Arrest memo के क्लॉज 13(1) से (vi) के तहत जरूरी गिरफ्तारी के कारणों का विवरण देने की शर्तों का पालन पुलिए नहीं कर रही
इलाहाबाद HC का डीजीपी यूपी को निर्देश, कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करने वाले पुलिस अधिकारी को सस्पेंड करने के बाद विभागीय कार्रवाई के लिए उत्तरदायी ठहराएं

इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय और जस्टिस सिद्धार्थ की बेंच ने डॉक्टर उमंग रस्तोगी और अन्य की तरफ से दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए सिविल जज (सीनियर डिवीजन), फास्ट ट्रैक कोर्ट गौतम बुद्ध नगर द्वारा केस क्राइम नंबर 750/2025 में सेक्शन 317(2) और 317(4), थाना बिसरख, जिला- जीबी नगर के तहत पारित रिमांड आदेश और 27 दिसंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है.
दो जजों की बेंच ने कहा कि, Arrest memo को सिर्फ देखने से पता चलता है कि पैराग्राफ 13 में बताए गए गिरफ्तारी के कारणों को छह सब-क्लॉज में बांटा गया है. वर्तमान मामले में, पुलिस के जांच अधिकारी ने एक भी क्लॉज की शर्त पूरी नहीं की है. उसने सिर्फ इतना कहा है कि आरोपी को उसके द्वारा किए गए अपराध और उन धाराओं के बारे में बताया गया है.
बेंच ने कहा कि सेक्शन 13 का कोई भी सब-क्लॉज यह नहीं कहता कि आरोपी को सिर्फ उसके द्वारा किए गए अपराध और उसे फंसाने वाली धारा के बारे में बताया जाना चाहिए, बल्कि उपरोक्त क्लॉज में यह जरूरी है कि आरोपी को उन सभी सबूतों के बारे में बताया जाए जिनसे अपराध में उसकी संलिप्तता साफ होती है और उन सबूतों को रिकॉर्ड पर लाया जाए जिनके आधार पर उक्त अपराध के आरोपी व्यक्ति की गिरफ्तारी जरूरी है.
याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी के समय तक जांच अधिकारी द्वारा इकट्ठा किए गए सबूतों का कोई विवरण नहीं दिया गया. गिरफ्तार किए गए व्यक्ति से संबंधित अन्य इकट्ठा किए गए सबूतों, दस्तावेज़ी या इलेक्ट्रॉनिक, का विवरण भी नहीं दिया गया.
बीएनएसएस और अन्य कानूनों की धाराओं की डिटेल्स, उनके सपोर्टिंग मटीरियल और गिरफ्तार आरोपी के खिलाफ इकट्ठा किए गए सबूतों का भी Arrest memo में खुलासा नहीं किया गया था. इस आधार पर कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी पूरी तरह से गैर-कानूनी थी और खुद प्रतिवादियों द्वारा तैयार किए गए Arrest memo की जरूरतों के खिलाफ थी.
जो पुलिस अधिकारी Arrest memo की जरूरतों का पालन नहीं कर रहे हैं और भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत दिए गए संवैधानिक आदेश का उल्लंघन कर रहे हैं और साथ ही सेक्शन 50 और 50A सीआरपीसी/ 47, 48 बीएनएसएस का उल्लंघन कर रहे हैं, उनके साथ सख्ती से निपटा जाना चाहिए.
संवैधानिक आदेश सीआरपीसी/बीएनएसएस के प्रावधान और यूपी राज्य के डीजीपी के 25 जुलाई 2025 के निर्देश का उल्लंघन इस मामले की जांच कर रहे पुलिस कर्मियों की ओर से कर्तव्य में लापरवाही साफ तौर पर दिखाता है. कानून का सिर्फ दिखावटी पालन और अदालत के सामने उसका बचाव, जैसा कि इस मामले में प्रतिवादियों ने किया है, उसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए.
