जांच जारी तो SC के सतेंद्र कुमार अंतिल केस के तहत जमानत देना ठीक नहीं, डॉक्टर पर लगा 10 हजार जुर्माना
हाई कोर्ट ने कहा, फैसले की गलत व्याख्या से भ्रम की स्थिति, विवेचक के खिलाफ जांच के आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि जिला कोर्ट और एडवोकेट जमानत पर सुप्रीम कोर्ट (SC) द्वारा सतेन्द्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई केस पर दिये गये फैसले की व्याख्या करने में गलती कर देते हैं. इससे भ्रम की स्थिति पैदा होती है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सतेन्द्र कुमार अंतिल मामले में सुप्रीम कोर्ट (SC) द्वारा दिये गये निर्देश केवल उन परिस्थितियों में लागू होते हैं जब विवेचना अधिकारी चार्जशीट दाखिल कर चुका हो. यह आदेश उन मामलों में लागू नहीं होता जिनमें जांच अभी जारी है.
यह कमेंट जस्टिस अरुण कुमार देशवाल की सिंगल बेंच फिरोजाबाद जिले के शिकोहाबाद थाने में दर्ज एफआईआर में कृष्ण किशन उर्फ कृष्णा की तरफ से दाखिल जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान किया. कोर्ट ने सेशन जज फिरोजाबाद की सराहना की जिन्होंने पहले आरोपी की जमानत अर्जी इस आधार पर खारिज कर दी थी कि अपराध में सात साल से अधिक की सजा दी जा सकती है.
कोर्ट ने आरोपी को इस आधार पर जमानत दे दी कि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और आरोपित की कोई क्राइम हिस्ट्री नहीं है और अब उससे पूछताछ की भी कोई जरूरत नहीं है. कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट तैयार करने में चूक पर रिटायर हो चुके डाक्टर पर दस हजार रुपये जुर्माना लगाया है और विवेचक के खिलाफ जांच करने के आदेश दिये हैं.
सतेन्द्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई केस पर सुप्रीम कोर्ट (SC) द्वारा दिये गये फैसले की व्याख्या करते हुए जस्टिस देशवाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट (SC) ने चार श्रेणियों के मामलों में यह निर्देश दिए कि फाइनल पुलिस रिपोर्ट दाखिल होने के बाद ही आरोपी की जमानत याचिका पर विचार किया जाए. उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति न्यायिक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान (JTRI) के निदेशक को भेजी जाए ताकि न्यायिक अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के 2022 के फैसले की सही व्याख्या से अवगत कराया जा सके.
केवल 308 आईपीसी में चार्जशीट क्यों दाखिल की

बता दें कि आरोपित पर भादवि की धारा 308 के तहत केस दर्ज कराया गया था. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि मेडिकल और पुलिस रिकॉर्ड में गंभीर विसंगतियां हैं. सीटी स्कैन रिपोर्ट में पीड़ित के सिर में गंभीर फ्रैक्चर पाया गया था जबकि एक महीने बाद कराए गए एक्स-रे में किसी प्रकार की हड्डी टूटने की पुष्टि नहीं हुई.
कोर्ट ने इस विरोधाभास को पूर्णतः असंभव बताया और पूछा कि जब चोट की गंभीरता हत्या के प्रयास की श्रेणी में आती थी तो विवेचक ने केवल 308 आईपीसी में चार्जशीट क्यों दाखिल की. कोर्ट ने कहा कि विवेचक ने गलत एक्स-रे रिपोर्ट के आधार पर जल्दबाज़ी में चार्जशीट दाखिल कर दी जो पहले की सीटी स्कैन रिपोर्ट के विपरीत थी.
कोर्ट ने फिरोजाबाद के एसपी को निर्देश दिया कि वे विवेचक की भूमिका की जांच कराएं और लापरवाही पाई जाए तो उचित कार्रवाई की जाए. साथ ही मुख्य चिकित्साधिकारी को यह भी जांच करने को कहा गया कि क्या एक्स-रे रिपोर्ट जानबूझकर इस तरह तैयार की गई ताकि पीड़ित की खोपड़ी में फ्रैक्चर न दिखे.
कोर्ट ने यह भी माना कि जांच करने वाले डॉक्टर की भूमिका में गंभीर लापरवाही रही. उनके रिटायरमेंट होने के कारण दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई. फिर भी अदालत ने उन पर 10,000 का जुर्माना लगाया, जो जिला विधिक सेवा प्राधिकरण फिरोजाबाद में जमा कराने का निर्देश दिया गया.
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