पुलिस Encounter हो गया है आम बात, हाई कोर्ट ने कहा आरोपितों को सजा देने का अधिकार सिर्फ कोर्ट के पास
मौत या गंभीर चोट हो तो पुलिस टीम लीडर के साथ SP/SSP/कमिश्नरेट पुलिस अनुशासनात्मक कार्यवाही के साथ अवमानना के जिम्मेदार होंगे

पुलिस Encounter की प्रथा खासकर आरोपी व्यक्तियों के पैरों पर गोली चलाने की आम बात बन गई है. जिसका मकसद अधिकारियों को खुश करना या आरोपी को सजा के तौर पर तथाकथित सबक सिखाना है. ऐसा व्यवहार पूरी तरह से गलत है क्योंकि सजा देने का अधिकार सिर्फ कोर्ट के पास है, पुलिस के पास नहीं. भारत एक लोकतांत्रिक देश है जो कानून के शासन से चलता है. कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के काम अलग-अलग और अच्छी तरह से तय हैं और पुलिस द्वारा न्यायिक क्षेत्र में किसी भी तरह की दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं की जा सकती.
यह टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल ने शुक्रवार 30 जनवरी को एक बेल याचिका पर सुनवाई के दौरान की. कोर्ट ने आरोपित की जमानत मंजूर करते हुए उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया. कोर्ट ने पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये दिशा निर्देशों का पालन न करने पर पुलिस अफसरों की क्लास लगाई और निर्देश दिया कि वे स्पष्ट आदेश जारी करें. आदेश न मानने वाले जिले के पुलिस कप्तानों एसपी, एसएसपी, पुलिस कमिश्नर पर कार्रवाई करें.
यह जमानत याचिका मिर्जापुर जिले की पुलिस द्वारा चोरी के केस में चालान करके जेल भेजे गये आरोपित राजू उर्फ राजकुमार की ओर से दाखिल की गयी थी. उसके खिलाफ मिर्जापुर जिले के कोतवाली देहात थाने में केस क्राइम नंबर 344/2025 धारा 305(a), 331(4), 317(2) BNS दर्ज है. इस प्रकरण की सुनवाई 28 जनवरी को हुई थी.
उस तारीख को एफआईआर देखने पर कोर्ट ने पाया कि मामला पुलिस Encounter से संबंधित है जिसमें याचिकाकर्ता को गंभीर चोटें आईं. कोर्ट ने एजीए को पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य, (2014) 10 SCC 635 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुपालन में निर्देश लेने का निर्देश दिया, विशेष रूप से इस बारे में कि क्या पुलिस मुठभेड़ (Encounter) के संबंध में कोई रिपोर्ट दर्ज की गई है और क्या मुठभेड़ (Encounter) में घायल का बयान मजिस्ट्रेट या किसी मेडिकल ऑफिसर के सामने दर्ज किया गया है.
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान एजीए ने निर्देश प्रस्तुत किए जिसमें बताया गया कि पुलिस मुठभेड़ (Encounter) के संबंध में केस क्राइम नंबर 0343/2025 थाना लालगंज, जनपद मिर्जापुर में दर्ज है. हालांकि यह स्वीकार किया गया है कि घायल का बयान न तो मजिस्ट्रेट के सामने और न ही किसी मेडिकल ऑफिसर द्वारा दर्ज किया गया है. पुलिस मुठभेड़ (Encounter) की घटना की एफआईआर में जांच अधिकारी को एक सब-इंस्पेक्टर के रूप में दिखाया गया है, हालांकि यह सूचित किया गया है कि बाद में मामले में एक इंस्पेक्टर को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया है.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा पीयूसीएल और अन्य मामले में जारी निर्देशों को देखने से यह साफ है कि अगर किसी पुलिस मुठभेड़ (Encounter) में आरोपी को गंभीर चोटें आती हैं तो तुरंत FIR दर्ज की जानी चाहिए और जांच CBCID या किसी दूसरे पुलिस स्टेशन की पुलिस द्वारा की जानी चाहिए. किसी भी मामले में मुठभेड़ (Encounter) में शामिल पुलिस पार्टी के प्रमुख से सीनियर रैंक के पुलिस अधिकारी द्वारा की जानी चाहिए.
कोर्ट ने कहा, तथ्यों से स्पष्ट है कि वर्तमान मामले में आवेदक को पुलिस मुठभेड़ (Encounter) में गंभीर चोटें आईं, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज और अन्य (सुप्रा) में जारी निर्देशों का पालन नहीं किया गया है. पुलिस ने न तो घायल व्यक्ति का बयान किसी मेडिकल ऑफिसर या मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किया और न ही पुलिस मुठभेड़ (Encounter) की जांच मुठभेड़ में शामिल पुलिस पार्टी के प्रमुख से उच्च रैंक के अधिकारी द्वारा की गई है.