कोर्ट ने जजमेंट में कोट कराया
यह निर्देश दिया जाता है कि किसी भी पुलिस अधिकारी द्वारा, किसी आरोपी को गिरफ्तार करते समय, Arrest memo के क्लॉज 13 के अनुसार गिरफ्तारी के आधारों का खुलासा न करके, उपरोक्त कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करना, संबंधित पुलिस अधिकारी द्वारा कर्तव्य में लापरवाही का दुराचार माना जाएगा और उसे सस्पेंड करने के बाद विभागीय कार्रवाई के लिए उत्तरदायी ठहराया जाएगा, ताकि वह इस गैर-कानूनी काम को और न दोहराए. इस आदेश को इस अदालत के रजिस्ट्रार (अनुपालन) द्वारा एक सप्ताह के भीतर डीजीपी यूपी को आवश्यक अनुपालन के लिए भेजा जाए.
कोर्ट ने डीजीपी को दिया निर्देश
केस के फैक्टस के अनुसार 28 नवंबर 2025 को शाम लगभग 05:40 बजे, याचिकाकर्ता के पिता जो हल्द्वानी, उत्तराखंड के स्थायी निवासी हैं को पुलिस स्टेशन- बिसरख, जिला- गौतम बुद्ध नगर के एसएचओ ने लक्ष्मी नगर, दिल्ली में याचिकाकर्ताओं के बिजनेस परिसर से अगवा कर लिया. उन्हें 5 दिनों तक थाना बिसरख, गौतम बुद्ध नगर, यूपी में रखा गया. 03 दिसंबर 2025 को उनके खिलाफ धारा 317(2) बीएनएस के तहत एफआईआर नंबर 940/2025 दर्ज की गई और उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया.

याचिकाकर्ता के पिता ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की. दावा किया कि बदले की भावना से पुलिस ने 26 दिसंबर 2025 को हल्द्वानी उत्तराखंड से याचिकाकर्ता को बिना गिरफ्तारी का कोई कारण बताए गिरफ्तार कर लिया. उसे गौतम बुद्ध नगर के सूरजपुर जिला कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और उन्हें Arrest memo की कोई कॉपी नहीं दी गई.
उनके वकील ने उसी दिन उपरोक्त आधार पर उनकी रिहाई के लिए एक आवेदन दिया जिसे खारिज कर दिया. याचिकाकर्ता ने गैर-कानूनी रिमांड आदेश और गैर-कानूनी Arrest memo को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी थी. याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पुलिस अधिकारियों ने मनमाने तरीके से काम किया है और जब इस बात की ओर मजिस्ट्रेट का ध्यान दिलाया गया तो उन्होंने भी की गिरफ्तारी से पहले कानून की आवश्यकताओं पर अपने न्यायिक विवेक का इस्तेमाल नहीं किया.
स्टेट की तरफ से जवाबी हलफनामे के आधार पर अतिरिक्त महाधिवक्ता ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की स्वीकार्यता पर इस आधार पर सवाल उठाया कि यह गैर-कानूनी गिरफ्तारी नहीं है बल्कि कानून के अनुसार गिरफ्तारी है. याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी में कानून की प्रक्रिया का पालन किया गया है. याचिकाकर्ता न्यायिक हिरासत में है और इसलिए, उसकी हिरासत को अवैध नहीं कहा जा सकता.
गिरफ्तारी करते समय एक वैध Arrest memo की सभी जरूरतों का पूरी तरह से पालन किया गया
यह बताया गया है कि याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी करते समय एक वैध Arrest memo की सभी जरूरतों का पूरी तरह से पालन किया गया है. तर्क दिया गया है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में कोई दम नहीं है और इसे खारिज कर दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि डीसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता का छह मामलों का आपराधिक इतिहास है और इसलिए वह इस अदालत से किसी भी तरह की रियायत का हकदार नहीं है.
HABEAS CORPUS WRIT PETITION No. – 35 of 2026 Umang Rastogi, And Another Versus State Of U.P. And 3 Others
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