कस्टडी को Possession बताकर पुलिस ने मोल ली मुसीबत
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नेशनल वुमन कमीशन फॉर वुमेन को दिया अफसरों की जांच का आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नेशनल कमीशन फॉर विमेन को उन अधिकारियों की जांच करने का निर्देश दिया है, जिन्होंने एक महिला की कस्टडी को Possession (पजेशन) के तौर पर दर्ज करके स्टे ऑर्डर को दरकिनार कर दिया था. बेंच ने सुनवाई के बाद पाया कि बंदी का यह स्टैंड साफ है कि वह (पति) के साथ जाना और रहना चाहती है. वह शादी करने और उसके साथ रहने और उन रीति-रिवाजों के अनुसार शादी करने के लिए आजाद है, जिन्हें वे दोनों सही समझते हैं. यह एक ऐसा अधिकार है जो भारत के हर बालिग नागरिक को मिला हुआ है और इसमें कोई भी दखल नहीं दे सकता.
इसमें राज्य भी शामिल है, जो बंदी के माता-पिता जैसे किसी के कहने पर काम कर रहा हो. बेंच ने हेबियस कॉर्पस पिटीशन मंजूर कर ली है.
बेंच ने पुलिस के शब्दों में हेरफेर करके स्टे ऑर्डर से बचने पर गौर करते हुए कहा कि आइडिया और एक्शन-एक्शन से ज्यादा आइडिया, दोनों ही बुरे हैं. यह सोचना कि 21वीं सदी कोई आदमी जो पुलिस में काम करता है यह सोच सकता है कि किसी इंसान को मेमोरेंडम ऑफ पजेशन (Possession) या फर्द के आधार पर कब्जा (Possession) किया जा सकता है, हमें ऐसा लगता है कि कम से कम इस ट्रांजैक्शन में शामिल लोग ड्रेड स्कॉट बनाम सैंडफोर्ड, 60 U.S. 393 (1856) के दिनों से बहुत आगे नहीं बढ़े हैं.
जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की बेंच ने यह कमेंट हेबियस कार्पस रिट पिटीशन श्रीमती सानिया बनाम स्टेट आफ यूपी एंड अदर्स की सुनवाई के दौरान किया. सुनवाई के दौरान बेंच ने संविधान के आर्टिकल 21 के तहत फंडामेंटल राइट्स के उल्लंघन को हाईलाइट करने के लिए पुराने उदाहरणों का हवाला दिया. मामला एक इंटर-रिलीजियस कपल द्वारा फाइल की गई हेबियस कॉर्पस पिटीशन से शुरू हुआ.
हाई कोर्ट के ऑर्डर के बावजूद इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर ने उसे Possession में लिया
जिसमें महिला, सानिया को एक प्रोटेक्शन होम में रखे जाने को चुनौती देने की मांग की गई थी. हाई कोर्ट के ऑर्डर के बावजूद, जिसमें पुलिस को उसे अरेस्ट करने से रोका गया था, इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर ने सितंबर 2025 में उसे कस्टडी (Possession) में ले लिया.

स्टे ऑर्डर से बचने के लिए, पुलिस ने केस डायरी में दर्ज किया कि उसे “पजेशन (Possession)” में लिया जा रहा है, और हिंदी में लिखा कि महिला को…कब्जा (Possession) पुलिस लिया जाता है. पजेशन (Possession) का एक मेमोरेंडम (फर्द) तैयार किया गया और उसके पति को उस पर साइन करने के लिए मजबूर किया गया.
कार्रवाई के दौरान महिला के पिता ने स्कूल रिकॉर्ड के आधार पर दावा किया कि वह नाबालिग है जबकि मेडिको-लीगल रिपोर्ट में कुछ और ही बताया गया था. पिटीशनर्स ने संविधान के आर्टिकल 226 के तहत हेबियस कॉर्पस का इस्तेमाल किय, जिसमें स्टे ऑर्डर और अपनी पर्सनल लिबर्टी के अधिकार का उल्लंघन करते हुए गैर-कानूनी हिरासत का दावा किया गया और मेडिको-लीगल सबूतों के आधार पर सानिया के बालिग होने का दावा किया.
सरकारी वकील के जरिए राज्य ने स्कूल रिकॉर्ड का हवाला देकर कार्रवाई का बचाव किया, जिसमें सानिया की जन्मतिथि 25 अप्रैल, 2009 बताई गई थी. जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट, 2015 के सेक्शन 94(2) के तहत ऐसे सबूतों को ऑसिफिकेशन रिपोर्ट से ज्यादा प्राथमिकता दी गई, और FIR में लालच देने के आरोपों को देखते हुए कस्टडी को बचाव के तौर पर सही ठहराया गया.
यह सब जानते हैं कि आधार कार्ड में दर्ज जन्म की तारीख किसी व्यक्ति की जन्म की तारीख का पता लगाने का कोई आधार नहीं देती है. आधार कार्ड पर लिखी जन्म की तारीखें सिर्फ परिवार के मुखिया या कार्ड बनवाने के लिए अप्लाई करने वाले व्यक्ति के कहने के लिए दर्ज की जाती हैं. इसे कॉर्पोरेशन या किसी दूसरी सक्षम संस्था से जन्म की तारीख के सर्टिफ़िकेट जैसे किसी असली रिकॉर्ड से क्रॉस-चेक नहीं किया जाता है.
बेंच ने कहा
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