई शर्तों के अनुसार उपाय उपलब्ध है, कि आरोपी को F.I.R. में बताए गए अपराध के लिए जांच के दौरान हिरासत में नहीं लिया जा सकता है और आरोपी एफआईआर को रद्द करने या जांच के दौरान गिरफ्तारी पर रोक लगाने के लिए रिट याचिका दायर कर सकता है या सक्षम अदालत के सामने अग्रिम जमानत या नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकता है और डिस्चार्ज की कार्यवाही में भाग ले सकता है.

न्यायिक मजिस्ट्रेट ने चार्जशीट के आधार पर अपराधों का Cognizance लिया

कोर्ट में कहा गया कि कानूनी वारिस की परिभाषा स्पष्ट करता है न्यायिक मजिस्ट्रेट ने चार्जशीट के आधार पर अपराधों का काग्निजेंस (Cognizance) लिया और याचिकाकर्ताओं को समन जारी किया. इससे दुखी होकर, याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट में समन (Cognizance) आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग करते हुए याचिका दायर की, यह तर्क देते हुए कि लागू की गई धाराओं के तहत कोई अपराध नहीं बनता है.

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि मजिस्ट्रेट को काग्निजेंस (Cognizance) के चरण में चार्जशीट में बताई गई धाराओं की सही होने की जांच करनी चाहिए थी और उन प्रावधानों को हटा देना चाहिए था जो कथित तौर पर लागू नहीं होते थे. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट का संज्ञान लेने के चरण में मजिस्ट्रेट की शक्तियों के दायरे की जांच की.

यह मानते हुए कि ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने चार्जशीट का संज्ञान लेते समय अपने अधिकार क्षेत्र में काम किया था, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सेक्शन 482 CrPC के तहत आवेदन खारिज कर दिया और आवेदकों को ट्रायल कोर्ट के सामने डिस्चार्ज का उपाय अपनाने के लिए कहा. साथ ही कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को कानून के अनुसार चार्ज फ्रेम करने का निर्देश दिया.

Case: Pawan Kumar Singh & Ors. v. State of Uttar Pradesh & Anr. (Neutral Citation: 2025:AHC:191246)

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