जीएसटी Appeal की समय (3 माह) सीमा साइलेंट पोर्टल अपलोड से शुरू नहीं हो सकती: HC
क्या जीएसटी Appeal कॉमन पोर्टल पर सिर्फ कारण बताओ नोटिस या एडज्यूडिकेशन ऑर्डर अपलोड करने को जीएसटी एक्ट की धारा 107 के तहत लिमिटेशन शुरू करने के मकसद से वैध कम्युनिकेशन माना जा सकता है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि, जब तक Appeal किए जाने वाले आदेश पीड़ित व्यक्ति को प्रभावी ढंग से कम्युनिकेट’ नहीं किए जाते, तब तक ऐसी अपील दायर करने के लिए तीन महीने की लिमिटेशन अवधि शुरू नहीं हो सकती. यह कमेंट जस्टिस सौमित्र दयाल सिंह और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की बेंच ने किया है.
जीएसटी एक्ट की धारा 169 की जांच की और इस बात पर जोर दिया कि, हालांकि सेवा के इलेक्ट्रॉनिक तरीकों को कानूनी तौर पर मान्यता प्राप्त है, लेकिन कम्युनिकेशन की अवधारणा को सिर्फ एक औपचारिकता तक सीमित नहीं किया जा सकता. जीएसटी पोर्टल के बारे में व्यापक शिकायतों और अलर्ट न मिलने से यह पता चलता है कि अकेले पोर्टल पर अपलोड करने पर यांत्रिक निर्भरता प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को विफल कर सकती है. नागरिकों और अन्य संस्थाओं से कर का आकलन और मांग तभी की जा सकती है, जब उन्हें सुनवाई का उचित अवसर दिया जाए. उनके Appeal के अधिकार में हल्के ढंग से कटौती नहीं की जा सकती.
दो जजों की बेंच ने किया कमेंट

दो जजों की बेंच अलग-अलग रजिस्टर्ड डीलरों द्वारा दायर कई रिट याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रही थी. इन याचिकाओं में उत्तर प्रदेश गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स एक्ट, 2017 और सेंट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स एक्ट, 2017 के तहत पारित अलग-अलग एडजुडिकेशन आदेशों को चुनौती दी गई थी.
याचिकाओं में GST कॉमन पोर्टल के माध्यम से कारण बताओ नोटिस और एडजुडिकेशन आदेशों की सर्विस और कम्युनिकेशन की वैधता, और इसके परिणामस्वरूप कानूनी अपीलीय (Appeal) उपाय से इनकार के संबंध में एक आम और बार-बार होने वाली शिकायत उठाई गई थी.
विवाद तब शुरू हुआ जब याचिकाकर्ताओं के खिलाफ यूपी जीएसटी एक्ट, 2017/ सीजीएसटी एक्ट, 2017 की धारा 73 और 74 के तहत टैक्स डिमांड वाले एडजुडिकेशन आदेश पारित किए गए. राजस्व अधिकारियों के अनुसार, कारण बताओ नोटिस और अंतिम एडजुडिकेशन आदेश GST कॉमन पोर्टल पर अपलोड करके इलेक्ट्रॉनिक रूप से दिए गए थे.
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि उन्हें इन कार्यवाही या परिणामी आदेशों के बारे में तब तक कोई जानकारी नहीं थी जब तक कि रिकवरी की कार्रवाई शुरू नहीं की गई. तब तक, जीएसटी एक्ट की धारा 107 के तहत Appeal दायर करने की कानूनी समय सीमा समाप्त हो चुकी थी.
याचिकाकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि न तो कारण बताओ नोटिस और न ही एडजुडिकेशन ऑर्डर उन्हें कभी प्रभावी ढंग से बताए गए थे. जीएसटी पोर्टल पर सिर्फ दस्तावेज अपलोड करना, बिना किसी वास्तविक जानकारी या सही सूचना के, GST एक्ट की धारा 107 के तहत संचार नहीं माना जा सकता.
