गांव सभा भूमि से संबंधित consolidation proceeding में राज्य को पक्षकार बनाना जरूरी
डीडीसी का आदेश रद, हाई कोर्ट ने प्रकरण वापस किया, कहा तय करें क्या उन्हें अपने आदेश पर पुनर्विचार का अधिकार है

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला दिया है कि राज्य सरकार गांव सभा की भूमि और संपत्तियों से संबंधित सभी चकबंदी (consolidation proceeding) मामलों में एक आवश्यक पक्ष है, विशेष रूप से जहां ऐसी भूमि यूपी-राजस्व संहिता, 2006 की धारा 77 (1) (एच) के तहत श्मशान भूमि जैसी सार्वजनिक उपयोगिता भूमि की श्रेणी में आती है . कोर्ट ने डीडीसी का आदेश रद कर दिया और ग्राम पंचायत की अर्जी पर निर्णय लेने के लिए पत्रावली वापस भेज दी. कहा यह भी तय करें क्या डीडीसी को अपने अंतिम आदेश पर पुनर्विचार करने का अधिकार है या नहीं.
जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की बेंच ने कहा कि एक बार जब चकबंदी अधिनियम की धारा 4 के तहत क्षेत्र अधिसूचित (consolidation proceeding) हो जाता है, तो धारा 11 (सी) के आधार पर, चकबंदी प्राधिकारी को यह निर्देश देने का अधिकार प्राप्त हो जाता है कि राज्य सरकार, गांव सभा या किसी अन्य स्थानीय निकाय प्राधिकरण में निहित कोई भी भूमि, जो उसके नाम पर विधिवत दर्ज है और उक्त परिस्थितियों में कोई भी भूमि जिसे यूपी राजस्व संहिता, 2006 की धारा 77 (1) (एच) के तहत सार्वजनिक उपयोगिता भूमि (consolidation proceeding) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, राज्य गांव सभा की भूमि से संबंधित मामले में एक आवश्यक पक्ष बन जाता है.
इसके साथ ही एकल न्यायाधीश ने उप निदेशक चकबंदी (डीडीसी), हाथरस द्वारा पारित मई 2025 के आदेश को रद्द कर दिया. इस आदेश के द्वारा 2010 के आदेश को इस तथ्य के बावजूद रद्द कर दिया गया था कि उक्त 2010 के आदेश को हाईकोर्ट ने अगस्त 2024 में बरकरार रखा था.
मामले के अनुसार यह विवाद ग्राम अमोखरी, तहसील सासनी, जिला हाथरस में स्थित एक भूमि के टुकड़े से संबंधित है , जो 1996 में चकबंदी कार्यवाही (consolidation proceeding) के दौरान याचिकाकर्ता (रवेंद्र सिंह) को आवंटित किया गया था और राजस्व अभिलेखों में उनका नाम विधिवत दर्ज किया गया था. उक्त भूमि पर आज भी उनका कब्जा है.
consolidation proceeding के खिलाफ बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी के समक्ष अपील दायर की गई
बाद में, चकबंदी कार्यवाही (consolidation proceeding) के खिलाफ बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी (एसओसी) के समक्ष अपील दायर की गई और उसे अगस्त 1999 में खारिज कर दिया गया . उस निर्णय (consolidation proceeding) के विरुद्ध एक पुनरीक्षण अपील उप- संचालक चकबंदी (डीडीसी) के समक्ष दायर की गई, जिन्होंने दोनों पक्षों को सुनने के बाद मार्च 2010 में पुनरीक्षण को खारिज कर दिया और इस प्रकार, 1999 का वह आदेश अंतिम हो गया.
हालांकि, गांव के नेतृत्व में बदलाव के बाद, नव निर्वाचित ग्राम प्रधान ने जनवरी 2025 में डीडीसी के समक्ष एक वापसी (रिकाल) आवेदन प्रस्तुत किया. यह दावा किया गया कि यह भूमि वास्तव में श्मशान भूमि (सार्वजनिक उपयोगिता वाली भूमि) थी और पूर्व में की गई चकबंदी कार्यवाही (consolidation proceeding) के कारण ग्राम सभा को 0.520 हेक्टेयर भूमि का नुकसान हुआ था.
हाथरस के जिला उपायुक्त ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली और 9 मई, 2025 को 2010 के आदेश को रद्द कर दिया. इसी आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी.
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