+91-9839333301

legalbulletin@legalbulletin.in

| Register

Minor (Below 18 years) की आयु निर्धारण में शैक्षणिक दस्तावेज ही वैध, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का आदेश रद्द, कानून के अनुसार पुनः विचार करें

Minor (Below 18 years) की आयु निर्धारण में शैक्षणिक दस्तावेज ही वैध, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का आदेश रद्द, कानून के अनुसार पुनः विचार करें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि नाबालिग (Minor) की आयु निर्धारण में शैक्षणिक दस्तावेज सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख हैं. यदि दस्तावेजों में संदिग्धता है या स्पष्टता का अभाव है तब अस्थि परीक्षण के द्वारा आयु निर्धारण किया जा सकता है. मगर इस प्रकार किए गए निर्धारण में दो वर्ष ऊपर और नीचे की आयु गणना की संभावना होती है जिसका लाभ नाबालिग (Minor) के पक्ष में जाएगा.

कोर्ट ने नाबालिगता (Minor) से जुड़े मामले में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, प्रयागराज द्वारा पारित आदेश को रद्द करते हुए मामले पर कानून के अनुसार पुनः विचार करने के निर्देश दिए हैं. यह आदेश  जस्टिस जय प्रकाश तिवारी ने नाबालिग (Minor) की पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया.

मामला X Minor  बनाम राज्य सरकार एवं अन्य से संबंधित है.  मामला प्रयागराज के  फाफामऊ थाने का है. प्राथमिकी 16 फरवरी 2023 को दर्ज की गई थी, जिसमें दो नामजद और एक अज्ञात आरोपी था. याचिकाकर्ता का नाम एफआईआर में नहीं था, बल्कि जांच के दौरान सह-आरोपी के कथन के आधार पर उसका नाम सामने आया.

इसके बाद याचिकाकर्ता की ओर से स्वयं को नाबालिग(Minor) घोषित किए जाने हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया, जिसमें स्कूल प्रमाणपत्र के आधार पर जन्मतिथि 01.जनवरी.2006 बताई गई. हालांकि, जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने स्कूल प्रमाणपत्र को संदेहास्पद मानते हुए अस्थि-परीक्षण कराने का आदेश दिया.

चिकित्सा परीक्षण में याचिकाकर्ता की आयु 18 से 20 वर्ष के बीच बताई गई और मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने उसकी आयु 19 वर्ष आंकी. इसके आधार पर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने 28 जून 2023 को याचिकाकर्ता को घटना की तिथि पर बालिग मानते हुए नाबालिग (Minor) घोषित करने का आवेदन खारिज कर दिया. इस आदेश को सत्र न्यायालय ने भी बरकरार रखा.

Minor की आयु निर्धारण में मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र को प्राथमिकता दी जानी चाहिए

हाईकोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस अधिनियम, 2015 की धारा 94(2) के अनुसार Minor की आयु निर्धारण में सर्वप्रथम स्कूल प्रमाणपत्र या मैट्रिकुलेशन प्रमाणपत्र को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. केवल इन दस्तावेजों के अभाव में ही चिकित्सा परीक्षण कराया जा सकता है.

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अस्थि-परीक्षण आयु निर्धारण का सटीक माध्यम नहीं है, बल्कि इसमें दो वर्ष तक की त्रुटि संभव है. सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि सीमा रेखा मामलों में संदेह का लाभ अभियुक्त को दिया जाना चाहिए.

हाईकोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड का आदेश दिनांक 28 जून 2023 तथा अपीलीय आदेश को निरस्त करते हुए मामला पुनः जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को भेज दिया है, ताकि वह कानून और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप नए सिरे से निर्णय करे. न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि आदेश की प्रति सत्र न्यायाधीश, प्रयागराज के माध्यम से संबंधित बोर्ड को भेजी जाए.

इसे भी पढ़ें…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *