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Rahul Gandhi के चुनाव लड़ने की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, आर्टिकल 134-A के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए सर्टिफिकेट देने से भी इंकार

Rahul Gandhi के चुनाव लड़ने की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, आर्टिकल 134-A के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए सर्टिफिकेट देने से भी इंकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनउ बेंच ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi के रायबरेली संसदीय सीट से चुनाव लड़ने की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है. जस्टिस मंजीव शुक्ला और जस्टिस शेखर बी सराफ की बेंच ने कहा कि मौजूदा रिट पिटीशन में कोई दम नहीं है. पिटीशनर ने कोर्ट से भारत के संविधान के आर्टिकल 134-A के तहत सुप्रीम कोर्ट में अपील के लिए एक सर्टिफिकेट भी मांगा है.

इस प्रार्थना पर विचार करने के बाद कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कानून का कोई खास सवाल नहीं उठता क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर सुलझा दिया है और अब यह रिइंटीग्रा नहीं है. इसलिए इस प्रार्थना के साथ रिटी पिटीशन को भी खारिज कर दिया है.

हाई कोर्ट में यह रिट पिटीशन अशोक पांडेय की ओर से दाखिल की गयी थी. भारत के संविधान के आर्टिकल 226 के तहत दाखिल पिटीशन में खुद पेश होकर Rahul Gandhi के खिलाफ क्वो वारन्टो रिट की मांग की थी.

Rahul Gandhi से पूछा जाए कि किस कानूनी अधिकार के तहत वह रायबरेली से लोकसभा के सदस्य का पद संभाल रहे हैं

उसने कोर्ट से मांग की थी कि क्वो वारंटो के तौर पर एक रिट ऑर्डर या निर्देश जारी करें, जिसमें Rahul Gandhi से पूछा जाए कि किस कानूनी अधिकार के तहत वह रायबरेली से लोकसभा के सदस्य का पद संभाल रहे हैं, जबकि सूरत कोर्ट द्वारा दो साल की सजा और दोषसिद्धि के कारण आर्टिकल 102 में दिए गए प्रावधान के तहत संसद सदस्य के रूप में चुने जाने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था.

याचिका में मांग की गयी थी कि कोर्ट लोकसभा के स्पीकर को निर्देश दे कि वह Rahul Gandhi से संविधान में दिए गए दंड की वसूली करें क्योंकि उन्होंने लोकसभा के वैध सदस्य न होते हुए भी लोकसभा की कार्यवाही में भाग लिया था. उनका कहना था कि दिनेश कुमार सिंह को रायबरेली लोकसभा सीट से लोकसभा का चुना हुआ सदस्य इसलिए बनाया जाय क्योंकि Rahul Gandhi को चुनाव की तारीख को लोकसभा का सदस्य चुने जाने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था.

खुद पेश हुए याचिकाकर्ता ने कहा कि Rahul Gandhi को ट्रायल कोर्ट ने इंडियन पीनल कोड, 1860 के सेक्शन 499 के तहत दंडनीय अपराध के लिए दोषी ठहराया था. जिसके लिए दो साल की साधारण कैद या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है. इस आदेश को बाद में ऊपरी अदालतों में चुनौती दी गई और गुजरात हाई कोर्ट ने Rahul Gandhi की रिवीजन पिटीशन खारिज कर दी और इसी तरह सजा पर रोक लगाने की प्रार्थना को भी खारिज कर दिया.

यह मामला सुप्रीम कोर्ट में एक स्पेशल लीव पिटीशन नंबर S.L.P. (Cri.) नंबर 8644 of 2023 के जरिए गया तो सुप्रीम कोर्ट ने यशवंत सिन्हा और अन्य बनाम सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन थ्रू इट्स डायरेक्टर एंड अदर, रिपोर्टेड इन (2020) 2 SCC 338) का हवाला देते हुए कहा कि ट्रायल जज ने अधिकतम सजा देते समय कोई और कारण नहीं बताया है.

दो साल की सज़ा की वजह से ही, रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल्स एक्ट, 1950 के सेक्शन 8 के सब-सेक्शन (3) के प्रोविजन लागू हुए. सजा एक दिन कम होती तो एक्ट के सेक्शन 8 के सब-सेक्शन (3) के प्रोविजन लागू नहीं होते.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा ​था कि जब कोई अपराध नॉन-कॉग्निजेबल, बेलेबल और कंपाउंडेबल हो तो ट्रायल जज से कम से कम यह उम्मीद की जाती थी कि वह कुछ कारण बताते कि तथ्यों और हालात को देखते हुए उन्हें अधिवकतम सजा देना क्यों जरूरी लगा.

पिटीशनर अशोक पांडेय ने कहा है कि सजा के ऑर्डर पर रोक से Rahul Gandhi को चुनाव लड़ने की इजाजत नहीं है. WRIC नंबर 11593 ऑफ 2025 3 क्योंकि भारत के संविधान का आर्टिकल 102, रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट, 1951 के सेक्शन 8(3) के साथ मिलकर, पार्लियामेंट मेंबर चुने जाने या होने के लिए डिसक्वालिफिकेशन बनाता है.

श्री पांडे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने क्रिमिनल अपील नंबर 3838 ऑफ 2023 (स्पेशल लीव टू अपील (Crl.) नंबर 11129 ऑफ 2023 से उत्पन्न) में भी अफजल अंसारी की सजा पर रोक लगाई थी लेकिन उस मामले में दिए गए ऑर्डर में सुप्रीम कोर्ट ने खास शब्दों में श्री अंसारी को चुनाव लड़ने की इजाजत दी थी.

पिटीशनर ने खास तौर पर सजा और उससे जुड़ी सज़ा, अपील में खारिज होने तक आरोपी के खिलाफ पूरी तरह से लागू होती है, और सजा और सजा से जुड़ी डिसक्वालिफिकेशन भी लागू होती है, पर विशेष जोर दिया.” पिटीशनर का था कि जब तक सजा खारिज नहीं की जाती, तब तक सजा लागू रहती है इसलिए, रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट, 1951 के सेक्शन 8(3) के तहत रोक लागू रहती है.

कोर्ट ने कहा कि हम उठाए गए तर्क से सहमत नहीं हैं, क्योंकि हमारा मानना है कि उस पैराग्राफ में दिया गया बयान एक फैक्ट के बारे में था जिसमें सजा पर रोक लगा दी गई थी, न कि जहाँ सजा पर रोक लगी थी. जिस पल कोई ऊपरी कोर्ट सजा पर रोक लगाता है, सजा का अभिशाप खत्म हो जाता है और जिस व्यक्ति के खिलाफ ऐसी सजा पर रोक लगी है, भले ही वह बरी न हुआ हो, उसे दोषी नहीं कहा जा सकता.

यह तभी पता चल सकता है जब अपील का फैसला हो जाए कि वह दोषी होगा या बरी. बेंच ने राय लिली थॉमस (सुप्रा) के फैसले का हवाला दिया जिसमें सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच ने साफ तौर पर कहा था कि रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट के सेक्शन 8 के सब-सेक्शन (1), (2) या (3) के तहत अयोग्यता, कोड के सेक्शन 389 के तहत अपील कोर्ट या कोड के सेक्शन 482 के तहत हाई कोर्ट द्वारा सजा पर रोक के आदेश की तारीख से लागू नहीं होगी.

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