पति का साथ छोड़ने वाली पत्नी 125 CrPC के तहत Maintenance का दावा नहीं कर सकती

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पत्नी केवल पति की गरीबी या आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उसे छोड़ देती है तो वह Maintenance (भरण-पोषण) की हकदार नहीं है. कोर्ट ने धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण (Maintenance) की मांग वाली पत्नी की रिवीजन पिटीशन खारिज कर दिया है. जस्टिस मदन पाल की बेंच ने दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय, चंदौली के भरण-पोषण वाद क्रमांक 82/2019 (श्रीमती गुड़िया बनाम विकाश कुमार) को सही ठहराया है जिसमें पत्नी को गुजारा भत्ता (Maintenance) देने से मना कर दिया गया था.
हाई कोर्ट ने माना कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के अपने पति से अलग रह रही थी और उसने अपनी वैवाहिक स्थिति व पहचान दस्तावेजों के संबंध में कोर्ट को गुमराह करने का प्रयास किया. ट्रायल कोर्ट के समक्ष कहा गया कि पुनरीक्षणकर्ता और विपक्षी के बीच पति-पत्नी के रूप में संबंध इतने लंबे समय तक नहीं चले, क्योंकि दोनों पक्षों और उनके परिवार के सदस्यों की सहमति से कोर्ट के बाहर पंचायत में तलाक का समझौता/समझौता निष्पादित किया गया और उस तारीख से पति-पत्नी का संबंध समाप्त हो गया.
ट्रायल कोर्ट के समक्ष पति की ओर से यह भी कहा गया है कि उक्त समझौते के निष्पादन की तारीख से दो साल बाद पत्नी ने दोबारा शादी कर ली और वर्ष 2019 में जब धारा 125 सीआरपीसी के तहत वर्तमान आवेदन दायर किया गया, तो वास्तव में पति-पत्नी के बीच का संबंध अस्तित्व में नहीं था.
ट्रायल कोर्ट के समक्ष पत्नी की ओर से कहा गया है कि कथित तलाक के समझौते की कोई कानूनी वैधता नहीं है. पत्नी की ओर से पेश अधिवक्ता ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने पति द्वारा की गई क्रूरता के आरोपों पर विचार नहीं किया. उन्होंने कहा कि पत्नी के पास अलग रहने का पर्याप्त कारण था.
Maintenance अस्वीकार किया था कि पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के अलग रह रही थी
पति की तरफ से पेश हुए अधिवक्ता ने कहा गया कि समझौते के दो साल बाद पत्नी ने किसी अन्य व्यक्ति से शादी कर ली थी, इसलिए वह भरण-पोषण (Maintenance) की हकदार नहीं है. जस्टिस मदन पाल सिंह ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि ट्रायल कोर्ट ने मुख्य रूप से इस आधार पर भरण-पोषण (Maintenance) अस्वीकार किया था कि पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के अलग रह रही थी और प्रथम दृष्टया वह जारकर्म में रह रही थी.

हाईकोर्ट ने परिवार न्यायालय द्वारा दर्ज किए गए तथ्यात्मक निष्कर्षों की पुष्टि की. इसके मुताबिक ट्रायल कोर्ट ने नोट किया था कि अपनी जिरह में पत्नी ने स्वीकार किया कि उसने खुशी-खुशी अपना ससुराल छोड़ दिया और अपने मायके लौट आई. उसने माना कि उसका परिवार अमीर था जबकि उसका पति एक गरीब परिवार से था और यह एक बेमेल रिश्ता था. उसने यह भी स्वीकार किया कि उसके पति के पास पढ़ाई के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं थे.
कोर्ट ने पाया कि 2016 में बने उसके आधार कार्ड में पति का नाम दर्ज था, लेकिन 2017 में इसमें संशोधन कराकर पति के स्थान पर पिता का नाम दर्ज करा लिया गया. 2019 में भरण-पोषण (Maintenance) का केस दाखिल करते समय पत्नी ने पुराना आधार कार्ड (पति के नाम वाला) लगाया. ट्रायल कोर्ट ने इसे स्पष्ट रूप से कोर्ट को गुमराह करने का प्रयास माना.
21 जनवरी 2019 की वोटर लिस्ट पेश की गयी जिसमें पत्नी के पति के रूप में किसी तीसरे व्यक्ति (कथित दूसरे पति) का नाम दर्ज था. पत्नी ने इससे इनकार किया, लेकिन कोर्ट ने नोट किया कि उसने इस वोटर आईडी को रद्द कराने या जालसाजी के लिए धारा 340 सीआरपीसी के तहत कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई.
इसके अतिरिक्त, ग्राम प्रधान का एक प्रमाण पत्र भी पेश किया गया जिसमें कहा गया था कि पत्नी ने 15 मई, 2018 को उक्त तीसरे व्यक्ति से शादी कर ली थी. हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह निष्कर्ष सही है कि पत्नी अपनी मर्जी से विपक्षी से अलग रह रही है.
यह कोर्ट एक रिविजनल जूरिस्डिक्शन में है. इसलिए यह सबूतों की दोबारा जांच नहीं कर सकता. सबूतों पर ट्रायल कोर्ट ने विवादित फैसला सुनाते समय विचार किया है. इसलिए, इस कोर्ट का मानना है कि यह कोर्ट सेक्शन 397/401 CrPC के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए अपने फैसले को बदल नहीं सकता. मौजूदा क्रिमिनल रिविजन में दम नहीं है और इसे खारिज किया जाता है.
जस्टिस मदनपाल, इलाहाबाद हाई कोर्टCase: CRIMINAL REVISION No. – 6348 of 2023 Smt. Gudiya V/s State of U.P. and Another
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