Religion change के बाद SC स्टेटस बनाए रखना संविधान के साथ धोखाधड़ी, पूरे प्रदेश में करें जांच, 4 माह में दें रिपोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने जांच का निर्देश दिया, समन आदेश को याचिका में दी गयी थी चुनौती

गरीब लोगों को बहला-फुसलाकर धार्मिक (Religion) परिवर्तन करने के आरोपी एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामले को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य के जिला मजिस्ट्रेटों को केवल आरक्षण का लाभ उठाने के लिए अवैध जाति-आधारित धर्मांतरण (Religion) की जांच करने के लिए कहा है. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की एडमिनिस्ट्रेटिव मशीनरी को यह पक्का करने का निर्देश दिया कि राज्य में जो लोग ईसाई बन गए, वे अनुसूचित जातियों (SC) के लिए बने फायदे लेना जारी न रखें. ऐसी घटनाओं की पहचान करने और उन्हें रोकने के लिए कानून के अनुसार काम करने के लिए चार महीने की सख्त डेडलाइन तय की.
जस्टिस प्रवीण कुमार गिरी की सिंगल बेंच ने आदेश में कहा कि यूपी राज्य के सभी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट चार महीने के अंदर कानून के अनुसार काम करें और चीफ सेक्रेटरी और दूसरे प्रिंसिपल/एडिशनल चीफ सेक्रेटरी को बताएं ताकि सी. सेल्वरानी के मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के अनुसार संविधान के साथ फ्रॉड न हो.
बता दें कि सी. सेल्वरानी बनाम स्पेशल सेक्रेटरी-कम-डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर और अन्य (2024) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ईसाई धर्म (Religion) अपनाने पर कोई भी व्यक्ति अपनी असली जाति का नहीं रहता. ऐसे धर्म (Religion) बदलने के बाद सिर्फ रिजर्वेशन पाने के लिए जाति के आधार पर फायदे लेना संविधान के साथ धोखाधड़ी है.
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस प्रवीण गिरी आईपीसी की धारा 153-ए, 295-ए के तहत दर्ज एक मामले में आरोप पत्र के साथ पारित संज्ञान/समन आदेश सहित कार्यवाही को रद्द करने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे.
ईसाई धर्म (Religion) अपनाने के लिए मनाने की कोशिश करता था
बेसिकली सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट महाराजगंज ने एक ऑर्डर पास किया था जिसमें बताया गया कि आवेदक पब्लिक प्लेस बलुआही धुस चौराहा पर टेंट लगवा कर बड़ी संख्या में लोगों के बीच ईसा मसीह की प्रार्थना सभा करता था और उन्हें ईसाई धर्म (Religion)अपनाने के लिए मनाने की कोशिश करता था. डीएम के आदेश के अनुसार ऐसे कामों की वजह से कानून-व्यवस्था का उल्लंघन हुआ.
इसके बाद आवेदक के खिलाफ आईपीसी की धारा 153-A, 295-A के तहत FIR दर्ज की गई. पिटीशनर के वकील ने कहा कि जांच करने के बाद उन्हीं धाराओं के तहत चार्जशीट जमा की गई थी, जबकि गवाहों ने एफआईआर में दिए गए सरकारी वकील के बयान का समर्थन नहीं किया था.

रेस्पोंडेंट का कहना था कि कुछ गवाहों ने एफआईआर के बयान का समर्थन किया था और उनमें से एक ने यह भी आरोप लगाया था कि पिटीशनर गरीब लोगों को बहला-फुसलाकर हिंदू धर्म (Religion) के लोगों को ईसाई बनाना चाहता था. गवाह ने आगे आरोप लगाया है कि आवेदक आरोपी ने हिंदू देवी-देवताओं के बारे में गंदी, अपमानजनक और बेतुकी भाषा का इस्तेमाल किया.
“यह एक मानी हुई बात है कि Cr.P.C. की धारा 161 के तहत दर्ज गवाह का बयान सबूत नहीं है और ऐसा बयान सिर्फ ट्रायल के स्टेज पर एग्जामिनेशन-इन-चीफ और क्रॉस-एग्जामिनेशन के तौर पर शपथ पर दर्ज गवाह के बयान का खंडन करने या उसे सही साबित करने के लिए है. यह भी तय कानून है कि यह कोर्ट ट्रायल नहीं कर सकता और यह सिर्फ ट्रायल कोर्ट ही कर सकता है.”
बेंच ने समझाया
बेंच ने पाया कि याचिका में कोई दम नहीं है और इसलिए उसे खारिज कर दिया. बेंच ने यह भी साफ किया कि आवेदक अपनी सभी शिकायतें बताते हुए ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज एप्लीकेशन दे सकता है. बेंच ने एजीए की इस बात पर ध्यान दिया कि एक गवाह के बयान के अनुसार आवेदक, जो हिंदू समुदाय से था ने ईसाई धर्म (Religion) अपना लिया था और पादरी (पुजारी) का पद संभाला था.
इस एप्लीकेशन के सपोर्ट में दायर हलफनामे में उसने अपना धर्म (Religion) हिंदू बताया था. बेंच ने महाराजगंज के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को एप्लीकेंट के धर्म (Religion) से जुड़े मामले की जांच करने का निर्देश दिया और अगर वह जालसाजी का दोषी पाया जाता है तो कानून के मुताबिक उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करें ताकि भविष्य में इस कोर्ट में ऐसे एफिडेविट फाइल न किए जा सकें.
बेंच ने कॉन्स्टिट्यूशन (शेड्यूल्ड कास्ट) ऑर्डर, 1950 के संबंधित प्रोविजन्स का भी रेफरेंस दिया. जिसके तहत यह माना गया है कि हिंदू, सिख या बौद्ध के अलावा किसी और कम्युनिटी से जुड़ा कोई भी व्यक्ति शेड्यूल्ड कास्ट का मेंबर नहीं माना जाएगा. इसके अलावा, कैबिनेट सेक्रेटरी, भारत सरकार, चीफ सेक्रेटरी, यूपी सरकार को शेड्यूल्ड कास्ट, शेड्यूल्ड ट्राइब्स और अन्य पिछड़े वर्गों के मामले के साथ-साथ कानून के प्रोविजन्स को देखने और ऊपर बताए गए कानून के मुताबिक काम करने का निर्देश दिया जाता है”.
Cause Title: Jitendra Sahani v. State of U.P. (Neutral Citation: 2025:AHC:208671)
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