यह न्यायालय अक्सर ऐसे मामलों का सामना करता है जहां चोरी जैसे छोटे अपराधों से जुड़े मामलों में भी पुलिस सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज और अन्य (सुप्रा) में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना घटना को पुलिस मुठभेड़ (Encounter) के रूप में पेश करके अंधाधुंध फायरिंग करती है. यह न्यायालय मानता है कि पुलिस कर्मियों को भी आत्मरक्षा का अधिकार है और वे उचित परिस्थितियों में बल का प्रयोग कर सकते हैं, यह अच्छी तरह से स्थापित है कि जहां मृत्यु होती है या आरोपी को गंभीर चोटें लगती हैं वहां सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनिवार्य प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए.
जस्टिस देशवाल ने कहा
सुप्रीम कोर्ट ने पीयूसीएल मामले में Encounter को लेकर तय की थी निम्न गाइडलाइन
- किसी जानकारी के आधार पर पुलिस पार्टी मौके पर पहुंचती है और मुठभेड़ होती है जिसमें पुलिस पार्टी द्वारा हथियार का इस्तेमाल किया जाता है. इसके परिणामस्वरूप आरोपी या किसी अन्य व्यक्ति को गंभीर चोट लगती है तो इस संबंध में एक एफआईआर उसी पुलिस स्टेशन या पास के पुलिस स्टेशन में पुलिस मुठभेड़ में शामिल पुलिस पार्टी के प्रमुख द्वारा दर्ज की जाएगी
- उक्त एफआईआर की जांच CBCID या किसी अन्य पुलिस स्टेशन की पुलिस टीम द्वारा एक सीनियर पुलिस अधिकारी की देखरेख में की जाएगी, जो पुलिस मुठभेड़ में शामिल पुलिस पार्टी के प्रमुख से कम से कम एक स्तर ऊपर हो.
- एफआईआर में मुठभेड़ में शामिल पुलिस पार्टी के सदस्यों के नाम आरोपी/संदिग्ध की श्रेणी में बताना ज़रूरी नहीं है, बल्कि केवल टीम, चाहे वह एसटीएफ हो या रेगुलर पुलिस, का उल्लेख किया जा सकता है.
- घायल अपराधी/पीड़ित को मेडिकल सहायता दी जानी चाहिए और उसकी चोट की जांच की जानी चाहिए. उसके बाद उसका बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल ऑफिसर द्वारा घायल व्यक्ति के फिटनेस सर्टिफिकेट के साथ रिकॉर्ड किया जाना चाहिए.
- पुलिस एनकाउंटर की घटना की पूरी जांच के बाद रिपोर्ट सक्षम कोर्ट को भेजी जानी चाहिए जो प्रोसीजर का पालन करेगा.
- पुलिस एनकाउंटर होने के तुरंत बाद पुलिस पार्टी के ऑफिसर को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन या गैलेंट्री अवॉर्ड नहीं दिया जाएगा. ऐसे अवॉर्ड तभी दिए जाएं या रिकमेंड किए जाएं जब पुलिस हेड द्वारा बनाई गई एक कमेटी द्वारा व्यक्ति की बहादुरी बिना किसी शक के साबित हो जाए.
- पुलिस एनकाउंटर में घायल व्यक्ति का परिवार पाता है कि प्रोसीजर का पालन नहीं किया गया या स्वतंत्र जांच में कमी है या किसी भी अधिकारी द्वारा दुर्व्यवहार या पक्षपात का पैटर्न मौजूद है तो वह क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र वाले सेशंस जज से शिकायत कर सकता है.
- शिकायत मिलने पर संबंधित सेशंस जज शिकायत की मेरिट पर विचार करेंगे और उसमें उठाई गई शिकायत का समाधान करेंगे.
- कोई व्यक्ति पुलिस एनकाउंटर में मौत या गंभीर चोटों के संबंध में कार्रवाई न होने से दुखी है तो वह सेशंस जज के सामने एक एप्लीकेशन फाइल कर सकता है.
- सेशंस जज शिकायत पर कार्रवाई कर सकते हैं. उचित मामलों में मामले को हाईकोर्ट को भेज सकते हैं ताकि डिस्ट्रिक्ट पुलिस चीफ के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू की जा सके.
