‘Will’ के मामलों में न्यायिक विवेक संतुष्ट होना चाहिए, ट्रायल कोर्ट के 2023 के फैसले पर हाई कोर्ट ने लगायी मुहर
कोर्ट ने कहा, ठोस सबूतों से साबित परिस्थितियों को चैलेंज करने के लिए आसपास की संदिग्ध परिस्थितियों को दूर करना अनिवार्य शर्त

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि ठोस सबूतों से साबित परिस्थितियों से कथित वसीयत (Will) पेश करने वाले के लिए कथित वसीयत (Will) के निष्पादन के आसपास की संदिग्ध परिस्थितियों को दूर करना अनिवार्य शर्त है. वसीयत (Will) के ऐसे मामलों में न्यायिक विवेक संतुष्ट होना चाहिए कि कथित वसीयत (Will) वास्तव में वसीयतकर्ता द्वारा निष्पादित की गई थी और यह वसीयतकर्ता की आखिरी वसीयत (Will) थी. इस कमेंट के साथ जस्टिस संदीप जैन ने वसीयत पर ट्रायल कोर्ट के फैसले को चैलेंज करने वाली याचिका खारिज कर दी है. बेंच ने कहा कि इस मामले में न्यायिक विवेक संतुष्ट नहीं हुआ है. कथित वसीयत (Will) का निष्पादन गंभीर संदेह के घेरे में है.
बेंच ने कहा, ट्रायल कोर्ट ने 25 मई 2002 की कथित वसीयत पेश करने वाले के प्रोबेट एप्लीकेशन को खारिज करने और 20 सितंबर 1996 की पिछली वसीयत (Will) पेश करने वाले के प्रोबेट एप्लीकेशन को स्वीकार करने में कोई गलती नहीं की है. जस्टिस संदीप जैन ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद फैसला 28 नवंबर को सुरक्षित रख लिया था जिसे 16 दिसंबर को सुनाया गया.
यह मामला वाराणसी जनपद का था. राकेश श्रीवास्तव और अन्य लोगों ने भारतीय सक्सेशन एक्ट, 1925 की धारा 299 के तहत एडिशनल डिस्ट्रिक्ट और सेशंस जज कोर्ट नंबर एक वाराणसी की अदालत द्वारा प्रोबेट केस नंबर 26 ऑफ 2007 राकेश श्रीवास्तव और अन्य बनाम श्रीमती सुधा श्रीवास्तव और अन्य में 18 अक्टूबर 2023 को सुनाये गये फैसले और आदेश के खिलाफ पहली अपील संख्या 1274 ऑफ 2023 दायर की.
आदेश के तहत परमानंद लाल श्रीवास्तव (वसीयतकर्ता) द्वारा 25 मई 2002 में निष्पादित कथित वसीयत (Will) के संबंध में प्रोबेट मांगने वाला आवेदन खारिज कर दिया गया था.
राकेश श्रीवास्तव और अन्य लोगों ने एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज कोर्ट नंबर 1 वाराणसी की अदालत द्वारा प्रोबेट केस नंबर 27 ऑफ 2007 श्रीमती सुधा श्रीवास्तव और अन्य बनाम कृष्ण कुमार श्रीवास्तव और अन्य में पारित 18 अक्टूबर 2023 के फैसले और आदेश के खिलाफ पहली अपील संख्या 1276 ऑफ 2023 दायर की जिसमें परमानंद लाल श्रीवास्तव (वसीयतकर्ता) द्वारा 20 सितंबर 1996 को निष्पादित पंजीकृत वसीयत (Will) के संबंध में प्रोबेट मांगने वाला आवेदन स्वीकार कर लिया था.
प्रोबेट केस नंबर 26 और 27 की सुनवाई निचली अदालत ने एक साथ की और सामान्य फैसले और आदेश से फैसला किया. चूंकि पहली अपील संख्या 1274 ऑफ 2023 और 1276 ऑफ 2023 एक ही फैसले और आदेश से उत्पन्न हुई हैं, इसलिए दोनों अपीलों की सुनवाई एक साथ की गई और इस सामान्य फैसले से फैसला किया जा रहा है.
यह मामला वादी श्रीमती सुधा श्रीवास्तव ने प्रतिवादी कृष्ण कुमार श्रीवास्तव और अन्य के खिलाफ अपने पिता परमानंद लाल श्रीवास्तव (वसीयतकर्ता) द्वारा 1996 में निष्पादित पंजीकृत वसीयत (Will) के संबंध में प्रोबेट मांगने के लिए दायर किया था, जिनकी मृत्यु 22.11.2002 को हुई थी.
Will करने वाले के अकेले नाम पर थी और दूसरी संपत्तियां ज्वाइंट ओनरशिप में थीं

वादी ने कहा कि वसीयतकर्ता ने मकान नं. B.26/116-A जो नवाबगंज, भेलूपुरा, वाराणसी में है, को अपनी बुआ गुजराती देवी से लिया था और बाकी अचल संपत्ति पुश्तैनी खेती की जमीन थी, जो वसीयत (Will) करने वाले के अकेले नाम पर थी और दूसरी संपत्तियां ज्वाइंट ओनरशिप में थीं. बताया गया कि वसीयतकर्ता ने अपनी आखिरी वसीयत (Will) अपनी मर्जी से वादी के पक्ष में लिखी थी जिसके जरिए आधी प्रॉपर्टी उसे मिली है.
प्रतिवादी राकेश श्रीवास्तव ने प्रोबेट आवेदन का इस आधार पर विरोध किया कि वसीयतकर्ता ने 2002 में गवाहों विनोद कुमार सिंह और लालजी की मौजूदगी में, कृष्ण कुमार, अवधेश कुमार, मदन कुमार, मनोज कुमार, संतोष कुमार और राकेश लाल के पक्ष में एक वसीयत लिखी थी, जिसमें यह साफ किया गया था कि वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद उसकी अचल संपत्ति कृष्ण कुमार और अन्य को मिलेगी, जबकि चल संपत्ति सुधा श्रीवास्तव और राधा श्रीवास्तव के बेटों को मिलेगी. कहा गया कि वसीयतकर्ता की मृत्यु 22 नवंबर 2002 को हुई थी, इसलिए उसकी 25 मई 2002 की वसीयत (Will) प्रभावी हो गई है, जो वसीयतकर्ता की आखिरी वसीयत भी थी.
ट्रायल कोर्ट ने पक्षों द्वारा पेश किए गए दस्तावेजी और मौखिक सबूतों और संबंधित केस कानून की जांच करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि वसीयतकर्ता की 25.5.2002 की बाद की वसीयत के निष्पादन के आसपास संदिग्ध परिस्थितियां थीं, जो बाद की वसीयत को संदिग्ध बनाती हैं, खासकर इसलिए क्योंकि वसीयतकर्ता की पिछली वसीयत रजिस्टर्ड थी.
ट्रायल कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि 25.5.2002 की बाद की वसीयत संदिग्ध और एक मनगढ़ंत दस्तावेज थी, जिसके संबंध में कोई प्रोबेट नहीं दिया जा सकता है. ट्रायल कोर्ट ने 25.5.2002 की वसीयत का प्रोबेट मांगने वाले प्रोबेट केस नंबर 26/2007 को खारिज कर दिया है और 18.10.2023 के विवादित फैसले और आदेश से 20.9.1996 की रजिस्टर्ड वसीयत का प्रोबेट मांगने वाले प्रोबेट केस नंबर 27/2007 को मंजूरी दे दी थी.
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