शादी का वादा शुरू से ही झूठा साबित होने पर ही 376 आईपीसी के तहत Rape माना जा सकता है

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई पुरुष आपसी सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों (Rape) के बाद शादी करने से इनकार कर देता है, तो उसे तब तक बलात्कार (धारा 376 आईपीसी Rape) नहीं माना जा सकता जब तक कि यह साबित न हो जाए कि शादी का वादा शुरू से ही झूठा था और केवल यौन शोषण (Rape) के उद्देश्य से किया गया था. यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट दुष्कर्म और एससी/एसटी एक्ट में दर्ज मुकदमे की पूरी कार्यवाही रद्द कर दिया. यह आदेश जस्टिस अनिल कुमार-दशम की पीठ ने दिया है.
यह मामला आजमगढ़ जिले के बिलरियागंज थाने का है, जहाँ एक महिला (पीड़िता) की माँ ने अविनाश शर्मा उर्फ अभिनव शर्मा के खिलाफ Rape की धारा में प्राथमिकी दर्ज कराई थी. आरोप था कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर पीड़िता के साथ संबंध (Rape) बनाए और बाद में जातिगत कारणों का हवाला देते हुए शादी से इनकार कर दिया और धमकी दी. याची ने Rape की धारा में दर्ज मुकदमे की पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में अपील दायर की.
कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद कहा कि सहमति तभी अमान्य होती है जब वह झूठा वादा के कारण दी गई हो. सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि आरोपी को दोषी ठहराने के लिए यह साबित करना आवश्यक है कि उसका वादा शुरुआत से ही दुर्भावनापूर्ण था. केवल बाद की परिस्थितियों के कारण शादी न कर पाना ‘धोखाधड़ी’ नहीं है.
पीड़िता ने धारा 164 सीआरपीसी के तहत बयान में स्वीकार किया कि वह चार महीने से रिश्ते में थी. उसने यह भी कहा कि यदि आरोपी उससे शादी कर लेता है, तो वह मुकदमा नहीं चलाना चाहती.
मामला आपसी सहमति से बने संबंधों (Rape नहीं) और उसके बाद हुए ‘वादे के उल्लंघन’ का
कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल जातिगत आधार पर शादी से इन्कार करना एससी/एसटी अधिनियम के तहत अपराध नहीं बनाता, क्योंकि सार्वजनिक रूप से अपमानित करने वाले कोई विशिष्ट जातिगत शब्द नहीं कहे गए थे. कोर्ट ने कहा कि यह मामला आपसी सहमति से बने संबंधों और उसके बाद हुए ‘वादे के उल्लंघन’ का है. अदालत ने आरोपी के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही और निचली अदालत द्वारा जारी समन आदेश को रद्द कर दिया.
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