Gambling Act की धारा 13 के तहत संज्ञेय अपराध है पब्लिक प्लेस पर जुआ खेलना, पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार: HC

पब्लिक प्लेस या सड़क पर जुआ (Gambling) खेलना Public Gambling Act, 1867 की धारा 13 के तहत दंडनीय है संज्ञेय अपराध है, क्योंकि इस प्रावधान में पुलिस अधिकारी को बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार दिया गया है. यह फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस विवेक सिंह की सिंगल बेंच ने दिया है. कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 2(सी) के आवश्यक निहितार्थों को देखते हुए पुलिस ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति के बिना एफआईआर दर्ज कर जांच भी कर सकती है. इसके साथ ही कोर्ट ने याचिका दाखिल करने वाले को कोई राहत नहीं दी. ट्रायल कोर्ट को यह डायरेक्शन जरूर दिया कि वह सुनवाई की रफ्तार तेज करे और मामले को तीन महीने में निस्तारित करे.
यह याचिका आगरा निवासी कमरान की तरफ से दाखिल की गयी थी. याचिकाकर्ता ने अपने खिलाफ विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट आगरा की कोर्ट में पेंडिंग क्रिमिनल प्रोसीडिंग (Gambling Act) को रद्द करने की मांग की थी. उसे दिसंबर 2019 में अभियुक्त को आगरा के सिकंदरा क्षेत्र के एक पार्क में अपने सह-आरोपियों के साथ जुआ (Gambling) खेलते हुए गिरफ्तार किया गया था. पुलिस ने उनके पास से नकद रुपये और ताश के पत्ते बरामद किये. पुलिस ने आन द स्पॉट हुई गिरफ्तारी को देखते हुए उनके खिलाफ सार्वजनिक स्थान पर जुआ खेलते पकड़े जाने पर Gambling Act 1867 की धारा 13 के तहत रिपोर्ट दर्ज की और विवेचना के बाद चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की.
इलाहाबाद हाई कोर्ट में गुहार लगाने वाले आरोपित की ओर से दलील दी गई कि उत्तर प्रदेश में धारा 13 के तहत प्रथम अपराध के लिए अधिकतम सजा एक माह का कारावास है. सीआरपीसी के प्रावधानों के अनुसार तीन वर्ष से कम सजा वाले अपराध सामान्यतः असंज्ञेय होते हैं. इसलिए, पुलिस न तो ऐसे मामले में बिना मजिस्ट्रेट के आदेश के गिरफ्तारी कर सकती थी और न ही जांच शुरू कर सकती थी.
सीआरपीसी की धारा 155(2) का हवाला देते हुए कहा गया कि असंज्ञेय मामलों में मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस जांच नहीं कर सकती. चूंकि वर्तमान मामले में ऐसी कोई अनुमति नहीं ली गई, इसलिए पूरी कार्यवाही को प्रारंभ से ही शून्य माना जाना चाहिए.
पुलिस अधिकारी बिना वारंट सार्वजनिक स्थान पर जुआ (Gambling) खेलता हुए गिरफ्तार कर सकता है
याचिका खारिज करते हुए जस्टिस विवेक कुमार सिंह ने कहा कि पब्लिक Gambling Act की धारा 13 में कहा गया है कि पुलिस अधिकारी बिना वारंट किसी भी व्यक्ति को, जो सार्वजनिक स्थान पर जुआ (Gambling) खेलता हुए मिले उसे गिरफ्तार कर सकता है. कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 2(सी) का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस अपराध में किसी अन्य प्रचलित कानून के तहत बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार दिया गया हो, वह संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आएगा.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन निर्णयों में एक्ट की धारा 3 और 4 को असंज्ञेय माना गया है, वे अलग परिस्थितियों और कानूनी प्रावधानों पर आधारित थे और वर्तमान मामले पर लागू नहीं होते. हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस ने बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति एफआईआर दर्ज करने और आरोपपत्र दाखिल करने में कोई अवैधता नहीं की. मजिस्ट्रेट द्वारा चार्जशीट को संज्ञान लेने में भी कोई त्रुटि नहीं पाई गई. अपराध की मामूली प्रकृति को ध्यान में रखते हुए हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि मुकदमे का निपटारा तीन माह के भीतर किया जाए.
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