कोई भी Order जो किसी के नागरिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, उसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए
कोई भी Order जो किसी पार्टी के नागरिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, उसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए अन्यथा ऐसा Order कानून में मान्य नहीं हो सकता. इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस मदन पाल सिंह की बेंच ने कहा है कि यह स्थापित है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत अदालतों द्वारा विकसित न्यूनतम प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय हैं जो किसी व्यक्ति को न्यायिक, अर्ध-न्यायिक या प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा शक्ति के मनमाने या अनुचित प्रयोग से बचाने के लिए हैं. उनका उद्देश्य निष्पक्षता सुनिश्चित करना और अन्याय को रोकना है.

इस कमेंट के साथ बेंच ने रिवीजन करने वाले को धारा 125 सीआरपीसी के तहत कार्यवाही में भाग लेने का एक और अवसर देते हुए याचिका निस्तारित कर दी है. कोर्ट ने रिवीजनकर्ता को निर्देश दिया है कि 15 दिनों के भीतर इस Order की एक प्रमाणित प्रति के साथ लोअर कोर्ट में 20,000 रुपये लागत के रूप में जमा करे. लागत जमा करने पर, ट्रायल कोर्ट धारा 125 सीआरपीसी के तहत कार्यवाही पर पुनर्विचार करेगा और फैसला करेगा.
बेंच ने कहा कि कानून के अनुसार और सुप्रीम कोर्ट द्वारा रजनीश बनाम नेहा, (2021) 2 SCC 324 और डॉ. कुलभूषण कुमार बनाम राज कुमारी, (1970) 3 SCC 12 में दिए गए दिशानिर्देशों के आलोक में, ट्रायल कोर्ट इस आदेश की सर्टिफाइड कॉपी जमा करने की तारीख से छह महीने के भीतर कार्यवाही पूरी करने का हर संभव प्रयास करेगा.
रिवीजनकर्ता को लागत जमा करने का सबूत भी देना होगा, बिना किसी कानूनी बाधा के, अनावश्यक स्थगन दिए बिना. याचिकाकर्ता कार्यवाही लंबित रहने के दौरान मेंटेनेंस के लिए 10,000 रुपये प्रतिमाह का भुगतान नियमित रूप से करता रहेगा. 10,000 रुपये का मासिक भुगतान धारा 125 सीआरपीसी के तहत कार्यवाही के अंतिम परिणाम के अधीन होगा.
यह आपराधिक रिवीजन धारा 397/401 सीआरपीसी के तहत प्रधान न्यायाधीश फैमिली कोर्ट/फास्ट ट्रैक कोर्ट, गाजीपुर द्वारा आपराधिक विविध मामले संख्या 2149/2014 (श्रीमती जरीना बनाम शमशाद) में पारित दिनांक 07-06-2019 के एकतरफा फैसले और Order के खिलाफ दायर किया गया था.
उक्त आदेश द्वारा ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को एकतरफा स्वीकार करते हुए रिवीजनिस्ट को आदेश की तारीख से प्रति माह 10,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया. वर्तमान रिवीजन में विद्वान प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, गाजीपुर द्वारा मामले संख्या 430/2020 में धारा 126(2) सीआरपीसी के तहत पारित 09 अप्रैल 2024 के Order को भी चुनौती दी गई थी.
रिवीजनिस्ट के वकील ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने भरण-पोषण के आवेदन को एकतरफा स्वीकार कर लिया था. उक्त आदेश के खिलाफ, रिवीजनिस्ट ने धारा 126(2) के तहत एक आवेदन दायर किया, लेकिन उसे 09-04-2024 के आदेश द्वारा देरी के आधार पर खारिज कर दिया गया.
07 जून 2019 का Order एकतरफा
विपक्षी पार्टी के विद्वान वकील और राज्य के एजीए ने इस रिवीजन का विरोध किया हालांकि उन्होंने इस बात पर विवाद नहीं किया कि 07 जून 2019 का Order एकतरफा पारित किया गया था और इसे मेरिट के आधार पर तय किया जाना चाहिए था.
कोर्ट ने कहा, मैंने पार्टियों के विद्वान वकीलों द्वारा दिए गए तर्कों पर विचार किया है और रिकॉर्ड पर उपलब्ध सामग्री की जांच की है, जिसमें यहां चुनौती दिए गए Order भी शामिल हैं. यह निर्विवाद है कि फैसला और Order रिवीजन करने वाले को सुने बिना एकतरफा पारित किया गया था.
कोर्ट ने फैमिली कोर्ट गाजीपुर के आपराधिक विविध मामले संख्या 2149/2014 (श्रीमती जरीना बनाम शमशाद) में पारित एकतरफा फैसले और प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, गाजीपुर द्वारा मामले संख्या 430/2020 में पारित Order को रद्द कर दिया है.
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