Appeal की अवधि खत्म होने के बाद याचिकाकर्ताओं के पास कोई उपाय नहीं बचा था
तर्क दिया कि इस तरह के संचार न होने के कारण, अपील दायर करने की समय सीमा कभी शुरू नहीं हुई और अपीलीय उपाय से इनकार करने से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन हुआ. यह भी कहा गया कि जीएसटी व्यवस्था के तहत कठोर समय सीमा के कारण, Appeal की अवधि खत्म होने के बाद याचिकाकर्ताओं के पास कोई उपाय नहीं बचा था.
राज्य कर अधिकारियों और GSTN सहित प्रतिवादियों के वकील ने मामले की सुनवाई योग्यता पर प्रारंभिक आपत्ति जताते हुए कहा कि विवादित एडजुडिकेशन ऑर्डर जीएसटी एक्ट के तहत Appeal करने योग्य थे. यह तर्क दिया गया कि जीएसटी एक्ट की धारा 169 स्पष्ट रूप से इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से नोटिस और आदेशों की तामील की अनुमति देती है, जिसमें उन्हें कॉमन पोर्टल पर अपलोड करना और रजिस्टर्ड ईमेल पते पर इलेक्ट्रॉनिक संचार भेजना शामिल है.

प्रतिवादियों के अनुसार, एक बार जब आदेश जीएसटी पोर्टल पर उपलब्ध हो गए, तो कानून के अनुसार तामील पूरी हो गई और याचिकाकर्ता रिट क्षेत्राधिकार का इस्तेमाल करके वैधानिक अपीलीय (Appeal) उपाय को नजरअंदाज नहीं कर सकते थे. कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की इस बात पर ध्यान दिया कि उन्हें एडज्यूडिकेशन आदेशों के बारे में तभी पता चला जब रिकवरी की कार्यवाही शुरू की गई, तब तक कानूनी लिमिटेशन अवधि खत्म हो चुकी थी.
बेंच ने माना कि जीएसटी व्यवस्था के तहत अपीलीय अथॉरिटी के पास सख्त कानूनी सीमा से परे देरी को माफ करने की कोई शक्ति नहीं है, जिससे करदाताओं के पास कोई उपाय नहीं बचता. कोर्ट ने कहा कि यह नतीजा सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी फैसलों की रोशनी में और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.
कमिश्नर ऑफ कस्टम्स एंड सेंट्रल एक्साइज बनाम होंगो इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और असिस्टेंट कमिश्नर (CT), LTU, काकीनाडा बनाम ग्लैक्सो स्मिथ क्लाइन कंज्यूमर हेल्थ केयर लिमिटेड का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि यह कानून तय है कि जब कोई कानून एक सख्त लिमिटेशन अवधि तय करता है, तो अदालतें और अथॉरिटी इसे न्यायसंगत विचारों के आधार पर नहीं बढ़ा सकतीं. यह देखा गया कि, ऐसे ढांचे में, प्रभावी कम्युनिकेशन से इनकार करने से कानूनी उपाय पूरी तरह से खत्म हो जाएगा, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.
मेसर्स रिया कंस्ट्रक्शन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के अपने पहले के फैसले पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने कहा कि इसी तरह की प्रक्रियात्मक कमियों के कारण सैकड़ों समान मामले सामने आए हैं. कोर्ट ने GST एक्ट्स के तहत पास किए गए विवादित एडजुडिकेशन आदेशों को इस आधार पर रद्द कर दिया कि उन्हें याचिकाकर्ताओं को ठीक से कम्युनिकेट नहीं किया गया था. कोर्ट ने मामलों को एडजुडिकेटिंग अथॉरिटीज को वापस भेज दिया ताकि उचित नोटिस के बाद नई कार्यवाही की जा सके.
Case: M/S Bambino Agro Industries Ltd V. State of Uttar Pradesh and another; Writ Tax No. – 2707 of 2025
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