महिला को मुकदमे वाली Property से बेदखल करना प्रशासनिक शक्तियों का घोर दुरुपयोग, प्रतिवादी पर 1 लाख जुर्माना
HC ने दिया 48 घटें में कब्जा लौटाने, ट्रायल कोर्ट के जज के खिलाफ कार्रवाई के लिए चीफ जस्टिस के समक्ष फाइल पेश करने का निर्देश

निचली अदालत और प्रशासनिक अधिकारियों दोनों ने याचिकाकर्ता (महिला) को Property से बेदखल करने में पूरी तरह से गलत इरादे से और शक्ति का गलत इस्तेमाल किया है. इसलिए कोर्ट इस दलील को स्वीकार करने से इनकार नहीं करती है कि यह याचिका स्वीकार नहीं की जानी चाहिए थी और याचिकाकर्ता को आपत्ति दर्ज करने और ट्रायल कोर्ट के सामने उचित राहत के लिए प्रार्थना करने के वैकल्पिक उपाय का सहारा लेना चाहिए था. इस कमेंट के साथ इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और अरुण कुमार की बेंच ने कड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने याची से खाली करायी गयी दुकान और मकान (Property) का कब्जा 48 घंटे के भीतर लौटाने का आदेश दिया है.
कोर्ट ने आदेश की प्रति हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के सामने रखने का निर्देश दिया है ताकि वह सिविल जज जूनियर डिवीजन के खिलाफ उचित कार्रवाई के लिए आदेश पारित कर सकें. साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को एक लाख रुपये की लागत का हकदार माना. इसका भुगतान कोर्ट के कर्मचारी को करना होगा जो इस केस में प्रतिवादी था. उसे कोर्ट ने सात दिन का मौका दिया है. ऐसा न करने पर उससे एक महीने के भीतर वसूल करके दिलाने का आदेश दिया है.
यह याचिका सिद्धार्थ नगर जनपद के बांसी तहसील की रहने वाली श्रीमती सोनी की तरफ से दाखिल की गयी थी. याचिका में उन्होंने दुकान का ताला खोलने और संयुक्त पैतृक घर (Property) पर कब्जा दिलाने के साथ ही कार्रवाई करने वालों के खिलाफ उचिक कार्रवाई करने की मांग में दाखिल की थी. मामले के अनुसार श्रीमती सोनी के ससुर, गेलहारी, प्लॉट नंबर 211, क्षेत्रफल 0.431 हेक्टेयर Property के सह-काश्तकार थे.
उनकी मृत्यु के बाद, याचिकाकर्ता के पति श्यामजी, उनके भाई प्रेमजी, रामजी और लालजी और उनकी माँ शिवधारी देवी के नाम उनकी जगह संबंधित खतौनी में दर्ज किए गए. अपने जीवनकाल में उन्होंने उक्त प्लॉट पर एक दो मंजिला इमारत बनवाई थी. जिसका बंसी-डांडी रोड पर 20 फीट का फ्रंट और 68 फीट की चौड़ाई थी. इस Property के ग्राउंड फ्लोर पर दो दुकानें हैं. एक दुकान में याचिकाकर्ता ब्यूटी पार्लर चलाकर परिवार की आजीविका का साधन जुटा रही थी.

याचिकाकर्ता का कहना था कि उसके पति श्यामजी और उनके छोटे भाई प्रेमजी दुर्भाग्य से प्रतिवादी की बुरी संगत में पड़ गए और उसके साथ शराब पीने लगे. प्रतिवादी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेशकार है. स्थिति का फायदा उठाकर उसने अविभाजित Property आवासीय घर के एक हिस्से का बिक्रीनामा 14 फरवरी 2024 को करा लिया. प्रतिवादी ने रिहायशी घर के एक खास हिस्से के लिए बिक्रीनामा हासिल किया, यह जानते हुए भी कि उक्त घर का सह-मालिकों के बीच कभी कोई बंटवारा नहीं हुआ था और सभी सह-मालिकों के परिवार उसी घर में रह रहे थे.
13 जनवरी 2025 को तहसीलदार पुलिस बल और प्रतिवादी के साथ याचिकाकर्ता के घर पहुंचे और उसे Property खाली करने के लिए कहा. मकान और दुकान पर कब्जे का यह प्रयास विफल हो गया तो उसने याचिकाकर्ता, उसके पति श्यामजी और उसके भाई प्रेमजी के खिलाफ मूल मुकदमा नंबर 49/2025 दायर किया.
इसमें बिक्रीनामा के जरिए कथित तौर पर खरीदी गई संपत्ति (Property) पर प्रतिवादियों को कब्जा करने से रोकने, उक्त घर का ताला तोड़ने से, उस पर निर्माण करने से और उसके कथित कब्जे में दखल देने से रोकने के लिए स्थायी निषेधाज्ञा की डिक्री की मांग की गई. बता दें कि अन्य तीन सह-मालिकों को मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया गया था.
मुकदमे की तारीख पर, सिविल जज (जूनियर डिवीजन) ने प्रतिवादियों को समन जारी किया और लिखित बयान दाखिल करने के लिए 24 फरवरी 2025 और मुद्दों को तय करने के लिए 6 मार्च 2025 की तारीख तय की. उसी तारीख को, सिविल जज (जूनियर डिवीजन) ने एकतरफा अंतरिम निषेधाज्ञा भी जारी की, जिसमें प्रतिवादियों को वाद संपत्ति पर वादी के कथित कब्जे में दखल देने से रोका गया.
ताला तोड़कर जबरन Property पर कब्जा कर लिया
प्रतिवादी के पास कब्जा नहीं था इसलिए उसने सिद्धार्थ नगर पुलिस अधीक्षक को एप्लीकेशन देकर आरोप लगाया गया कि प्रतिवादियों ने स्टे ऑर्डर के बावजूद, ताला तोड़कर जबरन घर (Property) पर कब्जा कर लिया है. आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता और मुकदमे के अन्य प्रतिवादियों ने मार्च के आखिर तक घर खाली करने पर सहमति जताई थी. बार-बार अनुरोध करने के बाद भी उन्होंने ऐसा नहीं किया. इसलिए, संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने का अनुरोध किया गया कि वे प्रतिवादी को मुकदमे वाली Property का कब्जा दिलवाएं.

