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Invest UP मिशन को दागदार बनाने के आरोपी निशांत जैन कोर्ट से बेदाग छूटे, हाई कोर्ट ने रद की केस की सम्पूर्ण प्रोसीडिंग

इसी केस में इंवेस्ट यूपी के सीईओ आईएएस अभिषेक प्रकाश पर भी की गयी थी कार्रवाई

Invest UP मिशन को दागदार बनाने के आरोपी निशांत जैन कोर्ट से बेदाग छूटे, हाई कोर्ट ने रद की केस की सम्पूर्ण प्रोसीडिंग

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस राजीव सिंह ने Invest UP मिशन पर साल भर पहले धब्बा बनने वाले आईएएस अभिषेक प्रकाश के करीबी रहे निशांत जैन को बेदाग करार दिया है. कोर्ट ने तथ्यों का विश्लेषण करने और दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद कहा कि पूरे केस डायरी में ऐसा कोई सबूत नहीं है कि आवेदक को धमकी देकर कोई संपत्ति दी गई थी इसलिए जबरन वसूली का कोई अपराध नहीं बनता है. इसके साथ ही, केस डायरी में ऐसा कोई सबूत नहीं है कि आवेदक Invest UP या उच्च अधिकार प्राप्त समिति या कैबिनेट के सदस्यों के किसी अधिकारी को कोई अनुचित लाभ देता है या देने का वादा करता है. इससे आवेदक के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 8, 12 के तहत कोई अपराध भी नहीं बनता है.

बेंच ने कहा कि चूंकि कार्यवाही की बहुत नींव यानी शिकायतकर्ता (Invest UP Applicant) ने खुद ही अपनी पवित्रता खो दी है, इस कोर्ट को विवादित कार्रवाई को आगे बढ़ाने की कोई वजह नहीं दिखती. इसके आधार पर कोर्ट ने 15 मई 2025 को केस में दाखिल की गयी चार्जशीट, इसे संज्ञान लेते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा 17 मई 2025 को जारी किया गया समन ऑर्डर, सभी नतीजे वाली कार्रवाई और स्पेशल जज, भ्रष्टाचार निवारण एक्ट लखनऊ का 06 नवंबर 2025 का ऑर्डर जो प्रथम सूचना रिपोर्ट नंबर 111/2025 से जुड़े सेशन केस नंबर 730/2025 में सेक्शन 308(5) बीएनएस और प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 8/12 के तहत थाना गोमती नगर जनपद लखनऊ में पास किया गया था को कोर्ट ने रद्द कर दिया है.

बता दें कि इस केस ने प्रदेश में सुर्खियां बटोरी थी. भ्रष्टाचार का आरोप लगने के बाद आईएएस अभिषेक प्रकाश (CEO Invest UP) को सेवा से हटा दिया गया था और उनके करीबी बताये जाने वाले निशांत जैन को पुलिस ने गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था. आईएएस अभिषेक प्रकाश को भी गिरफ्तार करने के लिए पुलिस ने तमाम स्थानों पर छापेमारी की थी. आठ महीने तक प्रकरण में जेल में रहे निशांत जैन ने लखनऊ हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करके सम्पूर्ण केस कार्यवाही को रद करने की मांग की थी.

बता दें कि एफआईआर संख्या 111/2025 (सुप्रा) प्रतिवादी संख्या 2 (Invest UP Applicant) द्वारा तत्कालीन मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश सरकार को संबोधित 20 मार्च 2025 को दी गई लिखित शिकायत के आधार पर दर्ज की गई थी. एफआईआर में आरोप लगाये गये थे कि मेसर्स एसएईएल सोलर पी प्राइवेट लिमिटेड सौर सेल और सौर ऊर्जा में उपयोग किए जाने वाले कुछ भागों के विनिर्माण के लिए एक इकाई स्थापित करने के इच्छुक थे.

जिसके लिए Invest UP में ऑनलाइन आवेदन जमा किया गया था. उक्त आवेदन के संबंध में मूल्यांकन समिति की एक बैठक बुलाई गई थी. उसके आवेदन पर विचार करने से पूर्व Invest UP के एक अधिकारी ने आवेदक का नंबर शिकायतकर्ता को दिया तथा कहा कि वह आवेदक से बात कर सकता है तथा यदि आवेदक संस्तुति करेगा तो शिकायतकर्ता का मामला एम्पावर्ड कमेटी व कैबिनेट से स्वीकृत हो जाएगा.

शिकायत के अनुसार उक्त निर्देश पर शिकायतकर्ता ने आवेदक से बात की जिसने प्रोजेक्ट का 5 प्रतिशत एडवांस मांगा. चूंकि शिकायतकर्ता की कंपनी का मालिक अपने प्रोजेक्ट के संबंध में मुख्यमंत्री से पहले ही मिल चुका था इसलिए उन्होंने आवेदक की मांग अस्वीकार कर दी. बाद में शिकायतकर्ता को पता चला कि संस्तुति के बाद भी उसका मामला टाल दिया गया.

एफआईआर में आगे आरोप लगाया गया कि आवेदक ने शिकायतकर्ता को बताया कि अंतत: शिकायतकर्ता व उसकी कंपनी के मालिक को स्वीकृति के लिए उसके पास आना होगा अन्यथा उन्हें सफलता नहीं मिल सकती. उक्त शिकायत को संबंधित थाने में भेज दिया गया. इसके आधार पर लखनउ जिले के गोमतीनगर थाने में एफआईआर संख्या 111/2025 धारा 308(5) बीएनएस और प्रिवेंशन आफ करप्शन अधिनियम की धारा 7, 12, 13 के अंतर्गत दर्ज की गयी.

आवेदक के विद्वान वकील ने प्रस्तुत किया कि आवेदक एक व्यवसायी है. व्यावसायिक विवाद के कारण पहले भी प्रतिद्वंद्वियों द्वारा आवेदक के खिलाफ पांच मामले दर्ज कराये जा चुके हैं. आवेदक के वकील का कहना था कि बिजनेस की दुश्मनी की वजह से उसे इस केस में भी घसीटा गया है और केस डायरी में मौजूद पूरी जानकारी के आधार पर सेक्शन 308(5) BNS और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के सेक्शन 8/12 के तहत उस पर कोई जुर्म नहीं बनता.

आवेदक के वकील ने कोर्ट का ध्यान सेक्शन 308(1) और सेक्शन 308(5) BNS के नियमों की ओर भी दिलाया :-

“308. जबरदस्ती वसूली.(1)
जो कोई जानबूझकर किसी व्यक्ति को उस व्यक्ति या किसी और को कोई नुकसान होने का डर दिखाता है और इस तरह बेईमानी से उस व्यक्ति को किसी भी प्रॉपर्टी या कीमती सिक्योरिटी या साइन की हुई या सील की हुई कोई भी चीज जिसे कीमती सिक्योरिटी में बदला जा सकता है देने के लिए उकसाता है वह जबरदस्ती वसूली करता है.

यह कहा गया है कि किसी भी प्रॉपर्टी या कीमती सिक्योरिटी या साइन की हुई या सील की हुई किसी भी चीज जिसे किसी को कीमती सिक्योरिटी में बदला जा सके की डिलीवरी के लिए बेईमानी से उकसाने का कोई सबूत नहीं है और इसलिए, आवेदक के खिलाफ सेक्शन 308(5) BNS के तहत कोई अपराध नहीं बनता है.

कोर्ट का ध्यान भ्रष्टाचार निवारण एक्ट के सेक्शन 8 के प्रावधानों की ओर खींचते हुए, आवेदक के वकील ने कहा कि पूरी केस डायरी में इस बात का कोई सबूत नहीं है कि आवेदक ने किसी व्यक्ति को रिश्वत की पेशकश की या दी या किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों को कोई गलत फायदा देने का कोई वादा किया, जिसका मकसद किसी पब्लिक सर्वेंट को उसकी पब्लिक ड्यूटी गलत तरीके से करने के लिए उकसाना हो.

आवेदक के वकील ने कहा कि एक बार जब सेक्शन 8 के तत्व नहीं बनते हैं तो सेक्शन 12 भी लागू नहीं होगा.

  • सेक्शन 8
  • “किसी सरकारी कर्मचारी को रिश्वत देने से जुड़ा अपराध.
  • (1) कोई भी व्यक्ति जो किसी दूसरे व्यक्ति या व्यक्तियों को गलत फ़ायदा देता है या देने का वादा करता है, इस इरादे से कि-
  • (i) किसी सरकारी कर्मचारी को गलत तरीके से सरकारी काम करने के लिए उकसाए; या
  • (ii) ऐसे सरकारी कर्मचारी को सरकारी काम गलत तरीके से करने के लिए इनाम दे,
  • तो उसे सात साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं:
  • बशर्ते कि इस सेक्शन के नियम तब लागू नहीं होंगे जब किसी व्यक्ति को ऐसा गलत फायदा देने के लिए मजबूर किया जाता है:
  • इसके अलावा, जिस व्यक्ति को ऐसा मजबूर किया गया है, वह ऐसा गलत फायदा देने की तारीख से सात दिनों के अंदर कानून लागू करने वाली अथॉरिटी या जांच एजेंसी को मामले की रिपोर्ट करेगा:
  • बशर्ते कि जब इस सेक्शन के तहत अपराध किसी कमर्शियल संगठन ने किया हो, तो ऐसे कमर्शियल संगठन को जुर्माना देना होगा.

(2) सब-सेक्शन (1) में कुछ भी उस व्यक्ति पर लागू नहीं होगा, अगर वह व्यक्ति, कानून लागू करने वाली अथॉरिटी या जांच एजेंसी को बताने के बाद या किसी अन्य व्यक्ति को उसके विरुद्ध आरोपित अपराध की जांच में ऐसे कानून प्रवर्तन प्राधिकरण या जांच एजेंसी की सहायता करने के लिए कोई अनुचित लाभ देने का वादा करता है.”

  • सेक्शन 12.
  • अपराधों के दुष्प्रेरण के लिए दंड
  • -जो कोई इस अधिनियम के तहत दंडनीय किसी अपराध के लिए दुष्प्रेरण करता है, चाहे वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया हो या नहीं, उसे कम से कम तीन वर्ष की कारावास से, जिसे सात वर्ष तक बढ़ाया जा सकेगा, दंडनीय होगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा.
  • आवेदक के विद्वान वकील का कहना है कि Invest UP Committee की बैठकों की कार्यवाही से पता चलता है कि भूमि का आवंटन वाईईआईडीए द्वारा किया जाना था और बिजली की छूट यूपीपीसीएल द्वारा प्रदान की जानी थी जो विचाराधीन था. इन सभी तथ्यों पर ट्रायल कोर्ट ने विचार नहीं किया और आरोपित आदेश पारित कर दिया. ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आरोपित आदेश और उसकी परिणामी कार्यवाही रद्द करने योग्य है.

सरकारी वकील ने कहा कि विस्तृत जांच के बाद आवेदक के खिलाफ आरोप पत्र प्रस्तुत किया गया था. सभी तर्क आवेदक द्वारा उचित चरण में ट्रायल कोर्ट के समक्ष उठाए जा सकते हैं. बचाव पक्ष की बातों पर ट्रायल के दौरान विचार किया जाना चाहिए, इस स्टेज पर नहीं. इसलिए मामले में किसी दखल की जरूरत नहीं है. उन्होंने यह बात मानी कि जांच के दौरान, यह बताया गया था कि आवेदक ने 1 करोड़ रुपये कैश लिए थे लेकिन जांच अधिकारी को ऐसा कोई सबूत नहीं मिला.

शिकायतकर्ता के वकील ने कहा कि गलत धारणा के कारण शिकायत मुख्य सचिव को दी गई थी. उन्होंने यह भी माना कि शिकायतकर्ता को यह नहीं पता था कि जमीन की उपलब्धता और बिजली में सब्सिडी के बारे में YEIDA और UPPCL की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा था. उन्होंने यह भी माना कि आवेदक को कोई पैसा नहीं दिया गया था.

