Cyber Crime केस में Police बैंक Account frozen (106 BNSS) की सूचना 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट को दे
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जारी किया प्रोटोकॉल, कहा बिना वजह बैंक Account frozen नहीं कर सकते

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि पुलिस द्वारा साइबर क्राइम के केस में किसी Account frozen की सूचना 24 घंटे के भीतर संबंधित मजिस्ट्रेट को देना अनिवार्य है. पुलिस बैंक को एकाउंट फ्रीज (Account frozen) करने के लिए नोटिस जारी कर रही है और उसके साथ केस का डिटेल नहीं है, तो यह भी गलत प्रैक्टिस है. पुलिस का ऐसा करना गैर कानूनी और मनमाना कृत्य माना जायेगा. संबंधित इंवेस्टिगेटिंग आफिसर को बैंकों को उस केस नंबर की डिटेल भी शेयर करनी होगी.
जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस मनजीव शुक्ला की बेंच ने यह फैसला देते हुए कहा कि बिना वजह किसी का बैंक एकाउंट फ्रीज (Account frozen) नहीं किया जा सकता. यह देखते हुए कि इस मामले में इंवेस्टिगेशन आफिसर ने कोई एफआईआर, कोई जब्ती आदेश और लेन के लिए कोई खास रकम नहीं दी थी, कोर्ट ने नोटिस रद्द किया और बैंक को याचिकाकर्ता का अकाउंट तुरंत डी-फ्रीज करने का निर्देश दिया है.
हाईकोर्ट की बेंच खालसा मेडिकल स्टोर के मालिक यशवंत सिंह द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा था. इस मामले में याचिकाकर्ता का एक्सिस बैंक अकाउंट पुलिस स्टेशन द्वारा बीएनएसएस की धारा 94 और 106 के तहत जारी नोटिस के बाद पूरी तरह से फ्रीज (Account frozen) कर दिया गया. यह डेबिट फ्रीज साइबराबाद के राचकोंडा स्थित साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन के जांच अधिकारी (IO) द्वारा बीएनएसएस की धारा 94/106 के तहत जारी नोटिस के बाद किया गया था.
यह कार्रवाई अपराध संख्या 520/2025 के संबंध में की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि पीड़ित के खाते से धोखाधड़ी कर पैसे इस खाते में ट्रांसफर किए गए थे. इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया. अपने 11 पेज के आदेश में कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि कई नोटिस के बावजूद, तेलंगाना के इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर पेश नहीं हुए.
मामले की सुनवाई के दौरान अपना पक्ष रखते हुए एक्सिस बैंक के वकील ने कहा कि नवंबर 2025 में उन्हें डेबिट फ्रीज (Account frozen) का नोटिस मिला, लेकिन उन्हें कभी भी कोई औपचारिक जब्ती आदेश या किसी खास रकम के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली जिसे फ्रीज किया जाना था.

बेंच को बताया गया कि बैंक द्वारा इंवेस्टिगेटिंग आफिसर को कई पत्र लिखने के बावजूद, कोई और दस्तावेज नहीं दिए गए. इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने कहा कि ऐसे कई मामलों में याचिकाकर्ताओं के पूरे अकाउंट पर डेबिट फ्रीज (Account frozen) लगा दिया जाता है, बिना बैंक को जब्ती नोटिस दिए, जो जांच अधिकारी द्वारा जारी किया जाना जरूरी है.
कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित कोर्ट में दर्ज मामलों की जानकारी भी बैंकों को नहीं दी जाती है, जो बदले में उन लोगों को यह जानकारी नहीं दे पाते हैं, जिनके अकाउंट फ्रीज (Account frozen) किए जा रहे हैं या जिन पर रोक लगाई जा रही है.
कोर्ट ने स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम तापस डी. नियोगी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया, जो (1999) 7 SCC 685 में रिपोर्ट किया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह साफ किया है कि बैंक अकाउंट वास्तव में ‘संपत्ति’ है जिसे सीआरपीसी की धारा 102 (बीएनएसएस की धारा 106) के तहत जब्त किया जा सकता है. ऐसी जब्ती तभी जायज है जब संपत्ति का अपराध करने से सीधा संबंध हो.
“ऐसी स्थिति समझी जा सकती है, जिसमें सीमित समय के लिए अकाउंट फ्रीज (Account frozen) करने की जरूरत हो. हालांकि, ऐसे गंभीर मामलों में भी इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर की जिम्मेदारी है कि वह तीन से चार दिनों के अंदर बैंक को जब्ती का ऑर्डर दे…साथ ही, वह रकम भी बताए जिस पर रोक लगाई जानी है.”
पूरे अकाउंट को फ्रीज (Account frozen) करने की प्रैक्टिस को गलत और गैर-कानूनी बताते हुए कोर्ट ने कहा:
हाईकोर्ट ने साइबर क्राइम के शक में बैंक अकाउंट फ्रीज (Account frozen) करने के लिए तय किये सिद्धांत:-
- 1. बीएनएसएस की धारा 106 की व्याख्या इस तरह से नहीं की जानी चाहिए कि पुलिस अधिकारियों को सिर्फ शक के आधार पर संपत्ति जब्त करके पैसे के विवादों में दखल देने का अधिकार मिल जाए, बल्कि यह उचित विश्वास पर आधारित होना चाहिए.
- 2. जांच अधिकारी द्वारा बैंक अकाउंट फ्रीज (Account frozen) करने की जानकारी तुरंत लाभार्थी के बैंक या पेमेंट सर्विस सिस्टम, जिसमें पेमेंट एग्रीगेटर भी शामिल है, के नोडल अधिकारी को भेजी जाएगी, ताकि वे अपनी तरफ से कार्रवाई कर सकें. पुलिस अधिकारी को कथित अपराध से संबंधित जानकारी देनी होगी और एफआईआर या मिली जानकारी की एक कॉपी साथ में देनी होगी. अगर कोई शिकायत या एफआईआर की कॉपी के बिना रिक्वेस्ट मिलती है, तो बैंक या पेमेंट सिस्टम ऑपरेटर रिक्वेस्ट को मना कर सकता है.
- 3. बीएनएसएस की धारा 106 के तहत नोटिस में एक खास रकम (आरोपी के बैंक अकाउंट से ट्रांसफर की गई या उसमें आई रकम) पर लेन मार्क करने की जरूरत हो सकती है, लेकिन किसी भी मामले में पुलिस किसी भी बैंक या पेमेंट सिस्टम ऑपरेटर से, जिसमें पेमेंट एग्रीगेटर भी शामिल है, पूरे फाइनेंशियल अकाउंट को ब्लॉक या सस्पेंड करने के लिए नहीं कह सकती या रिक्वेस्ट नहीं कर सकती.
- 4. जैसे ही किसी बैंक या किसी फाइनेंशियल इंटरमीडियरी, जिसमें पेमेंट सिस्टम ऑपरेटर भी शामिल है को ब्लॉक करने या होल्ड पर रखने या लेन मार्क करने की जानकारी भेजी जाती है तो यह जानकारी 24 घंटे के अंदर जूरिस्डिक्शनल ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट को भी साथ ही भेजी जाएगी. जानकारी न देने पर ऐसी कार्रवाई अमान्य हो सकती है.
- 5. अगर कोई बैंक सही प्रक्रिया का पालन किए बिना पुलिस के कहने पर किसी एंटिटी/नागरिक द्वारा बनाए गए किसी बैंक अकाउंट या एस्क्रो अकाउंट को होल्ड पर रखता है, तो बैंक ऐसी एंटिटी/नागरिक के फाइनेंशियल और रेप्युटेशनल नुकसान सहित नुकसान के लिए सिविल और क्रिमिनल नतीजों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होगा.
Khalsa Medical Store through it Propriter Yashwant Singh V/s Reserve Bank of India and 3 others; Writ C 12211 of 2025
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