आवेदन पर, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट ने 25 जून 2025 के आदेश द्वारा तहसीलदार को राजस्व और पुलिस अधिकारियों की एक संयुक्त टीम गठित करने और मामले का निपटारा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया. इसके अनुसरण में, तहसीलदार ने टीम गठित करने का निर्देश दिया. इसके बाद राजस्व अधिकारियों और पुलिस कर्मियों की एक संयुक्त टीम प्रस्तावित की गई. याचिकाकर्ता को जबरन गिरफ्तार कर लिया गया और उसके तीन बच्चों, जिनकी उम्र क्रमशः 8 साल, 4 साल और 3 साल थी के साथ एक पुलिस वाहन में हिरासत में ले लिया गया.
राजस्व अधिकारियों और पुलिस ने याचिकाकर्ता द्वारा चलाए जा रहे ब्यूटी पार्लर में पड़ा सारा सामान जबरन बाहर फेंक दिया. इसके बाद, उन्होंने प्रतिवादी को परिसर (Property) पर अपना ताला लगाने की अनुमति देकर Property (घर) का कब्जा सौंप दिया. याचिकाकर्ता को मूल मुकदमे में 27.1.2025 को पारित अंतरिम आदेश के बारे में पहले से कोई जानकारी नहीं थी.
18.7.2025 को, जब उसे जबरन बेदखल किया जा रहा था, तब राजस्व और पुलिस अधिकारियों की संयुक्त टीम ने उसे अस्थायी रोक के आदेश के बारे में बताया. इसके बाद याचिकाकर्ता ने डीएम और मुख्यमंत्री पोर्टल पर गुहार लगायी लेकिन कोई राहत नहीं मिली तो उसने याचिका दाखिल की.
सुनवाई के बाद हाई कोर्ट के जजों की बेंच ने माना कि रिपोर्ट में 27 जनवरी 2025 के एकतरफा निषेधाज्ञा आदेश का सहारा लिया गया है, यह समझे बिना कि उक्त आदेश निषेधात्मक शर्तों में था और प्रतिवादी को कब्जा दिलाने के लिए नहीं था. ट्रायल कोर्ट के 05.02.2025 के आदेश का भी कोई ज़िक्र नहीं है, शायद इसलिए कि उक्त आदेश के कथित अनुपालन में, कथित तौर पर प्रतिवादी को पहले ही कब्जा वापस दे दिया गया था और इसलिए, उक्त आदेश खुद ही खत्म हो गया था. रिपोर्ट याचिकाकर्ता के इस रुख को मजबूत करती है कि प्रतिवादी कथित बिक्री विलेख के आधार पर कभी भी घर के वास्तविक भौतिक कब्जे में नहीं आया.
कोर्ट ने माना कि अस्थायी निषेधाज्ञा का आदेश पूरी तरह से निषेधात्मक प्रकृति का था अनिवार्य नहीं. इसलिए चौकी इंचार्ज, सकरपार ने प्रतिवादी के अनुरोध के आधार पर SDO से प्रतिवादी को कब्जा दिलाने के लिए एक संयुक्त टीम बनाने का अनुरोध करके स्पष्ट रूप से अपनी शक्ति का उल्लंघन किया.
ट्रायल कोर्ट ने 05.02.2025 का आदेश पारित करने में अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है और प्रशासनिक अधिकारियों ने भी प्रतिवादी नंबर 8 को कब्जा दिलाने के लिए एक राजस्व टीम गठित करने और उसके बाद उक्त टीम के माध्यम से प्रतिवादियों, जिसमें याचिकाकर्ता भी शामिल है, को मुकदमे वाली संपत्ति से बेदखल करने में समान रूप से गलती की है.
यह प्रशासनिक शक्तियों का घोर दुरुपयोग है और पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर है. जिस जल्दबाजी में यह मामला आगे बढ़ा है, वह ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेशों और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा की गई कार्रवाई की सत्यनिष्ठा पर गंभीर संदेह पैदा करता है. परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से प्रशासनिक स्तर पर जांच की मांग करती हैं.
बेंच की टिप्पणी
Case: WRIT – C No. – 28263 of 2025 Smt. Soni Versus State of U.P. and 7