34 IPC: General intent की Applicability तब सामने आती है, जब अपराध करने में मुख्य भूमिका कुछ व्यक्तियों द्वारा निभाई जाती है:HC
हाई कोर्ट ने हत्या के आरोपितों को कोई राहत देने से किया इंकार, सरेंडर करके जेल जाने और सजा पूरी करने का आदेश

आईपीसी की धारा 34 Applicability of general intent तब सामने आती है, जब अपराध करने में मुख्य भूमिका कुछ व्यक्तियों द्वारा निभाई जाती है. जब सक्रिय अपराधी के अलावा कुछ अन्य आरोपी मौके पर मौजूद होते हैं और अपराध उन सभी के सामान्य इरादे को आगे बढ़ाने के लिए किया गया हो. उस स्थिति में जिन सभी व्यक्तियों के general intent को आगे बढ़ाने के लिए अपराध किया गया था उन्हें व्यक्तिगत जिम्मेदारी के रूप में सभी अपराधों के लिए उत्तरदायी ठहराया जाता है.
इस निष्कर्ष के आधार पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की बेंच ने हत्या के मामले में लोअर कोर्ट से सुनायी गयी आजीवन कारावास की सजा पाने वाले आरोपितों को कोई राहत देने से इंकार कर दिया है. फैसला सुनाते हुए बेंच ने कहा कि सबूतों से पता चलता है कि दोनों आरोपी अपीलकर्ताओं ने अपने-अपने हथियारों से मृतक पर गोली चलाई, ऐसी स्थिति में IPC की धारा 34 की Applicability की कोई आवश्यकता नहीं है, इसलिए दोषसिद्धि आदेश में संशोधन किया जाना चाहिए.
क्योंकि आरोपी-अपीलकर्ता राम सेवक और जबर सिंह को आईपीसी की धारा 302 के तहत अपराध करने का दोषी ठहराया जाता है, यानी मृतक भजन लाल की हत्या और दोषसिद्धि आदेश को बरकरार रखा जाना चाहिए. लोअर कोर्ट द्वारा दी गई सजा कानून के अनुसार पर्याप्त नहीं है. हत्या के दोषी को मौत की सजा या आजीवन कारावास के साथ जुर्माना लगाने का दायित्व डालती है.
निचली अदालत ने अपीलकर्ताओं को आजीवन कारावास की सजा दी है लेकिन जुर्माना लगाने की उपेक्षा की है जिसे आजीवन कारावास की सजा के अलावा अपीलकर्ताओं पर जुर्माना लगाकर सुधारा जाना चाहिए. यह याचिका राम सेवक और जबर सिंह की ओर से दाखिल की गयी थी. इन दोनों को द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, इटावा द्वारा सत्र परीक्षण संख्या 179/1987 में सजा सुनायी गयी थी.
याचिका में लोअर कोर्ट के फैसले को चैलेंज किया गया था. केस के तथ्यों के अनुसार नाथूराम के बेटे मान सिंह ने थाना इकदिल, जिला इटावा में एक एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें कहा गया कि उनके मामा भजनलाल शर्मा उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, किलो सुल्तानपुर, गांव महनेपुर के प्रिंसिपल की उसी गांव के रामसेवक पुत्र बीरबल पाल से जमीन को लेकर दुश्मनी थी. उस दुश्मनी के कारण ग्राम प्रधान रामसेवक मारने का मौका ढूंढ रहा था.

