‘पत्नी का भरण-पोषण (125 CrPC) करना Husband का पवित्र कर्तव्य बशर्ते पत्नी या उसके परिवार वाले उसे अयोग्य न बना दें’
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैमिली कोर्ट कुशीनगर पडरौना के आदेश पर लगायी मुहर, पत्नी को मेंटेनेस देने से इंकार

पत्नी का भरण-पोषण करना पति का पवित्र कर्तव्य है. आम तौर पर जिस Husbandके पास पर्याप्त साधन हैं और वह अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने में लापरवाही करता है या मना करता है तो उसे कानून का संरक्षण नहीं मिल सकता. वर्तमान मामले के तथ्यों को परखने पर पहली नजर में ऐसा लगता है कि पत्नी और उसके परिवार वालों के व्यवहार के कारण Husband रोजी-रोटी कमाने में असमर्थ हो गया है. रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री स्पष्ट रूप से स्थापित करती है कि विपक्षी पक्ष को गोली लगने से गंभीर चोट लगी है.
एक छर्रा उसकी रीढ़ की हड्डी में फंसा हुआ है. मेडिकल सलाह से पता चलता है कि किसी भी सर्जिकल हस्तक्षेप से लकवा होने का गंभीर खतरा है. इन तथ्यों को रखते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस लक्ष्मीकांत शुक्ला ने पडरौना जिले की ट्रायल कोर्ट द्वारा पत्नी को कोई मेंटेनेंस न दिये जाने के फैसले को उचित उठराया है और पत्नी की तरफ से हाई कोर्ट में दाखिल की गयी रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया है.
कोर्ट ने कहा कि चैलेंज किये गये आदेश को पारित करते समय ट्रायल कोर्ट ने कोई स्पष्ट अवैधता या बड़ी अनियमितता नहीं की है. ट्रायल कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने में कोई गलती की और न ही उसका उल्लंघन किया.
अगर कोई पत्नी अपने कामों या गलतियों से अपने पति की कमाने की क्षमता में कमी लाती है या उसमें योगदान देती है, तो उसे ऐसी स्थिति का फायदा उठाने और भरण-पोषण का दावा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. ऐसी परिस्थितियों में भरण-पोषण देना पति के साथ घोर अन्याय होगा, और कोर्ट रिकॉर्ड से सामने आ रही सच्चाई से आंखें नहीं मूंद सकता.
कोर्ट का कमेंट
यह आपराधिक पुनरीक्षण याचिका अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, कुशीनगर, पडरौना द्वारा केस नंबर 600/2019, विनीता बनाम डॉ. वेद प्रकाश सिंह (Husband) में 07 मई 2025 को दिये गये आदेश की वैधता को चुनौती देते हुए दायर की गई थी. ट्रायल कोर्ट ने पुनरीक्षणकर्ता का अंतरिम भरण-पोषण मांगने वाला आवेदन खारिज कर दिया था. पुनरीक्षणकर्ता के वकील का कहना था कि विवादित आदेश अवैध, मनमाना है और बिना सोचे-समझे पारित किया गया है.
Husband गोलीबारी की घटना के कारण अपनी आजीविका कमाने में असमर्थ हो गया
ट्रायल कोर्ट का फैसला इस तथ्य पर आधारित है कि विपक्षी पक्ष (Husband) एक गोलीबारी की घटना के कारण अपनी आजीविका कमाने में असमर्थ हो गया था, जिसमें पुनरीक्षणकर्ता के सगे भाई और उसके साथियों ने उसे मारने का प्रयास किया था. पुनरीक्षणकर्ता ने धारा 125 सीआरपीसी के तहत Husband से भरण-पोषण मांगने के लिए एक आवेदन दायर किया था, जिसमें उसने खुद को उसकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी होने का दावा किया था.