इसी कोर्ट में आपराधिक विविध जमानत आवेदन संख्या 45870/2025 और आपराधिक विविध बेल एप्लीकेशन नंबर 227/2026 भी आज लिस्टेड थे. यह मामले भी पुलिस Encounter से जुड़े हैं जिसमें एप्लीकेंट को गंभीर चोटें आई हैं. बेल एप्लीकेशन नंबर 45870/2025 में इंचार्ज इंस्पेक्टर संतोष कुमार सिंह जिन्होंने Encounter के दौरान पुलिस पार्टी को लीड किया था ने खुद कहा कि उनके द्वारा चलाई गई गोली घायल एप्लीकेंट को लगी थी. कोर्ट में पेश हुए इंचार्ज इंस्पेक्टर संतोष कुमार सिंह ने कोर्ट को बताया कि पुलिस Encounter के संबंध में कोई FIR दर्ज नहीं की गई है इसलिए कोई जांच नहीं की गई है.

उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि घायल एप्लीकेंट का बयान न तो मेडिकल ऑफिसर के सामने और न ही मजिस्ट्रेट के सामने रिकॉर्ड किया गया है. कोर्ट ने कहा कि ये घटनाएं साफ तौर पर दिखाती हैं कि पीयूसीएल और अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देशों का पालन नहीं किया गया है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ठीक से सर्कुलेट किए जाने के बावजूद, पुलिस या तो इन निर्देशों से अनजान है या उनके प्रति लापरवाह है.
28 जनवरी 2026 को कोर्ट ने प्रदेश पुलिस के मुखिया को भी कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया था. इसके अनुपालन में एडिशनल होम सेक्रेटरी यूपी संजय प्रसाद और डीजीपी राजीव कृष्णा वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट के सामने मौजूद हुए. दोनों ने बताया कि DGP सर्कुलर दिनांक 01.08.2017 और 11.10.2024, पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य; (2014) 10 SCC 635 के मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करने के लिए जारी किए गए थे, जो पुलिस Encounter से संबंधित थे जिसमें मौत या गंभीर चोटें लगी थीं.
दोनों अधिकारियों ने यह समझाने की कोशिश की कि पीयूसीएल मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का काफी हद तक पालन किया जा रहा है. जब उनसे मौजूदा मामले और संबंधित मामलों के तथ्यों के बारे में पूछा गया, तो वे इस बात से इनकार नहीं कर सके कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का कई पुलिस अधिकारियों द्वारा काफी हद तक पालन नहीं किया जा रहा है. दोनों अधिकारियों ने आश्वासन दिया कि वे सभी पुलिस अधिकारियों को पुलिस Encounter के संबंध में PUCL के मामले में जारी निर्देशों का सख्ती से पालन करने के लिए नए निर्देश जारी करेंगे.
डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस के आश्वासन को देखते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि किसी भी पुलिस अधिकारी ने पुलिस एनकाउंटर के संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पीयूसीएल मामले में दिए गए दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया जहां मौत या गंभीर चोट लगी हो तो न केवल पुलिस टीम का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति बल्कि जिला पुलिस प्रमुख, चाहे वह एसपी/एसएसपी/कमिश्नरेट पुलिस हो पुलिस विभाग द्वारा शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही के अलावा कोर्ट की अवमानना के लिए भी जिम्मेदार होंगे.
मामले की मेरिट पर आते हुए, आवेदक के वकील ने बताया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट में उसका नाम नहीं था. बाद में चांदी की कुछ चीजों की बरामदगी के आधार पर उसे झूठा फंसाया गया है. सेक्शन 105 BNSS के प्रावधान का पालन नहीं किया गया है क्योंकि पेन ड्राइव संबंधित मजिस्ट्रेट को 48 घंटे के भीतर नहीं भेजी गई. एजीए ने जमानत की प्रार्थना का विरोध किया लेकिन उपरोक्त तथ्य से इनकार नहीं कर सके.
मामले के पूरे तथ्यों और परिस्थितियों, पार्टियों के विद्वान वकीलों की दलीलों पर विचार करते हुए और अपराध की प्रकृति, सबूत, आरोपी की मिलीभगत को ध्यान में रखते हुए और मामले की मेरिट पर कोई राय व्यक्त किए बिना कोर्ट ने आवेदक राजू @ राजकुमार को जमानत पर रिहा होने का हकदार माना और उसे जमानत पर तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया.
CRIMINAL MISC. BAIL APPLICATION No. – 45637 of 2025 ; Raju Alias Rajkumar V/s State of U.P.