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‘नबी पैगंबर’ के खिलाफ Social Media Post पर केस रद्द करने से इंकार, कोर्ट ने कहा, बीएनएसएस की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट की शक्तियों का इस्तेमाल कम से कम किया जाना चाहिए

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, आरोपी के बचाव की जांच के लिए “मिनी-ट्रायल” करने की उम्मीद नहीं की जाती

'नबी पैगंबर' के खिलाफ Social Media Post पर केस रद्द करने से इंकार, कोर्ट ने कहा, बीएनएसएस की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट की शक्तियों का इस्तेमाल कम से कम किया जाना चाहिए

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘नबी पैगंबर’ के खिलाफ सोशल मीडिया Post करने के आरोपिता के खिलाफ शुरू की गयी क्रिमिनल केस प्रोसीडिंग को रद करने से इंकार कर दिया है. तथ्यों को परखने के बाद कोर्ट का निष्कर्ष था कि Post में इस्तेमाल किए गए शब्द साफ तौर पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए जानबूझकर और गलत इरादे से लिखे गए. जस्टिस सौरभ श्रीवास्तव की बेंच ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि बीएनएसएस की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट की शक्तियों का इस्तेमाल कम से कम किया जाना चाहिए. समन के स्तर पर हाईकोर्ट से आरोपी के बचाव की जांच के लिए मिनी-ट्रायल करने की उम्मीद नहीं की जाती.

यह रिट याचिका सोनभद्र के मनीष तिवारी की तरफ से दाखिल की गयी थी. उस पर मुस्लिम समुदाय के पैगंबर के खिलाफ फेसबुक पर Post करने के आरोपों पर केस दर्ज किया गया है.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रॉसिक्यूशन की ओर से कहा गया कि मुस्लिम कम्युनिटी के कुछ लोग इस काम से नाराज हैं, क्योंकि इससे उनकी धार्मिक भावनाएं आहत हो रही थीं. पुलिस ने इंवेस्टिगेशन के बाद चार्जशीट दाखिल कर दी तो मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सोनभद्र ने इसे संज्ञान लिया और समन जारी किया.

याची ने चार्जशीट और समन आर्डर को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में रिट दाखिल करके सम्पूर्ण प्रक्रिया रद करने की मांग की. कोर्ट में आरोपी की तरपफ से तर्क दिया गया कि संबंधित सीजेएम ने अपनी न्यायिक समझ का इस्तेमाल किए बिना चार्जशीट को संज्ञान लिया गया है. उसका तर्क था कि उसने कभी मुस्लिम धर्म के खिलाफ कोई कमेंट (Post) नहीं किया.

उसके अधिवक्ता की तरफ से कोर्ट में कहा गया कि आवेदक के सबसे करीबी व्यक्ति ने आवेदक के मोबाइल नंबर का इस्तेमाल करके सोशल मीडिया फेसबुक पर यह कमेंट Post किया था. आरोपी को पुलिस मामले में झूठा फंसा रही है. याची के अधिवक्ता की ओर से कहा गया कि उसके खिलाफ कोई अपराध नहीं बनता इसलिए चार्जशीट और समन ऑर्डर रद किया जाय.

Post में इस्तेमाल किए गए शब्द एक खास वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के इरादे से लिखे गए

कोर्ट ने आवेदक द्वारा की गई खास टिप्पणी सहित रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखने के बाद आरोपी के वकील की दलीलों में कोई दम नहीं पाया. बेंच ने कहा, रिकॉर्ड पर मौजूद मटीरियल जिसमें एप्लीकेंट का कमेंट Post भी शामिल है, को देखने से कोर्ट पाता है कि Post में इस्तेमाल किए गए शब्द साफ तौर पर समुदाय के एक खास हिस्से या देश के नागरिकों के एक खास वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के जानबूझकर और गलत इरादे से लिखे गए.

इस तर्क पर कि मोबाइल का किसी और ने गलत इस्तेमाल किया, कोर्ट ने इसे तथ्यों से जुड़ा बताया और कहा कि ट्रायल कोर्ट सुबूतों को पूरी तरह से परखने के बाद ही अपना फैसला सुनाएगी. बेंच ने कहा कि ऐसे तथ्यात्मक विवादों को बीएनएसएस की धारा 528 के तहत कार्रवाई में पक्के तौर पर तय नहीं किया जा सकता.

हाईकोर्ट ने एस.डब्ल्यू. पलानीटकर और अन्य बनाम बिहार राज्य और अन्य (2001) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि, लागू किया जाने वाला टेस्ट यह है कि क्या “कार्रवाई के लिए आधार काफी है” न कि क्या “दोषी ठहराए जाने के लिए काफी आधार है.” कोर्ट ने यह भी कहा कि समन के स्टेज पर मटीरियल पर विचार करना अभी भी टेंटेटिव है. बेंच ने साफ किया कि मजिस्ट्रेट को सिर्फ पहली नजर में राय दर्ज करनी है.

Case title – Manish Tiwari vs. State of U.P. and Another

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