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रूल 12(8) में “25 परसेंट से ज्यादा नहीं” शब्द का इस्तेमाल, Waiting list में शामिल व्यक्ति को नियुक्त होने का कोई पूर्ण अधिकार नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, Waiting list अनिश्चित काल तक मौजूद नहीं रह सकती

Waiting list में शामिल व्यक्ति को नियुक्त होने का कोई पूर्ण अधिकार नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि Waiting list में शामिल किसी व्यक्ति को नियुक्त होने के लिए विचार किए जाने का कोई पूर्ण अधिकार नहीं है. Waiting list अनिश्चित काल तक मौजूद नहीं रह सकती या कोई विशेष चयन प्रक्रिया अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रह सकती. कोर्ट ने कहा, रिक्रूटमेंट प्रोसेस पहले ही पूरा हो चुका है. रेस्पोंडेंट्स द्वारा इस्तेमाल किया गया विवेक गलत इरादे से नहीं लिया गया है या यह मनमाना फैसला नहीं है. इसके साथ ही कोर्ट ने नीतीश मौर्य और अन्य की तरफ से दाखिल याचिकाएं खारिज कर दी हैं. यह फैसला जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की बेंच ने सुनाया ​है.

फैसला सुनाते हुए बेंच ने कहा, याचिकाकर्ताओं ने इस बात पर विवाद नहीं किया है कि घोषित रिक्तियों की 25% सीटों तक Waiting list  प्रकाशित की जा सकती है. ऐसे में, यह तर्क कि Waiting list के पांच प्रतिशत के लिए कुछ मानदंड होना चाहिए, इसमें दम नहीं है. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के अनुरोध पर, प्रतिवादियों को किसी विशेष सीमा तक नई Waiting list प्रकाशित करने का कोई निर्देश जारी नहीं किया जा सकता है. किसी भी सीमा तक Waiting list प्रकाशित करना प्रतिवादियों के विवेक पर निर्भर है.

याचिकाकर्ताओं ने विज्ञापन संख्या 01/2016 के तहत सहायक शिक्षक (एलटी ग्रेड) पदों के लिए आवेदन किया था. इसके तहत सहायक शिक्षक के रिक्त 7,950 पदों को भरा जाना था. परीक्षा और इंटरव्यू के बाद, परिणाम 2020 और 2021 के बीच घोषित किए गए. याचिकाकर्ताओं को मेरिट या शुरुआती 10% Waiting list में शामिल नहीं किया गया.

रूल 12(8) में "25 परसेंट से ज्यादा नहीं" शब्द का इस्तेमाल, Waiting list में शामिल व्यक्ति को नियुक्त होने का कोई पूर्ण अधिकार नहीं

2022 में, हाई कोर्ट ने बोर्ड को वेटिंग लिस्ट में शामिल उम्मीदवारों से सप्लीमेंट्री पैनल तैयार करके सभी बची हुई रिक्तियों को भरने का निर्देश दिया. दिसंबर 2022 में एक बाद के डिवीजन बेंच के आदेश में राज्य को खाली पदों पर डेटा इकट्ठा करने और योग्य उम्मीदवारों से विकल्प आमंत्रित करने के लिए कहा गया.

इस केस में मुख्य विवाद 1998 के नियमों के नियम 12(8) से जुड़ा था. जिसमें कहा गया है कि Waiting list खाली पदों के 25% से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए. याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि बोर्ड को उन्हें शामिल करने के लिए पूरी 25% तक की लिस्ट तैयार करनी चाहिए, जबकि बोर्ड का कहना था कि यह अनिवार्य शर्त नहीं बल्कि अधिकतम सीमा थी. 16 मई 2025 को नए बने कमीशन ने Waiting list का विस्तार करने से इनकार करते हुए एक आदेश जारी किया.

उन्होंने वेटिंग लिस्ट का साइज तय करने के लिए एक स्लाइडिंग स्केल (पदों की संख्या के आधार पर 5% से 20% तक) का इस्तेमाल किया. इसे याचिकाकर्ताओं ने मनमाना बताकर कोर्ट में चुनौती दी.

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि प्रतिवादियों ने 1998 के नियमों के नियम 12(8) के तहत अनुमत 25% सीमा तक Waiting list तैयार न करके मनमानी की. तर्क दिया कि अलग-अलग विषयों के लिए अलग-अलग प्रतिशत तय करके असंगत मानदंड लागू किए. दावा किया कि चूंकि खाली पद उपलब्ध हैं, इसलिए उन्हें नियुक्ति के लिए विचार किए जाने का अधिकार है क्योंकि वे उस मेरिट रेंज में आते हैं जो 25% की लिस्ट में शामिल होगी.

जवाब में कहा गया कि रूल 12(8) में “25 परसेंट से ज्यादा नहीं” शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जो उस परसेंट तक पहुँचने के लिए जरूरी जरूरत के बजाय एक मैक्सिमम लिमिट तय करता है. तर्क दिया कि वेकेंसी की संख्या के आधार पर खास परसेंट तय करने का फैसला समझदारी का सही इस्तेमाल था और यह कानून के खिलाफ नहीं था. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि चयन प्रक्रिया 2016 में शुरू हुई थी और भर्ती अनिश्चित काल तक खुली नहीं रह सकती.

25% सीमा तक Waiting list तैयार न करके मनमानी की. तर्क दिया

कोर्ट ने गौरव कुमार बनाम स्टेट ऑफ़ यू.पी. और अन्य (2025:AHC:32016) के फैसले पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया था कि ऐसे एप्लिकेंट को इसलिए अपॉइंटमेंट का कोई ऐसा अधिकार नहीं मिला है जिसे खत्म न किया जा सके क्योंकि वे सेलेक्शन प्रोसेस में क्वालिफाई हो गए थे. कोर्ट ने कहा, यह ज्यादा सही होगा अगर रेस्पोंडेंट्स ने वेटिंग लिस्ट का परसेंटेज तय करने के लिए एक जैसे क्राइटेरिया को फॉलो किया हो, लेकिन सिर्फ इस आधार पर कि एक जैसापन फॉलो नहीं किया गया, कोई फैसला अपने आप में मनमाना नहीं होगा.

कोर्ट ने कहा कि, पिटीशनर यह दिखाने में नाकाम रहे हैं कि किसी कानूनी नियम का उल्लंघन हुआ है. रूल्स में एक डायरेक्शन दिया गया था, जिसे पहले बरकरार रखा गया था, इसलिए, यह कोर्ट रिट जूरिस्डिक्शन में फैसले में दखल नहीं दे सकता.

केस: नीतीश मौर्य और अन्य बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. और अन्य

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