+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

रिटायर्ड दरोगा के 6,99,779, रूपये की Recovery आदेश रद

रिटायर्ड दरोगा के 6,99,779, रूपये की Recovery आदेश रद

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त होने के छः साल बाद 6,99,779 रूपये की सहायक पुलिस उपनिरीक्षक से एसएसपी बरेली की Recovery कार्रवाई रद कर दी है. कोर्ट ने कहा यह नहीं बता सके कि सेवानिवृत्त कर्मी से कदाचार के आरोप में धन की वसूली (Recovery) का कोई उपबंध या शक्ति सेवा नियमावली में है या नहीं. कोर्ट ने एसएसपी को दो माह में नियमानुसार आदेश पारित करने के लिए प्रकरण वापस कर दिया है. यह आदेश जस्टिस विकास बुधवार ने सुनील कुमार की याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है.

याचिका पर अधिवक्ता इरफान अहमद मलिक ने बहस की. इनका कहना था कि याची 15 अक्टूबर 17 को सेवानिवृत्त हुआ. इसके छः साल बाद 2025 मे एसएसपी ने सीओ से प्रारंभिक जांच कराई, रिपोर्ट में याची को कदाचार का दोषी पाया गया और एस एस पी ने 6,99,779 रूपये के याची को सफाई का मौका देने के बाद वसूली करने का आदेश दिया. 16 जुलाई 25 को पारित इस आदेश को इस आधार पर चुनौती दी गई कि सेवानिवृत्त कर्मी के खिलाफ वसूली कार्रवाई नहीं की जा सकती. सेवा नियमावली में ऐसा कोई उपबंध नहीं है. जिस पर कोर्ट ने वसूली कार्रवाई रद कर दी.

नोटिस के बिना रिटायर कर्मचारी से Recovery का एसपी मेरठ का आदेश रद, हाई कोर्ट ने रीप्रजेंटेशन डिसाइड करने के लिए अथॉरिटी को भेजा

रिटायर्ड दरोगा के 6,99,779, रूपये की Recovery आदेश रद

ऐसा कोई भी आदेश (Recovery), जिसका असर किसी कर्मचारी को सिविल परिणामों का सामना करना पड़े, संबंधित व्यक्ति को नोटिस दिए बिना और मामले में उसकी सुनवाई किए बिना पारित नहीं किया जाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट द्वारा भगवान शुक्ला बनाम भारत संघ और अन्य मामले में फैसला सुनाते हुए दी गई उपरोक्त व्यवस्था का अनुपालन करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एसएसपी मेरठ द्वारा रिटायर कर्मचारी से Recovery के आदेश को रद कर दिया है. कोर्ट ने मामले को नए आदेश पारित करने के लिए अथॉरिटी को वापस भेजने का निर्देश दिया है. यह आदेश जस्टिस विकास बुधवार ने दिया है.

फैसले में उन्होंने निर्देश दिया है कि Recovery मामले के जल्दी निपटारे के लिए, पार्टी संबंधित अथॉरिटी के सामने रिट याचिका की सेल्फ-अटेस्टेड कॉपी के साथ एक विस्तृत रिप्रेजेंटेशन पेश करेगी, जो उस कार्यवाही पर जल्द से जल्द फैसला करेगी। इसके बाद, अथॉरिटी रिट याचिकाकर्ता को सुनवाई की तारीख तय करके नोटिस देगी और अगर किसी इनपुट की जरूरत होती है, तो उसे रिट याचिकाकर्ता द्वारा आवेदन के जरिए जमा किया जाएगा और आदेश की सर्टिफाइड कॉपी पेश करने की तारीख से तीन महीने की अवधि के भीतर एक नया आदेश पारित किया जाएगा. इन निर्देशों के साथ कोर्ट ने याचिका का निबटारा कर दिया है.

रिट याचिकाकर्ता का मामला यह था कि वह 28 फरवरी 2023 को सब-इंस्पेक्टर के पद से सेवानिवृत्त हुआ. एसएसपी, मेरठ द्वारा 27 अगस्त 2022 और 18 अप्रैल 2023 के आदेशों के माध्यम से उसके वेतन का पुनर्निर्धारण किया गया और Recovery का निर्देश दिया गया.

याचिकाकर्ता के वकील का कहना है कि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है. यह धोखाधड़ी, छिपाने या गलत बयानी का मामला नहीं है. दूसरी ओर स्थायी अधिवक्ता का कहना था कि विवादित Recovery आदेश में यह नहीं लिखा है कि रिट याचिकाकर्ता को नोटिस दिया गया था, लेकिन उनके अनुसार, नियोक्ता के लिए की गई गलती को सुधारना हमेशा खुला रहता है.

कोर्ट ने दोनों ओर से दिए गए तर्कों को सुना और रिकॉर्ड का ध्यान से अध्ययन किया और माना कि एसएसपी मेरठ द्वारा पारित आदेशों से यह नहीं पता चलता है कि रिट याचिकाकर्ता को नोटिस दिया गया था. सर्वोच्च न्यायालय ने भगवान शुक्ला बनाम भारत संघ और अन्य के मामले में; (1994) 6 SCC 154 में नीचे दिए गए अनुसार ऑब्जर्व किया गया था:

“3. हमने पार्टियों के विद्वान वकील को सुना है। यह विवादित नहीं है कि याचिकाकर्ता की बेसिक सैलरी 1970 से 190 रुपये प्रति माह तय की गई थी। इसमें भी कोई विवाद नहीं है कि अपीलकर्ता की बेसिक सैलरी 1991 में 18.12.1970 से पिछली तारीख से 190 रुपये प्रति माह से घटाकर 181 रुपये प्रति माह कर दी गई थी.

अपीलकर्ता को स्पष्ट रूप से सिविल परिणामों का सामना करना पड़ा है, लेकिन उसे अपनी बेसिक सैलरी में कमी के खिलाफ कारण बताने का कोई मौका नहीं दिया गया था. विभाग द्वारा उसकी सैलरी कम करने से पहले उसे नोटिस भी नहीं दिया गया था और कानून में बताई गई किसी भी प्रक्रिया का पालन किए बिना उसकी पीठ पीछे आदेश दिया गया था.

इस प्रकार, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन हुआ है और अपीलकर्ता को बिना सुने भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा है. कार्रवाई में निष्पक्षता यह मांग करती है कि ऐसा कोई भी आदेश, जिसका असर किसी कर्मचारी को सिविल परिणामों का सामना करना पड़े, संबंधित व्यक्ति को नोटिस दिए बिना और मामले में उसकी सुनवाई किए बिना पारित नहीं किया जाना चाहिए- चूंकि ऐसा नहीं किया गया, इसलिए 25.7.1991 का आदेश (मेमोरेंडम), जिसे ट्रिब्यूनल के सामने चुनौती दी गई थी, निश्चित रूप से कायम नहीं रखा जा सकता था और केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल ने अपीलकर्ता की याचिका खारिज करके गलती की.

ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द करने योग्य है. तदनुसार, हम इस अपील को स्वीकार करते हैं और केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल के आदेश के साथ-साथ ट्रिब्यूनल के सामने चुनौती दिए गए आदेश (मेमोरेंडम) को भी रद्द करते हैं, जिसमें अपीलकर्ता की बेसिक सैलरी घटा दी गई थी.”

जस्टिस बुधवार ने कहा कि चूंकि यह स्पष्ट नहीं है कि चुनौती दिए गए Recovery आदेश के लिए रिट याचिकाकर्ता को नोटिस दिया गया था, इसलिए इस न्यायालय के पास आदेश को रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

इसे भी पढ़ें…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *