Sensitive FIR को जरूरी ऑनलाइन अपलोडिंग से छूट, पीड़ित एसपी से कॉपी मांग सकता है, सुप्रीम कोर्ट 2016 में कर चुका क्लीयर

Sensitive मामलों में जहां FIR ऑनलाइन अपलोड नहीं की जाती है उनकी कॉपी पाने के तरीके को साफ करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कहा है कि ऐसे मामलों में कोई पीड़ित सीधे सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस या कमिश्नर ऑफ पुलिस को अप्लाई कर सकता है. हाईकोर्ट ने यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य में सुप्रीम कोर्ट के 2016 के फैसले में दिए गए अपवादों का जिक्र किया जो पुलिस को यौन अपराधों बगावत और आतंकवाद (Sensitive) से जुड़ी एफआईआर को राज्य सरकारों की वेबसाइट पर अपलोड करने से रोकता है.
यह टिप्पणी जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस बबीता रानी की बेंच ने एक रिट पिटीशन का निपटारा करते हुए की. याचिका में पुलिस पर परेशान करने और अधिकारियों द्वारा गोलीबारी (Sensitive) की घटना से जुड़ी एफआईआर की कॉपी देने से मना करने का आरोप लगाया गया था. याचिकाकर्ता अभिहिता मिश्रा ने आरोप लगाया कि 2 नवंबर 2025 को यूपी पुलिस के अधिकारी उसके घर में घुस आए और बिना कोई वजह बताए उसकी तीन कारों को लॉक कर दिया. उसके वकील ने दावा किया कि पुलिस कार्रवाई के बावजूद उसे किए गए जुर्म के बारे में नहीं बताया गया और न ही यह जानकारी दी गई कि पुलिस वालों ने उसकी तीन कारों को क्यों लॉक किया.
सुनवाई के दौरान संबंधित एसओ ने कोर्ट को बताया कि पुलिस कार्रवाई 31 अक्टूबर 2025 की रात की एक घटना की वजह से हुई. एक सफेद कार में सवार अनजान लोगों ने एक रेजिडेंशियल स्कूल के कैंपस में फायरिंग की थी. स्कूल के मैनेजर की शिकायत पर सीसीटीवी फुटेज देखी गई और जिन कारों की बात हो रही है वह याचिकाकर्ता के घर पर मिलीं थी. इसलिए, पुलिस ने उन्हें लॉक कर दिया. स्टेट के वकील ने कहा कि शिकायत करने वाली स्कूल मैनेजर शुरू में डर गईं लेकिन 3 नवंबर को उन्होंने इस घटना के बारे में भारतीय न्याय संहिता की धारा 109 (1) के तहत रिपोर्ट दर्ज करायी.
यह भी साफ किया गया कि क्राइम में सिर्फ एक कार शामिल पाई गई और उसे जब्त कर लिया गया जबकि बाकी दो गाड़ियों के लॉक खोल दिए गए थे. याचिकाकर्ता ने कहा गया कि किसी भी मामले में पुलिस को एफआईआर ऑफिशियल वेबसाइट पर अपलोड करना जरूरी है.
आम एफआईआर और Sensitive नेचर वाली एफआईआर के बीच फर्क क्लीयर
एफआईआर की कॉपी देने के निर्देश की अर्जी खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 2016 के फैसले में आम एफआईआर और Sensitive नेचर वाली एफआईआर के बीच फर्क क्लीयर कर दिया था. बेंच ने कहा कि सेक्सुअल अफेंस, बगावत, आतंकवाद और पाक्सो एक्ट के तहत आने वाले अपराधों से जुड़ी Sensitive एफआईआर राज्य की वेबसाइट पर अपलोड नहीं की जानी चाहिए.
“अगर केस के Sensitive होने की वजह से FIR की कॉपी नहीं दी जाती है तो उस कार्रवाई से परेशान व्यक्ति, अपनी पहचान बताने के बाद पुलिस सुपरिटेंडेंट या राज्य में बराबर की पोस्ट पर बैठे किसी भी व्यक्ति को रिप्रेजेंटेशन दे सकता है.”
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पैराग्राफ 11.8 का अंशकोर्ट ने कहा कि ऐसा रिप्रेजेंटेशन मिलने पर पुलिस अधीक्षक या मेट्रोपॉलिटन शहरों में पुलिस कमिश्नर को शिकायत को सुलझाने के लिए तीन अधिकारियों की एक कमेटी बनानी होती है और तीन दिनों के अंदर परेशान व्यक्ति को अपना फैसला बताना होता है. यह देखते हुए कि मामले में अनजान लोगों के खिलाफ जांच चल रही है हाईकोर्ट ने कहा कि पिटीशनर इस खास तरीके से एफआईआर की कॉपी के लिए अप्लाई कर सकता है. इसमें यह भी कहा गया कि इसके बाद सक्षम अथॉरिटी यह तय करेगी कि क्या याचिकाकर्ता पीड़ित व्यक्ति के तौर पर क्वालिफाई करता है जिसे एफआईआर की कॉपी दी जा सकती है.