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Custody में कैदी की अप्राकृतिक मौत के लिए राज्य पूरी तरह से जिम्मेदार, हाई कोर्ट ने तय किया 10 लाख मुआवजा

संविधान के आर्टिकल 21 के तहत गारंटी वाला जीवन और इंसानी गरिमा का अधिकार एक अंदरूनी, अलंघनीय और हर जगह मौजूद अधिकार है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Custody में कैदी की अप्राकृतिक मौत के लिए राज्य पूरी तरह से जिम्मेदार, हाई कोर्ट ने तय किया 10 लाख मुआवजा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि राज्य अपनी Custody में किसी कैदी की अप्राकृतिक मौत के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है, भले ही मौत साफ तौर पर अप्राकृतिक आत्महत्या हो. भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत गारंटी वाला जीवन और इंसानी गरिमा का अधिकार एक अंदरूनी, अलंघनीय और हर जगह मौजूद अधिकार है जो उस व्यक्ति को भी दिया जाता है जिसे राज्य ने गैर-कानूनी तरीके से गिरफ्तार और हिरासत (Custody) में लिया हो.

जस्टिस शेखर बी सराफ और जस्टिस मंजीव शुक्ला की बेंच ने कहा कि यह संवैधानिक सुरक्षा का साफ उल्लंघन था, जिसके लिए संविधान के आर्टिकल 226 के तहत दखल देना जरूरी है. कोर्ट ने रिट पिटीशन मंजूर कर ली और राज्य को तीन हफ्ते के अंदर कानूनी वारिसों को मुआवजे के तौर पर दस लाख रुपये देने का निर्देश दिया है.

बेंच ने प्रेमा देवी की रिट पिटीशन को मंजूरी दे दी, जिसमें उन्होंने पीलीभीत जिला जेल में अपने नाबालिग बेटे की Custody में अप्राकृतिक मौत के लिए मुआवजे की मांग की थी. बेंच ने यूपी सरकार से मुआवजा तय करने के लिए गाइडलाइन बनाने को भी कहा. इसमें यह भी कहा गया कि सरकार को मोटर व्हीकल्स एक्ट, 1988 के तहत उपलब्ध उम्र, इनकम और डिपेंडेंट्स के आधार पर मल्टीप्लायर मेथड की तरह कस्टोडियल डेथ के मामलों में मुआवजा देने के लिए जरूरी और ठोस पैरामीटर अपनाने चाहिए.

याचिकाकर्ता का बेटा पाक्सो केस में अंडर ट्रायल Custody में था. संदिग्ध हालात में उसकी बॉडी जेल के टॉयलेट में लटकी हुई मिली थी. प्रकरण संज्ञान में आने के बाद नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन ने पहले तीन लाख रुपये के मुआवजे की सिफारिश की. अधिकारियों ने नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन की सिफारिश पर कोई ध्यान नहीं दिया.

इसके बाद राहत के लिए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. याचिका में दावा किया गया कि मृतक को पुलिस वालों ने Custody में टॉर्चर किया, क्योंकि इस तरह के टॉर्चर से राहत के लिए गैर-कानूनी पैसे की मांग पूरी नहीं की गई, जिसके कारण आखिरकार उसकी अननैचुरल मौत हो गई.

सुनवाई के दौरान स्टेट के अधिवक्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि मृतक ने (Custody में) खुद फांसी लगाकर जान दी. कहा गया कि यह घटना सुसाइड थी और रिकॉर्ड में ऐसा कोई मटीरियल नहीं था जिससे पता चले कि रेस्पोंडेंट अथॉरिटीज की तरफ से कोई लापरवाही बरती गयी.

यह भी कहा गया कि एक बार पहचान का प्रोसेस पूरा हो जाने और सरकार से जरूरी बजट मिल जाने के बाद मंजूर किया गया मुआवजा कानून के हिसाब से जारी कर दिया जाएगा. बेंच ने जिम्मेदारी से बचने की राज्य की कोशिश खारिज कर दी. कहा कि कस्टोडियल (Custody) डेथ इंडियन जस्टिस सिस्टम में फंडामेंटल राइट्स की सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है.

‘हैरान करने वाली’ बात है कि हमारे भारतीय संविधान में गैर-कानूनी हिरासत या Custody में डेथ के लिए मुआवजा देने का कोई साफ आदेश नहीं है. कोर्ट ने कहा कि अगर Custody में मौत नेचुरली होती है तो राज्य को इसके लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता. अगर मौत अप्राकृतिक हुई है तो राज्य चूक के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है जिसके कारण किसी व्यक्ति की मौत हुई.
जस्टिस सराफ ने कहा

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाते हुए रुदुल साह बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले पर भी भरोसा किया, जिसमें कहा गया कि बुनियादी अधिकारों से वंचित करने पर मुआवजे का आदेश देने से इनकार करना आजादी के अधिकार के प्रति सिर्फ दिखावटी वादा करना होगा.

कोर्ट ने नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य और डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को भी ध्यान में रखा, जिसमें यह कहा गया कि पैसे की भरपाई स्ट्रिक्ट लायबिलिटी के सिद्धांत पर आधारित एक सही और असरदार उपाय है, जिसके लिए सॉवरेन इम्यूनिटी का बचाव मौजूद नहीं है.

मुआवजे की रकम तय करते समय कोर्ट ने मेघालय हाईकोर्ट के एक फैसले (सुओ मोटो कस्टोडियल वायलेंस) की जांच की जिसमें पीड़ित की उम्र के आधार पर मुआवजे को कैटेगरी में बांटा गया. डिवीजन बेंच ने इसे आधिकारिक मिसाल के तौर पर मानने से यह देखते हुए इनकार किया कि उस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने मेघालय राज्य बनाम किलिंग जाना में रोक लगा दी थी.

इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने बिना किसी विवाद वाले रिकॉर्ड से नोट किया कि मृतक राज्य की Custody में था और उसने आत्महत्या कर ली थी. बेंच ने कहा कि हो सकता है कि उसके आस-पास ऐसे हालात रहे हों जिनकी वजह से उसने इतना बड़ा कदम उठाया लेकिन मरने वाले की Custody में अप्राकृतिक मौत के लिए राज्य पूरी तरह से जिम्मेदार है.

“…पुलिस की Custody में किसी कैदी की मौत के लिए राज्य की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. कोई भी राज्य कैदियों को बेहतर सुविधाएं देने की अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता. इसलिए इस मामले में कस्टोडियल डेथ का मामला बनता है.”
बेंच ने कहा

Custody में डेथ के मामलों के लिए कोर्ट ने बताए चार शुरुआती कदम:

  • A. जेल अधिकारियों को मृतक के परिवार वालों को मृतक की मौत के बारे में तुरंत बताना होगा. BNSS की धारा 194 के अनुसार मौके पर ही स्वतंत्र पंचों के साथ पंचनामा भरा जायेगा.
  • B. मौत का कारण बताते हुए पोस्टमॉर्टम कराया जाना चाहिए. कस्टोडियल डेथ के मामले में पोस्टमॉर्टम जांच की वीडियो रिकॉर्डिंग की जानी चाहिए.
  • C. सभी गवाहों, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और पंचनामा के बाद BNSS की धारा 196 के अनुसार संबंधित ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा जांच रिपोर्ट जमा की जानी चाहिए.
  • D. कस्टडी में मरने वाले के परिवार वालों को सांत्वना देने के लिए नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन द्वारा तय किया गया मुआवजा हर कस्टोडियल डेथ केस के खास तथ्यों और हालात पर विचार करने के बाद दिया जाना चाहिए.

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