Invest UP कमेटी को बताया गया था कि कंपनी को 200 एकड़ जमीन की जरूरत है

Invest UP के कोऑर्डिनेटर शिव प्रकाश शुक्ला ने कोर्ट को बताया कि 15वीं इवैल्यूएशन कमिटी की मीटिंग 24.02.2025 को हुई थी, जिसमें शिकायत करने वाली कंपनी का एप्लीकेशन सीरियल नंबर 5 पर था. Invest UP कमेटी को बताया गया था कि कंपनी को 200 एकड़ जमीन की जरूरत है. कमेटी ने 29.01.2025 के लेटर के जरिए YEIDA से जमीन के ऐसे टुकड़े की अवेलेबिलिटी के बारे में पूछा था. कमिटी ने YEIDA को जमीन की अवेलेबिलिटी के बारे में नोडल एजेंसी को जवाब देने का भी निर्देश दिया.

उस मीटिंग में कमेटी को यह भी बताया गया कि पॉलिसी, 2022 के क्लॉज 12.4 के अनुसार सरकार खास महत्व के अल्ट्रा मेगा कैटेगरी प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरत के हिसाब से केस-टू-केस बेसिस पर इंसेंटिव का कस्टमाइज़्ड पैकेज देने पर विचार कर सकती है. ऐसे कस्टमाइज्ड पैकेज कैबिनेट द्वारा अप्रूव किए जाएंगे. Invest UP के कोऑर्डिनेटर ने यह भी बताया कि उस मीटिंग में, कमिटी ने शिकायत करने वाली कंपनी के मामले को टालने की सिफारिश की और YEIDA को YEIDA रीजन में जमीन की उपलब्धता के बारे में जवाब देने और डिटेल्स के साथ इसे फिर से इवैल्यूएशन कमिटी के सामने रखने का निर्देश दिया.

यह भी बताया गया है कि YEIDA के चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर ने 24.02.2025 को एडिशनल चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर Invest UP को लिखे अपने लेटर में बताया कि जमीन खरीदने का प्रोसेस चल रहा है और कंपनी के लिए जमीन 30 अप्रैल, 2025 तक उपलब्ध हो जाएगी. इसके बाद, शिकायत करने वाली कंपनी को सहमति पत्र भी जारी कर दिया गया है.

कोर्ट ने इस बात भी ध्यान दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रदीप कुमार केसरवानी (ऊपर) के मामले में पहले ही यह तय कर दिया है कि Cr.P.C. की धारा 482 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए, रद्द करने की प्रार्थना की सच्चाई तय करने के लिए चार कदम उठाए जाने चाहिए. जिनमें से एक यह है कि अगर आरोपी ने जिस सामग्री पर भरोसा किया है, उसे प्रॉसिक्यूशन/शिकायतकर्ता ने गलत साबित नहीं किया है, तो कार्रवाई रद्द कर दी जानी चाहिए.

दोहराने की कीमत पर, ऊपर दिए गए फैसले के पैरा 20 का सब पैरा “(iii) तीसरा कदम, क्या आरोपी ने जिस सामग्री पर भरोसा किया है, उसे प्रॉसिक्यूशन/शिकायतकर्ता ने गलत साबित नहीं किया है; और/या सामग्री ऐसी है, जिसे प्रॉसिक्यूशन/शिकायतकर्ता सही तरीके से गलत साबित नहीं कर सकता?”

शिकायतकर्ता ने अपने काउंटर एफिडेविट में माना कि गलत धारणा के कारण, उसने शिकायत चीफ सेक्रेटरी को दी थी. उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि आवेदक को कोई पैसा नहीं दिया गया था.

APPLICATION U/S 528 BNSS No. – 1822 of 2025; Shri Nikant Jain Versus State of U.P. Thru. Prin. Secy. Home Lko. and another

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