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सशपथ फर्जी बैंक स्टेटमेंट फाइल करने के आरोपित को राहत से इंकार, 2019 का Summon आदेश रहेगा प्रभावी

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, एफीडेविट के साथ जाली डॉक्यूमेंट फाइल करना कानून की बेइज्जती

सशपथ फर्जी बैंक स्टेटमेंट फाइल करने के आरोपित को राहत से इंकार, 2019 का Summon आदेश रहेगा प्रभावी

लोअर कोर्ट से जारी Summon आदेश को क्वैश करने की मांग के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट दाखिल करने वाले को कोर्ट ने कोई भी राहत देने से इंकार कर दिया है. कोर्ट ने क्रिमिनल केस रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है. रिटकर्ता पर भरण-पोषण मामले में अपनी फाइनेंशियल कैपेसिटी को कम दिखाने के लिए जाली डॉक्यूमेंट फाइल करने का आरोप है. जस्टिस विक्रम डी चौहान की बेंच ने कहा कि फेक डॉक्यूमेंट फाइल करना ज्यूडिशियल प्रोसेस की ईमानदारी बनाए रखने के प्रिंसिपल पर अटैक और यह कानून की बेइज्जती करने की श्रेणी में भी आता है.

सीआरपीसी की धारा 482 के तहत यह अप्लीकेशन गौरव मेहता की ओर से दाखिल की गयी थी. उनके खिलाफ गौतमबुद्ध् नगर जिले के सूरजपुर थाने में दर्ज क्रिमिनल केस में आईपीसी की धारा 466 के तहत चार्जशीट दाखिल होने के बाद एसीजेएम सेकंड की कोर्ट ने Summon आर्डर जारी किया है. रिट याचिका में Summon आर्डर और क्रिमिनल केस की कार्यवाही को क्वैश करने की मांग की गयी थी.

एप्लीकेंट की शादी 27.2.2004 को नोएडा में हुई थी. इस रिलेशनशिप से 27.12.2004 को एक बेटा पैदा हुआ जिसका नाम अभिमन्यु मेहता (नाम बाद में बदलकर आर्यमन चोपड़ा रखा गया) था. दोनों 16.8.2006 तक पति-पत्नी के तौर पर रहे. इसके बाद पार्टियों के बीच अनबन होने की वजह से उन्होंने डिस्ट्रिक्ट जज नई दिल्ली की कोर्ट में अपील की और हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 के सेक्शन 13B के तहत डिवोर्स डिक्री 20 अगस्त 2007 को डिक्री के जरिए प्राप्त कर ली और अलग अलग रहने लगे.

पत्नी ने पति से बेटे के भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए सीआरपीसी की धारा 125 के तहत केस नंबर 374/2013 (पहले का नंबर 50/2009) दायर किया. आवेदन में बच्चे के लिए प्रति माह 15,000 रुपये के भरण-पोषण दिलाने की मांग की गयी थी. संबंधित अदालत ने 2019 में एक आदेश पारित किया जिसमें आवेदक को पिछले तीन साल का आयकर रिटर्न, बैंक खाते का विवरण, फिक्स्ड डिपॉजिट या बॉन्ड और अन्य चल संपत्ति और वेतन पर्ची जमा करने का निर्देश दिया गया था.

आवेदक ने उपरोक्त आदेश के अनुसरण में संबंधित अदालत के समक्ष अपना जवाब दाखिल किया. जिसमें वर्ष 2011-12, 2012-13 और 2013-14 के बैंक खाते का विवरण हलफनामे के साथ कोर्ट में पेश किया गया. जिसमें कहा गया था कि एप्लीकेंट के पास कोई गाड़ी या कोई दूसरी अचल संपत्ति नहीं है. एप्लीकेंट द्वारा फाइल किया गया बैंक स्टेटमेंट जाली और मनगढ़ंत होने का संदेह हजाया गया.