याचिका में मेंटेनेंस को लेकर जस्टिस कृष्णा अय्यर द्वारा कैप्टन रमेश चंद्र कौशल बनाम श्रीमती वीना कौशल और अन्य (1978)4 SCC 70 में दिये गये सुझाव का भी जिक्र किया गया गया. इस आदेश का हिस्सा इस केस का फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी कोट किया…भरण-पोषण कानूनों का उद्देश्य है:
“9. यह प्रावधान सामाजिक न्याय का एक उपाय है और विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है और यह अनुच्छेद 15(3) के संवैधानिक दायरे में आता है, जिसे अनुच्छेद 39 द्वारा मजबूत किया गया है. हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि अदालतों द्वारा व्याख्या के लिए बुलाए गए कानूनों की धाराएँ जमी हुई छपाई नहीं हैं, बल्कि सामाजिक कार्यों को पूरा करने वाले जीवंत शब्द हैं. महिलाओं और बच्चों जैसे कमजोर वर्गों के लिए संवैधानिक सहानुभूति की गहरी उपस्थिति को व्याख्या में शामिल किया जाना चाहिए यदि इसे सामाजिक प्रासंगिकता रखनी है. इस प्रकार देखने पर, दो विकल्पों में से उस व्याख्या को चुनना संभव है जो इस उद्देश्य को आगे बढ़ाती है”
125 सीआरपीसी के तहत पत्नी को मेंटेनेंस देने के लिए जरूरी शर्तें
- (i) जिस व्यक्ति के खिलाफ राहत मांगी जा रही है, उसके पास पर्याप्त साधन होने चाहिए
- (ii) आवेदक-पत्नी अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ होनी चाहिए
- (iii) पत्नी विपक्षी पार्टी (Husband) से अलग रह रही हो
- (iv) ऐसा अलग रहना उचित और न्यायसंगत कारणों से होना चाहिए.
सुनवाई के दौरान जसबीर कौर सहगल (श्रीमती) बनाम डिस्ट्रिक्ट जज, देहरादून और अन्य, (1997) 7 SCC 7 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये फैसले को अंश को भी कोट किया गया:

8. भरण-पोषण की राशि तय करने के लिए कोई निश्चित फॉर्मूला नहीं बनाया जा सकता. यह स्वाभाविक रूप से हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है. कोर्ट को पार्टियों की स्थिति, उनकी जरूरतों, Husband की भुगतान करने की क्षमता को ध्यान में रखते हुए, उसके अपने भरण-पोषण और उन लोगों के लिए जिन्हें वह कानून के तहत बाध्य है और वैधानिक लेकिन अनैच्छिक भुगतानों या कटौतियों पर विचार करना होगा.
पत्नी के लिए तय की गई भरण-पोषण की राशि ऐसी होनी चाहिए कि वह अपनी स्थिति और उस जीवन शैली को ध्यान में रखते हुए आराम से रह सके, जिसकी उसे अपने Husband के साथ रहते समय आदत थी, और यह भी कि उसे अपने मामले को आगे बढ़ाने में कोई बाधा महसूस न हो. साथ ही, तय की गई राशि बहुत ज्यादा या ज़बरदस्ती वाली नहीं होनी चाहिए.
कोर्ट में पेश किये गये तथ्यों के अनुसार Husband एक होम्योपैथी डॉक्टर था जो अपना क्लिनिक चलाता था. 13 अप्रैल 2019 को जब वह अपने क्लीनिक पर था, याचिकाकर्ता का सगा भाई और पिता चार अन्य लोगों के साथ उसके क्लिनिक पर आए गंदी गालियाँ दीं, और जान से मारने की धमकी दी. विरोध करने पर याचिकाकर्ता के भाई ने फायर कर दिया. गोली उसकी रीढ़ की हड्डी में फंस गयी, जिसे अब तक निकाला नहीं जा सका है.
मेडिकल सलाह के अनुसार इसे हटाने की कोई भी कोशिश लकवा का कारण बन सकती है. चोट के कारण Husband थोड़ी देर के लिए भी आराम से बैठ नहीं पाता. इसके चलते वह बेरोजगार हो गया है और कोई इनकम जेनरेट कर पाने में असमर्थ है. इन परिस्थितियों को देखते हुए ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता का अंतरिम भरण-पोषण का आवेदन खारिज कर दिया.
याचिकाकर्ता के वकील तथ्यात्मक निष्कर्षों को चुनौती नहीं दे सके और बहस के दौरान केवल इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता का Husband एक डॉक्टर है और उसके पास पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं. इसके बावजूद वह याचिकाकर्ता का भरण-पोषण करने में विफल रहा है. ट्रायल कोर्ट ने तथ्यों को परखने में गंभीर अनियमितता की है.
एक Husband भले ही उसके पास रेगुलर नौकरी न हो, उससे उम्मीद की जाती है कि वह अपनी क्षमता के अनुसार खुद और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उचित काम करे. यह केस डिफरेंट है. पहले Husband अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने में सक्षम था. उसके पास पर्याप्त साधन थे. लेकिन याचिकाकर्ता के भाई और पिता द्वारा किए गए आपराधिक कृत्य के कारण उसकी कमाने की क्षमता पूरी तरह से खत्म हो गई. यानी यह याचिकाकर्ता पक्ष का आचरण था जिसने Husband को कमाने में असमर्थ बना दिया और उसे बिना पर्याप्त साधनों के छोड़ दिया.
कोर्ट ने तथ्यों को परखने के बाद किया कमेंट
Neutral Citation No. – 2026:AHC:13863; CRIMINAL REVISION No. – 8658 of 2025
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