घटना के दिन 08 जून 1987 को सुबह जब मृतक गांव महनेपुर के मानसिंह, वीरेंद्र सिंह लोधी के साथ इटावा बाजार जा रहे थे. गांव मानिकपुर मिखान के सामने बंबई मोड़ पर जबर सिंह बुलेट मोटरसाइकिल पर रामसेवक प्रधान के साथ पीछे से आया. अपीलकर्ता रामसेवक के हाथ में दोनाली बंदूक थी. मोड़ से थोड़ा आगे, जबर सिंह ने मोटरसाइकिल रोकी और कहा, अब किस बात का इंतजार कर रहे हो प्रधान जी, आदमी को मारने का इससे अच्छा मौका कब मिलेगा.
रामसेवक ने अपनी बंदूक से फायरिंग शुरू कर दी. जबर सिंह ने भी अपनी पिस्तौल निकाली और भजनलाल पर फायरिंग शुरू कर दी. दोनों ने मिलकर शरीर को गोलियों से छलनी कर दिया. बाकी अपनी जान बचाने के लिए पास के एक गड्ढे में छिप गए और पूरी घटना देखी.
लिखित रिपोर्ट मिलने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत अपराध संख्या 97/1987 के रूप में एफआईआर दर्ज की गई. सक्षम जांच अधिकारी को तुरंत जांच सौंपी गई. जांच अधिकारी ने मामले की पूरी जांच की. कानून के अनुसार पंचनामा तैयार किया और शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. जांच के दौरान आरोपी व्यक्तियों को गिरफ्तार किया गया.
अपराध करने में कथित तौर पर इस्तेमाल किया गया हथियार अपीलकर्ता की निशानदेही पर बरामद किया गया. जांच अधिकारी ने गवाहों के बयान दर्ज किए और संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने आरोपी व्यक्तियों के खिलाफ चार्जशीट पेश की. अपराध का संज्ञान 10.07.1987 को लिया गया और मामला सेशन कोर्ट को सौंप दिया गया, क्योंकि यह मामला विशेष रूप से सेशन कोर्ट द्वारा विचारणीय था.
302 के साथ धारा 34 (Applicability of general intent) के तहत दंडनीय अपराध का दोषी पाया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई

इसके बाद अपीलकर्ताओं के खिलाफ आरोप तय किए गए, जिस पर उन्होंने खुद को निर्दोष बताया और ट्रायल की मांग की. अभियोजन पक्ष ने 11 गवाहों की जांच की और 25 दस्तावेजी सबूत पेश किए. रिकॉर्ड पर मौजूद मौखिक और दस्तावेजी सबूतों पर विचार करने और आरोपी-अपीलकर्ताओं के विद्वान वकील के साथ-साथ विद्वान सरकारी वकील द्वारा दी गई दलीलों को सुनने के बाद, विद्वान ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ताओं को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के साथ धारा 34 (Applicability of general intent) के तहत दंडनीय अपराध का दोषी पाया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई.
ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित दोषसिद्धि के फैसले और सजा के आदेश से व्यथित होकर, अपीलकर्ताओं ने अपील ज्ञापन में बताए गए विभिन्न आधारों पर विवादित फैसले को चुनौती देते हुए यह आपराधिक अपील दायर की थी. तथ्यों को परखनें के बाद बेंच ने कहा कि, यह कोर्ट खुद को निचली अदालत द्वारा दर्ज किए गए निष्कर्षों और निकाले गए नतीजों से पूरी तरह सहमत पाता है.
इस कोर्ट के सामने ऐसा कुछ भी नहीं बताया गया है जो उसे मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निचली अदालत द्वारा लिए गए फैसले से अलग राय लेने के लिए मजबूर करे. यह अपील गलत और बेबुनियाद आधारों पर दायर की गई है और इसलिए इसे खारिज किया जाना चाहिए.
बेंच ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित निर्णय और आदेश, जहां तक यह आईपीसी की धारा 302 से संबंधित है, को बरकरार रखा और आरोपी राम सेवक और जबर सिंह को आजीवन कारावास की सजा और आईपीसी की धारा 302 के तहत प्रत्येक को 10,000 रुपये का जुर्माना देने का आदेश दिया. जुर्माने का भुगतान न करने पर, उन दोनों को दो साल की और जेल होगी.
बेंच ने पाया कि अपीलकर्ता जमानत पर हैं. इस पर कोर्ट ने जमानत बांड रद्द कर दिया और जमानतदारों को बरी कर दिया. अपीलार्थियों को निर्देश दिया कि एक सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करें ताकि ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई बाकी सजा पूरी कर सकें.
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