एप्लीकेंट ने कोर्ट को यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि उसकी असल इनकम से बहुत कम है. एप्लीकेंट ने सेविंग बैंक अकाउंट के अलावा बैंक के साथ अपने फाइनेंशियल रिलेशन की जानकारी भी छिपाई. मेंटेनेंस कोर्ट ने 21.11.2019 के ऑर्डर से एप्लीकेंट को बेटे के बालिग होने तक हर महीने 15,000 रुपये मेंटेनेंस देने का निर्देश दिया.

इसके बाद अपोजिट पार्टी नंबर 2 ने नई दिल्ली में जीरो एफआईआर दर्ज कराई, जिसे बाद में केस क्राइम नंबर 0869/2019 के तौर पर गौतमबुद्ध नगर जिले के सूरजपुर थाने में दर्ज किया गया. आरोपित पर 420, 468 और 471 आईपीसी धाराएं लगाई गईं. इस केस की विवेचना के दौरान सामने आया कि एप्लीकेंट का दिया गया बैंक स्टेटमेंट बैंक के जारी किए गए स्टेटमेंट के फॉर्मेट से मेल नहीं खाता है.

कोर्ट में जमा किए गए स्टेटमेंट पर बैंक का स्टैंप और ऑथराइज्ड सिग्नेचर नहीं है, जिससे यह साफ है कि डॉक्यूमेंट्स नकली हैं. यह भी आरोप है कि डीसीपी पार्लियामेंट स्ट्रीट, नई दिल्ली में शिकायत की गई थी क्योंकि मास्टर डेटा से पता चलता है कि बैंक का हेड ऑफिस यहां है. पुलिस ने ICICI बैंक से उक्त खाते का बैंक स्टेटमेंट प्राप्त किया.

बैंक से प्राप्त अकाउंट स्टेटमेंट की जांच करने पर, यह सामने आया कि मेंटेनेंस कोर्ट में जमा किए गए बैंक स्टेटमेंट से कई एंट्री हटा दी गई थीं ताकि उसकी सही आय को छिपाया जा सके और कोर्ट को गुमराह किया जा सके और उपरोक्त कारणों से, संबंधित कोर्ट ने Cr.P.C. की धारा 91 के तहत आवेदन खारिज कर दिया.

इसके बाद जांच अधिकारी ने 22.7.2019 को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 161 के तहत मुखबिर का बयान दर्ज किया, जिसमें मुखबिर ने अभियोजन पक्ष के मामले का समर्थन किया.

जांच अधिकारी ने आवेदक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 466 के तहत चार्जशीट दायर की और उसके बाद संबंधित कोर्ट ने 17.10.2019 के विवादित आदेश द्वारा आवेदक को भारतीय दंड संहिता की धारा 466 के तहत अपराध के लिए तलब (Summon) किया.

तथ्यों, परिस्थितियों और कारणों को देखते हुए, आवेदक के खिलाफ Summon जारी करने के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है

कोर्ट ने कहा कि एफआईआर और आरोपों के समर्थन में मौजूद सामग्री, ऊपर बताए गए तथ्यों, परिस्थितियों और कारणों को देखते हुए, आवेदक के खिलाफ समन (Summon) जारी करने के लिए प्रथम दृष्टया मामला बनता है. जहां तक आवेदक के विद्वान वकील की इस दलील का सवाल है कि चुनौतीपूर्ण समन आदेश बिना सोचे-समझे जारी किया गया है, कोर्ट ने मामले को नए सिरे से फैसले के लिए संबंधित अदालत को वापस भेजने का आदेश दिया.

कोर्ट ने कहा कि तथ्यों, परिस्थितियों और कारणों को देखते हुए आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 482 के तहत यह वर्तमान आवेदन योग्यताहीन है. कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी.

APPLICATION U/s 482 No. – 33209 of 2023 ; Gaurav Mehta  V/s  State of U.P. and another

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