बैंक बाद में जारी किए गए सर्कुलर के बहाने अपने Promise से मुकर नहीं सकता, इंटरेस्ट रेट घटाकर 9.25% और 8.25% करना गलत
HC का बैंक को निर्देश, FD रसीदों पर उनकी मैच्योरिटी तारीखों से शुरू में तय रेट पर ही ब्याज कैलकुलेट करे और पेमेंट करे

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि पब्लिक सेक्टर के बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) जारी होने के बाद कॉन्ट्रैक्टेड (Promise) इंटरेस्ट रेट को पिछली तारीख से कम नहीं कर सकते. खासकर तब जब इन्वेस्टर ने रिसीट पर लिखे रिटर्न के वादे (Promise) पर भरोसा करके डिपॉजिट किया हो. कोर्ट ने साफ किया कि कॉन्ट्रैक्ट की सहमत शर्तों में एकतरफा बदलाव बैंकों और डिपॉजिटर के बीच कॉन्ट्रैक्ट की जिम्मेदारियों को कंट्रोल करने वाले कानून के तय सिद्धांतों का उल्लंघन है. यह आदेश जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की बेंच ने दिया है.
कोर्ट संविधान के आर्टिकल 226 के तहत फाइल की गई रिट पिटीशन के एक बैच पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें 2011 और 2014 के बीच पहले के ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स जिसका बाद में पंजाब नेशनल बैंक में मर्जर हो गया था द्वारा जारी कई FDR पर इंटरेस्ट रेट में एकतरफा कमी को चुनौती दी गई थी.
दो जजों की बेंच ने कहा “एक बार यह पाया जाता है कि लाभार्थी ने कोई गलत बयानी नहीं की है और उसे गलत सुझाव या परिवर्तन को दबाने के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता, जिसने एक विशेष ब्याज दर का वादा (Promise) किया था. जिस पर (Promise) निवेशक एफडीआर बनाकर पैसा निवेश करने के लिए सहमत हुआ था. बैंक बाद में परिपक्वता पर, सहमत/वादा की गई ब्याज दर (Promise) से इनकार नहीं कर सकता”.
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मनीष कुमार जैन पेश हुए. प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता जैनेंद्र कुमार मिश्रा ने किया. याचिकाकर्ताओं, जिनमें एक सेवानिवृत्त बैंक कर्मचारी के परिवार के सदस्य भी शामिल हैं, ने ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स द्वारा जारी कई सावधि जमा रसीदों में धनराशि रखी थी, 2020 में ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स के पंजाब नेशनल बैंक में मर्जर के बाद, बैंक ने बिना कोई नोटिस दिए, इंटरेस्ट रेट घटाकर एक के बाद एक 9.25% और 8.25% कर दिए.
Promise रेट पर इंटरेस्ट पेमेंट की मांग करते हुए कई रिप्रेजेंटेशन दिए
जिससे मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम पर असर पड़ा. पिटीशनर्स ने कॉन्ट्रैक्टेड (Promise) रेट पर इंटरेस्ट पेमेंट की मांग करते हुए कई रिप्रेजेंटेशन दिए. बैंक ने RBI के सर्कुलर और एक्स्ट्रा स्टाफ इंटरेस्ट बेनिफिट्स को कंट्रोल करने वाले इंटरनल क्लैरिफिकेशन का हवाला देते हुए मना कर दिया. पिटीशनर्स ने तर्क दिया कि बैंक लगभग एक दशक बाद हुए कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों को पिछली तारीख से दोबारा नहीं लिख सकता. रेस्पोंडेंट्स ने तर्क दिया कि RBI गाइडलाइंस का उल्लंघन करते हुए गलती से ज्यादा इंटरेस्ट दिया गया था क्योंकि रिटायर्ड स्टाफ मेंबर जॉइंट डिपॉजिट में प्रिंसिपल अकाउंट होल्डर नहीं था. यह तर्क दिया गया कि गलती का पता चलने पर, रेगुलेटरी नियमों के अनुसार सुधार किया गया था.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि FD पर प्रिंटेड इंटरेस्ट रेट एक बाइंडिंग कॉन्ट्रैक्ट (Promise) की शर्त है, जिसे कानूनी उम्मीद के सिद्धांत द्वारा सुरक्षित किया गया है. जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने नवज्योति को-ऑप में समझाया है. ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (1992) और यूनियन ऑफ इंडिया बनाम हिंदुस्तान डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (1993). कोर्ट ने कहा कि एक डिपॉजिटर, डिपॉजिट करते समय साफ तौर पर लिखित में दर्ज शर्तों (Promise) पर भरोसा करने का हकदार है.

डिवीजन बेंच ने एक्स्ट्रा स्टाफ इंटरेस्ट बेनिफिट्स को अपनी मर्जी से देने से जुड़े RBI के सर्कुलर पर बैंक के भरोसे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे प्रोविजन सिर्फ़ ऐसे एक्स्ट्रा बेनिफिट्स की एलिजिबिलिटी और क्वांटिटी को रेगुलेट करते हैं और बैंकों को जारी FDRs पर पहले से प्रिंटेड कॉन्ट्रैक्टेड इंटरेस्ट रेट्स को रिवाइज करने या कम करने का अधिकार नहीं देते हैं न ही वे रेट्रोस्पेक्टिवली काम करते हैं.
बेंच ने जोर दिया कि बैंक ने FDRs लेने में पिटीशनर्स पर कभी कोई फ्रॉड, गड़बड़ी या गलत जानकारी देने का आरोप नहीं लगाया और रेट्स देने में कोई भी गलती पूरी तरह से बैंक के अधिकारियों की वजह से हुई थी. ऐसी स्थिति में कोर्ट ने कहा कि बैंक इंटरनल प्रोविजन के अनुसार गलती करने वाले कर्मचारियों से नुकसान की भरपाई कर सकता था, लेकिन डिपॉजिटर्स को इंटरनल ओवरसाइट के लिए सजा नहीं दी जा सकती.
कोर्ट ने यह भी देखा कि पिटीशनर्स के परिवार से जुड़े पहले के, ऐसे ही मामलों में भी एक कोऑर्डिनेट बेंच ने पहले ही कॉन्ट्रैक्टेड इंटरेस्ट के पेमेंट का निर्देश दिया था और बैंक ने उसका पालन किया था. इसलिए मौजूदा पिटीशन्स में इसके उलट स्टैंड लेने का कोई कारण नहीं था. यह दोहराते हुए कि प्रॉमिसरी एस्टॉपेल कॉन्ट्रैक्ट वाले बैंकिंग ट्रांजैक्शन्स पर लागू होता है.
बेंच ने कहा कि बैंक बाद में जारी किए गए सर्कुलर के बहाने अपने वादे से मुकर नहीं सकता, यह कहते हुए कि बैंक बाद में, मैच्योरिटी पर, तय/वादा किए गए इंटरेस्ट रेट से इनकार नहीं कर सकता. नतीजा पिटीशन्स मंजूर कर ली गईं. कोर्ट ने रेस्पोंडेंट बैंक को निर्देश दिया कि वह पिटीशनर की फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदों पर उनकी मैच्योरिटी तारीखों से शुरू में तय रेट पर ही ब्याज कैलकुलेट करे और पेमेंट करे. काटी गई कोई भी रकम पेमेंट होने तक लागू FDR रेट पर ब्याज के साथ वापस करने का आदेश दिया गया.
Cause Title: Nem Kumar Jain & Another v. Union of India & Ors
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