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‘Digital Arrest’ कर 3.29 करोड़ ट्रांसफर कराने वाले को कोर्टें जमानत न दें: सुप्रीम कोर्ट

SC का न्याय मित्र नियुक्त करने का निर्देश, पूरे देश से मंगवाई जाएंगी शिकायतें

'Digital Arrest' कर 3.29 करोड़ ट्रांसफर कराने वाले को कोर्टें जमानत न दें: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने ‘Digital Arrest’ अरेस्ट कर 72 वर्षीय हरियाणा की महिला अधिवक्ता को 3.29 करोड़ रुपये ट्रांसफर करने पर मजबूर करने वाले आरोपितों को जमानत देकर रिहा करने से अदालतों को रोक दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कोई भी कोर्ट Digital Arrest के आरोपित विजय खन्ना व अन्य सहअभियुक्तों को रिहाई का आदेश नहीं देगी. Digital Arrest के आरोपितों को कोई राहत चाहिए तो वे सुप्रीम कोर्ट आ सकते हैं. जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि असमान्य घटना के लिए असमान्य हस्तक्षेप की जरूरत होती है.

कोर्ट Digital Arrest के मामले में एक लेटर को नोटिस लेकर स्वत: संज्ञान की जा रही सुनवाई के दौरान बुजुर्ग महिला वकील को Digital Arrest करके ठगे जाने के मामले की सुनवाई कर रही थी. बेंच को लीड कर रहे जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि वह किसी के जीवन और स्वतंत्रता के खिलाफ नहीं हैं लेकिन इस मामले में असमान्य आदेश की आवश्यकता है. ऐसे मामलों से सख्ती से निपटने की जरूरत है ताकि इस अपराध में शामिल लोगों को कड़ा सबक मिले.

बेंच ने यह आदेश तब दिए जब सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट आन रिकार्ड एसोसिएशन (एससीएओआरए) की ओर से दाखिल हस्तक्षेप अर्जी का जिक्र किया गया. इसमें बुजुर्ग महिला वकील के साथ Digital Arrest के जरिये धोखाधड़ी का मुद्दा उठाते हुए अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की गई थी. एसोसिएशन के अध्यक्ष विपिन नायर ने कोर्ट को बताया कि बुजुर्ग महिला वकील की जिंदगी भर की जमा पूंजी चली गई है.

सुनवाई के दौरान जमानत की प्रक्रिया पर भी चर्चा हुई. आमतौर पर जब कोई आरोपित गिरफ्तार होता है और कानून में तय अवधि के भीतर उसके खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल नहीं होती है तो उसे विधायी तौर पर जमानत मिल जाती है. इस मामले में यही मुद्दा उठाया गया था. कोर्ट ने नायर की दलीलों पर संज्ञान लेते हुए तत्काल आदेश लिखाया कि इस मामले में आरोपित विजय खन्ना और अन्य अभियुक्तों को कोई भी अदालत जमानत पर रिहा नहीं करेगी.

Digital Arrest में अपराधी लोगों को कोर्ट और जांच एजेंसियों का भय दिखा कर डिजिटली प्रतिबंधित करते हैं

विपिन नायर ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में पुलिस आरोपियों से 42 लाख रुपये वसूल करने की स्थिति में थी लेकिन ऐसे मामलों में प्रक्रियागत शून्यता है. क्योंकि, पीड़ित के खाते में रकम जमा करने के मजिस्ट्रेट के आदेश होने के बावजूद बैंक ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया. इस पर बेंच ने कहा कि जल्द ही पूरे देश के लिए दिशा निर्देश जारी किये जाएंगे. अगली तारीख का इंतजार करिए.

नायर की दलीलों का सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी समर्थन किया. मेहता ने कहा कि उन्होंने पीड़ित बुर्जुग महिला से बात की है और पता चला कि घोटालेबाजों (Digital Arrest) ने उन्हें इस तरह भरोसे में ले लिया कि उन्होंने अपने एफडी तोड़कर पैसे दे दिये. विपिन नायर ने कहा कि ठग युवाओं को नहीं बल्कि बेखबर बुर्जुगों को निशाना बना रहे हैं और उनकी जीवनभर की जमापूंजी हड़प रहे हैं. कोर्ट ने कहा कि आप चिंता मत करिए हम कुछ करेंगे.

कोर्ट ने न्यायमित्र नियुक्त की गई एनएस नप्पिनाई से कहा कि जल्द ही कोर्ट उनसे इस बारे में एक विज्ञापन देने को कहेगा जिसमें वे लोगों से कहेंगे कि इस तरह के अपराध (Digital Arrest) के पीड़ित उनसे संपर्क कर सकते हैं ताकि इस अपराध की व्यापकता का पता चले.

सुनवाई के दौरान एक वकील ने कोर्ट को बताया कि भारत ने साइबर क्राइम के संबंध में संयुक्त राष्ट्र संघ की संधि स्वीकार नहीं की है. इस पर बेंच ने सॉलिसिटर जनरल से उस पर विचार करने को कहा. मामले में कोर्ट सोमवार 24 नवंबर को फिर सुनवाई करेगा.

बता दें कि Digital Arrest में अपराधी लोगों को कोर्ट और जांच एजेंसियों का भय दिखा कर डिजिटली प्रतिबंधित करते हैं और फिर उन्हें पैसा ट्रांसफर करने को मजबूर करते हैं. हरियाणा के ऐसे ही एक पीड़ित दंपति की चिट्ठी पर कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए सुनवाई शुरू की है. इस मामले में कोर्ट ने हरियाणा के अलावा केंद्र व सीबीआइ को नोटिस जारी किया था.

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