सुप्रीम कोर्ट ने UGC के Regulation (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता संवर्धन हेतु विनियम-2026) पर लगाई रोक
19 मार्च को सुनवाई, बेंच ने कहा यह पूरी तरह से अस्पष्ट है और इसका दुरुपयोग संभव, अगले आदेश तक 2012 के Regulation लागू रहेंगे

बता दें इस Regulation को इसी महीने की 13 तारीख को गैजेट किया गया था. Regulation में कुल 11 कॉलम नोटीफाई किये गये थे जिसमें प्रस्तावना से लेकर अनुपालन न करने के परिणाम तक को डिटेल में बताया गया था. गुरुवार को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए दिये गये आदेश में कहा है कि फिलहाल नये Regulation पर रोक रहेगी और उच्च शिक्षण संस्थान 2012 में लागू किये गये Regulation के अनुसार काम करते रहेंगे.
बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक रिट याचिका दायर की गई थी जिसमें 13 जनवरी, 2026 को नोटिफाइड यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन नोटिफिकेशन (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता संवर्धन हेतु विनियम, 2026) जनवरी, 2026 के Regulation 3(c) (जाति आधारित भेदभाव का अर्थ अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों एवं अन्य पिछड़े वर्गों के सदस्यों के विरुद्ध केवल जाति या जनजाति के आधार पर भेदभाव है) की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी.
बुधवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने क्लीयर कर दिया था कि वह इस मामले की सुनवाई करेगी. गुरुवार को सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा, पहली नजर में, हमें यह कहते हुए दु:ख हो रहा है कि Regulation पूरी तरह से अस्पष्ट हैं. प्रावधानों का दुरुपयोग हो सकता है. भाषा को निश्चित रूप से फिर से तैयार करने या स्पष्ट करने की आवश्यकता है.
प्रतिवादियों की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट में पक्ष रखा. कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी करके 19 मार्च 2026 तक जवाब दाखिल करने को कहा. सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रतिवादी की ओर से नोटिस स्वीकार किया.
Regulation के सेक्शन 3(c) का उल्लेख सुनवाई के दौरान किया
याचिकाकर्ता एक वकील है और उन्होंने Regulation के सेक्शन 3(c) का उल्लेख सुनवाई के दौरान किया. अधिवक्ता ने कहा कि जब सेक्शन 3(e) (भेदभाव का अर्थ धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान, दिव्यांगता या इसमें से किसी एक के आधार पर किसी भी हितधारक के विरुद्ध कोई भी अनुचित, भेदभावपूर्ण या पक्षपातपूर्ण व्यवहार या ऐसा कोई कार्य, चाहे पर स्पष्ट हो या अंतर्निहित हो. इसमें ऐासा कोई भी विभेद, बहिष्कार, प्रतिबंध या पक्षपात भी शामिल है जिसका उद्देश्य या प्रभाव शिक्षा में समान व्यवहार को निष्प्रभावी या अक्षम करना है और विशेष रूप से किसी भी हितधारक या हितधारकों के समूह पर ऐसी शर्तें लगाना है जो मानवीय गरिमा के प्रतिकूल हों) पहले से ही मौजूद है, तो सेक्शन 3(c) की क्या जरूरत है. इससे समाज में और विभाजन पैदा होगा.
अधिवक्ता ने कहा, “धारा 3(c) के तहत यह परिभाषा अनुच्छेद 14 से पूरी तरह टकराती है, जब भेदभाव पहले से ही परिभाषित है, और यह नहीं माना जा सकता कि भेदभाव केवल एक वर्ग के खिलाफ है.” कोर्ट ने पूछा, “मान लीजिए दक्षिण का कोई छात्र उत्तर भारत में एडमिशन लेता है और ऐसे छात्र के खिलाफ किसी तरह की व्यंग्यात्मक, अपमानजनक और शर्मनाक टिप्पणियां की जाती हैं, और टिप्पणी करने वालों की जाति की पहचान भी पता नहीं है. क्या यह प्रावधान उस मुद्दे को हल करेगा?” वकील ने कहा वे यूनिवर्सिटी कैंपस को जातियों में बांट रहे हैं.
सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने कहा, “उचित यह था कि उन्हें इस न्यायालय में लंबित याचिका का उल्लेख करना चाहिए था, जिस प्रक्रिया की निगरानी न्यायालय इन नियमों को पारित करने के माध्यम से कर रहा है का कोई उल्लेख नहीं है. शिष्टाचार की मांग थी कि पूरी और खुली जानकारी दी जाए कि 2019 में ऐसी याचिका दायर की गई थी, जिसमें 2012 के नियमों को चुनौती दी गई थी, जिन्हें अब 2026 के नियमों ने बदल दिया है.”
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “2012 के नियमों की जांच करते समय, हम और पीछे नहीं जा सकते.” जस्टिस बागची ने कहा, “हम एक निष्पक्ष और समावेशी समाज बनाने पर विचार कर रहे हैं. अब इसे देखते हुए, जब 2(e) मौजूद है तो 2c कैसे प्रासंगिक हो जाता है. इसलिए, हम आपकी सहायता चाहेंगे सुश्री जयसिंह.” जयसिंह ने जवाब दिया, “हाँ, यह भेदभाव के अंदर भेदभाव का सवाल है.”

इस कोर्ट के सामने सवाल यह है कि ‘केवल’ शब्द का क्या मतलब है. सत्यम पांडे द्वारा दायर याचिका में कहा गया है, “इन अधिसूचित पिछड़े वर्गों के सदस्यों के खिलाफ ‘जाति-आधारित भेदभाव’ को विशेष रूप से परिभाषित करके, विवादित Regulation 3(c) उन्हें केवल जातियों के रूप में गलत तरीके से दिखाता है, संवैधानिक अंतर को नजरअंदाज करता है और सुरक्षा को पहले से तय वर्गों तक सीमित करता है, जबकि दूसरों को बाहर कर देता है जो अपनी वर्ग स्थिति की परवाह किए बिना जाति-आधारित दुश्मनी का सामना कर सकते हैं.
यह दृष्टिकोण मनमाना है, क्योंकि यह कुछ वर्गों को विशेष पीड़ित के रूप में ऊपर उठाता है, जबकि गैर-आरक्षित समूहों द्वारा झेले गए जाति-आधारित भेदभाव को मान्यता देने से इनकार करता है, जो संविधान में ‘वर्गों’ के उपयोग के पीछे समानता के इरादे का उल्लंघन करता है.”
राधिका वेमुला और अबेदा सलीम तडवी द्वारा 2019 में दायर एक जनहित याचिका के जवाब में, यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन ने कैंपस में जाति-आधारित भेदभाव को संबोधित करने और खत्म करने के लिए ये नियम बनाए. यह कानूनी कार्रवाई उनके बच्चों, रोहित वेमुला और पायल तडवी की आत्महत्या से हुई दुखद मौतों के बाद की गई, जिन्होंने कथित तौर पर अपने-अपने विश्वविद्यालयों में व्यवस्थित जाति-संबंधी उत्पीड़न का सामना किया था.
याचिका मुख्य रूप से “जाति-आधारित भेदभाव” की परिभाषा को चुनौती देती है और कहती है कि डिजाइन और संचालन के अनुसार, यह परिभाषा विशेष रूप से कुछ आरक्षित श्रेणियों को पीड़ित होने की कानूनी मान्यता देती है और सामान्य या उच्च जातियों से संबंधित व्यक्तियों को इसके सुरक्षात्मक दायरे से स्पष्ट रूप से बाहर करती है चाहे उनके द्वारा झेले गए भेदभाव की प्रकृति, गंभीरता या संदर्भ कुछ भी हो. इसमें यह भी कहा गया है कि ऐसी परिभाषा शुरुआत में ही बहिष्कार को संस्थागत बनाती है, पीड़ित होने की एक पदानुक्रम बनाती है, और एक नियामक ढांचे में संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य पूर्वाग्रह पेश करती है जो तटस्थ और समावेशी होने का दावा करता है.
Cause Title: Mritunjay Tiwari v. Union of India & Ors. [Diary No. 4985/2026]
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