कोर्ट Apology स्वीकार कर ले तब भी contempt स्वत: समाप्त नहीं होगा
इलाहाबाद HC ने कहा माफी स्वीकार करना दोषमुक्ति जैसा नहीं

न्यायालय अवमानना अधिनियम 1971 की धारा 12 की व्याख्या करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अवमाननाकर्ता द्वारा की गई apology को न्यायालय स्वीकार तो कर सकता है लेकिन इससे अवमानना स्वतः ही समाप्त नहीं हो जाती. कोर्ट के विरुद्ध अपमानजनक आरोप लगाने के कारण आपराधिक अवमानना का सामना कर रहे एक वकील की वापसी और apology की याचिका पर विचार करते हुए जस्टिस सिद्धार्थ की सिंगल बेंच ने कहा कि apology स्वीकार करना दोषमुक्ति के समान नहीं है.
बेंच ने कहा कि अवमानना की गंभीरता के आधार पर न्यायालय को यह निर्णय लेने का पूर्ण विवेकाधिकार प्राप्त है कि अवमाननाकर्ता को दोषमुक्त किया जाए या फिर सजा दी जाए. किसी सजा को कम करने में apology को निश्चित रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिए लेकिन यह अवमाननाकर्ता को दोषमुक्त नहीं करता. वह अधिकार के रूप में दोषमुक्त होने का दावा नहीं कर सकता.
संक्षेप में मामला अवमाननाकर्ता वकील ने पहले अपने लिखित तर्क में जज पर टिप्पणी की. जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान अदालत पर पक्षपात, बेईमानी और ईमानदारी की कमी का भी आरोप लगाया. बाद में उन्होंने बिना शर्त मांगी और तर्क दिया कि एक बार अदालत ने उनकी apology स्वीकार कर ली तो वह अदालत की अवमानना अधिनियम की धारा 12 के तहत आगे कार्रवाई नहीं कर सकती या सजा नहीं दे सकती.
Apology स्वीकार करने के बाद भी न्यायालय के पास यह विवेकाधिकार है कि वह अवमाननाकर्ता को कोई दंड न दे या उसे कम दंड दे

जस्टिस सिद्धार्थ ने कहा कि रिमिट शब्द के दो अर्थ हैं, या तो पूर्ण क्षमा या सजा में आंशिक कमी. स्पष्ट किया, ” apology स्वीकार करने के बाद भी न्यायालय के पास यह विवेकाधिकार है कि वह अवमाननाकर्ता को कोई दंड न दे या उसे कम दंड दे. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्षमा याचना (apology) स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि अभियुक्त स्वतः दोषमुक्त हो जाता है और यह केवल एक ऐसा कारक है, जो दंड में कमी लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.
न्यायालय ने अपर सत्र जज हरदोई बनाम बनवारी लाल एआईआर 1948 अवध 114: (1948) में निर्धारित अनुपात का उल्लेख किया, जहां यह माना गया कि apology, हालांकि अक्सर अपराध को कम करती है, अपराधी को अधिकार के रूप में दोषमुक्ति का अधिकार नहीं देता. सिंगल जज ने आगे कहा कि अवमानना की गंभीरता निर्णायक भूमिका निभाती है.
यदि अवमानना मामूली है तो बिना शर्त और सद्भावनापूर्ण क्षमायाचना (apology) उसे शुद्ध करने के लिए पर्याप्त हो सकती है. लेकिन गंभीर मामलों में केवल क्षमायाचना (apology) स्वीकार करना न्याय के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता.
न्यायालय ने कहा कि अवमाननाकर्ता केवल इसलिए दोषमुक्ति का दावा नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी क्षमायाचना (apology) स्वीकार कर ली गई थी. हाईकोर्ट ने जज पर बेईमान होने और ईमानदारी की कमी का आरोप लगाने वाले वकील को राहत देने से इनकार कर दिया.
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