महिला की स्थायी नियुक्ति पर 60 दिन में फैसला ले UPSRTC

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) को निर्देश दिया है कि वह संविदा पर काम कर रही महिला की नियुक्ति स्थायी करने पर 60 दिन के भीतर फैसला ले. यह आदेश जस्टिस विकास बुधवार की बेंच ने दिया है. कोर्ट ने महिला को आदेश दिया है कि वह याचिका के साथ विस्तृत प्रत्यावेदन परिवहन निगम (UPSRTC) मेरठ के क्षेत्रीय प्रबंधक को भेजे ताकि वह इस पर फैसला ले सकें.
रिट याचिकाकर्ता का मामला यह है कि उनके पिता सुरेंद्र सिंह UPSRTC में ड्राइवर के रूप में कार्यरत थे. 08.11.2020 को उनकी मृत्यु हो गई. याचिकाकर्ता के पिता की मौत के बाद उसकी मां ने पति के स्थान पर नियुक्ति के लिए 02 मार्च 2021 को आवेदन प्रस्तुत किया. इसे संज्ञान लेते हुए विभाग (UPSRTC) ने 01 अप्रैल 2021 को संविदा के आधार पर नियुक्ति प्रदान कर दी. इसके बाद उन संविदा कर्मचारियों की एक सूची प्रकाशित की गई थी जिन्हें संविदा के आधार पर नियमित नियुक्ति दी गई है.
दावा क्षेत्रीय प्रबंधक UPSRTC मेरठ के समक्ष प्रस्तुत
याचिकाकर्ता के वकील ने न्यायालय का ध्यान 01 मई 2025 के पत्र संख्या 1432-CENT/25-17 निगम/92-2024 की ओर आकर्षित किया. उनका कहना था कि उनका नाम क्रमांक 42 पर दर्ज किया जाना चाहिए था. वकील ने दलील दी है कि उनके नाम का उल्लेख न करने का एकमात्र कारण यह है कि उनका साक्ष्य और अभिलेख उपलब्ध नहीं है. इस संबंध में दावा क्षेत्रीय प्रबंधक यूपीएसआरटीसी मेरठ (UPSRTC) के समक्ष प्रस्तुत किया जा चुका है.

यूपीएसआरटीसी (UPSRTC) के वकील की तरफ से दलील दी गयी कि चूंकि याचिकाकर्ता ने पहले ही अभ्यावेदन दे दिया है इसलिए उस पर निर्णय लिया जाएगा. इस दलील पर याचिकाकर्ता के वकील को कोई आपत्ति नहीं है और वह इसे सहर्ष स्वीकार करते हैं.
प्रतिद्वंदी पक्षों के तर्कों और उनके द्वारा अपनाए गए रुख पर विचार करते हुए कोर्ट ने रिट याचिका का निपटारा कर दिया और आदेश दिया कि याचिकाकर्ता याचिका की स्व-सत्यापित प्रति के साथ एक व्यापक प्रत्यावेदन प्रतिवादी के समक्ष प्रस्तुत करे. प्रतिवादी आदेश की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने की तिथि से दो महीने की अवधि के भीतर कानून के अनुसार याचिकाकर्ता के दावे पर निर्णय लेने के लिए आगे बढ़ेगा.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिट याचिका पर प्रतिवादियों से कोई प्रतिक्रिया मांगे बिना ही निर्णय लिया गया है. इस आदेश के पारित होने का यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि इस न्यायालय ने मामले के गुण-दोष पर विचार किया है.
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