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1 सूट की Hearing में तेजी के लिए याचिका पर विचार करना अनुचित

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जल्द सुनवाई की मांग में दाखिल याचिका को किया खारिज

1 सूट की Hearing में तेजी के लिए याचिका पर विचार करना अनुचित

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ एक सूट की Hearing में तेजी लाने के मकसद से संविधान के आर्टिकल 226 या आर्टिकल 227 के तहत रिट याचिका पर विचार करना कोर्ट के लिए अनुचित होगा. हाई कोर्ट द्वारा ऐसे किसी भी निर्देश को बहुत सावधानी और सोच-समझकर जारी किया जाना चाहिए नहीं तो सिविल कोर्ट सिर्फ उन मुकदमों के तेजी से निपटारे के अनुरोधों से भर जाएंगे जिन्हें हाई कोर्ट ने तेजी से निपटाने (Hearing ) का आदेश दिया है.  

ज्यादातर याचिकाकर्ता हाई कोर्ट जाने का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं, वे ऐसे आदेश का लाभ उठाने की स्थिति में नहीं होंगे. ऐसे आदेश दिए जाते हैं तो याचिकाकर्ताओं के एक वर्ग को एक अलग और पसंदीदा श्रेणी में रख देंगे. यह आदेश जस्टिस मनीष कुमार निगम ने संत कबीरनगर की याचिकाकर्ता की रिट का निस्तारण करते हुए दिया है.

यह रिट याचिका सिविल जज जूनियर डिवीजन संत कबीर नगर को बिक्रीनामा रद्द करने और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए मूल मुकदमा संख्या 193/2021 (उमा और अन्य बनाम उर्मिला) को जल्द से जल्द, यदि संभव हो तो इस माननीय न्यायालय द्वारा तय की गई अवधि के भीतर, तय करने का आदेश या निर्देश जारी करने की मांग करते हुए दाखिल की गयी थी.

कोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलों और आर्डर शीट को देखा तो संज्ञान में आया कि उक्त मुकदमा पेंडिंग हैं और  Hearing के लिए कई तारीखें लग चुकी हैं. कोर्ट ने अली शाद उस्मानी बनाम अली इस्तेबा; 2015 (2) ADJ 250 (DB) मामले में इस न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले का जिक्र किया जिसमें स्पष्ट किया गया था कि ऐसा कोई निर्देश  (Hearing )  जारी नहीं किया जा सकता है.

इस न्यायालय की डिवीजन बेंच ने अली शाद उस्मानी (उपरोक्त) मामले में यह माना है कि अधीनस्थ न्यायालयों को निर्धारित अवधि के भीतर मुकदमा तय करने के लिए कोई निर्देश  (Hearing ) जारी नहीं किया जा सकता है.

“हम एक सिविल सूट की तेज़ी से सुनवाई  (Hearing ) के लिए निर्देश जारी करने के इच्छुक नहीं हैं, जो सिविल जज (जूनियर डिवीजन), जिला-आजमगढ़ के सामने पेंडिंग है. सिर्फ एक सूट की सुनवाई  (Hearing ) में तेजी लाने के मकसद से संविधान के आर्टिकल 226 या आर्टिकल 227 के तहत रिट याचिका पर विचार करना कोर्ट के लिए सबसे अनुचित होगा. ऐसे आदेश, अगर दिए जाते हैं, तो याचिकाकर्ताओं के एक वर्ग को एक अलग और पसंदीदा श्रेणी में रखते हैं, जबकि अन्य मामले जो समान या उससे भी पुराने और जरूरी हो सकते हैं, उन्हें सामान्य तरीके से तय करने के लिए छोड़ दिया जाता है.
अली शाद उस्मानी केस में डिवीजन बेंच का कमेंट

संबंधित कोर्ट के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि क्या तेज  Hearing के लिए कोई आधार बनता है

यह संबंधित कोर्ट के विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए कि क्या तेजी  (Hearing ) के लिए कोई आधार बनता है. अली शाद उस्मानी केस में दो जजों की बेंच ने यह भी कहा था कि, हम इस बात पर जोर देते हैं कि ऐसे अन्य मामले भी हो सकते हैं जैसे कि वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े मामले, दिव्यांगों से जुड़े मामले तेजी से निपटारे का मुख्य कारण हो सकते हैं.

हर मामले में विद्वान ट्रायल जज पर निर्भर करता है कि वह अपने विवेक का इस्तेमाल करें और तय करें कि सूट की सुनवाई  (Hearing ) में तेजी लाई जानी चाहिए या नहीं. डबल बेंच के फैसले को नोटिस लेते हुए जस्टिस मनीष कुमार निगम की बेंच ने कहा कि, हम याचिका पर विचार करने के इच्छुक नहीं हैं. कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया है.

कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता है कि वह कानून के अनुसार निचली अदालत यानी सिविल जज (जूनियर डिवीजन), संत कबीर नगर के समक्ष उपरोक्त मुकदमे के शीघ्र निपटारे के लिए एक उचित आवेदन प्रस्तुत कर सकता है और यदि ऐसा कोई आवेदन प्रस्तुत किया जाता है तो निचली अदालत उचित समय के भीतर उचित आदेश पारित करेगी.

Matter Under Article 227 No. 15267/2025 Uma and 2 other’s V/s Urmila

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