Transaction संदिग्ध मिलने पर बैंक से खाता फ्रीज करने का अनुरोध कर सकती है पुलिस
इलाहाबाद HC ने कहा, प्रभावित पक्ष मजिस्ट्रेट से संपर्क कर सकता है

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि पुलिस संदिग्ध Transaction की जाँच के दौरान बैंक को खाता फ्रीज करने का निर्देश दे सकती है. कोर्ट ने वादी को राहत देने से इनकार कर दिया जिसका बैंक खाता एक संदिग्ध लेनदेन (Transaction) से जुड़े मामले में जाँच अधिकारियों के निर्देशों के अनुसार फ्रीज कर दिया गया था. कोर्ट ने कहा कि प्रभावित पक्ष मजिस्ट्रेट से राहत की माँग कर सकता है.
प्रतिवादी बैंक द्वारा याचिकाकर्ता के बैंक खाते को फ्रीज करने की कार्रवाई के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई थी, जिसमें प्रतिवादी बैंक को बैंक ऑफ बड़ौदा में उसके बचत खाते को फ्रीज करने से मुक्त करने और उसे अपने खाते से राशि निकालने की अनुमति देने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था.
जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस स्वरूपमा चतुर्वेदी की बेंच ने कहा कि यदि जाँच के दौरान पुलिस इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि संदिग्ध लेनदेन (Transaction) के लिए किसी बैंक खाते को फ्रीज किया जाना है, तो वह बैंक को ऐसे बैंक खाते को फ्रीज करने का निर्देश दे सकती है.
खाते को फ्रीज करना जाँच के परिणाम पर निर्भर करेगा. प्रभावित पक्ष, जाँच पूरी होने के बाद और यदि आरोप पत्र दायर किया जाता है तो संबंधित मजिस्ट्रेट से राहत की गुहार लगा सकता है ताकि खाते को फ्रीज करने की सीमा को केवल संबंधित (Transaction) धनराशि तक सीमित किया जा सके.
Transaction राशि बैंक द्वारा फ्रीज कर दिया गया
याचिकाकर्ता के अनुसार, वह कौशाम्बी जिले के मूरतगंज ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय सखाधा में एक शिक्षिका के रूप में कार्यरत थीं. याचिकाकर्ता का वेतन बैंक ऑफ बड़ौदा में उनके बचत खाते में जमा किया जाता था. आरोप लगाया गया था कि 1 सितंबर, 2022 को फेडरल बैंक, पुथियारा शाखा (गुजरात) में खोले गए खाते से उक्त खाते में 35,000 रुपये की राशि जमा (Transaction) की गई थी. इसके बाद, याचिकाकर्ता का उपरोक्त खाता प्रतिवादी बैंक द्वारा फ्रीज कर दिया गया था.

तथ्यों के अवलोकन पर बेंच ने कहा कि याचिकाकर्ता के बैंक खाते को याचिकाकर्ता के लिए अज्ञात खाते से उत्पन्न होने वाले कथित लेनदेन (Transaction) के संबंध में जांच अधिकारियों द्वारा जारी निर्देशों के अनुसरण में फ्रीज किया गया था. संबंधित जांच एजेंसी की नजर में Transaction संदिग्ध था. पीठ ने तीस्ता अतुल सीतलवाड़ बनाम गुजरात राज्य (2018) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें बैंक खाता फ्रीज करने के संदर्भ में जांच अधिकारी की कार्रवाई को उचित ठहराया गया.
धारा 102 सीआरपीसी, जिसे अब धारा 106 बीएनएसएस के रूप में पुनः शामिल किया गया है, का उल्लेख करते हुए, बेंच ने कहा कि उपर्युक्त प्रावधान को पढ़ने से ही यह स्पष्ट है कि एक पुलिस अधिकारी जांच के दौरान आदेश पारित करके आरोपी व्यक्तियों की संपत्ति जब्त करने का हकदार है और उसका एकमात्र कर्तव्य संबंधित मजिस्ट्रेट को ऐसी जब्ती की सूचना देना है. पुलिस पर संपत्ति जब्त करने के लिए मजिस्ट्रेट से पूर्व आदेश लेने की कोई बाध्यता नहीं है.
बेंच ने कहा कि प्रतिवादी बैंक ने साइबर अपराध विभाग द्वारा जारी निर्देशों और किए गए अनुरोध के अनुसार याचिकाकर्ता के खाते को फ्रीज करके कानून के अनुसार काम किया. पीठ के अनुसार, यदि याचिकाकर्ता फ्रीजिंग से व्यथित है और अपना खाता डीफ्रीज करवाना चाहती है, तो उसके लिए ऊपर बताए गए कानून के अनुसार उचित राहत के लिए जांच अधिकारियों या सक्षम न्यायालय से संपर्क करने की स्वतंत्रता है.
पीठ को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करने के लिए कोई आधार नहीं मिला, जैसा कि प्रार्थना की गई थी. इसलिए रिट याचिका को याचिकाकर्ता को कानून के तहत उपलब्ध उपायों का लाभ उठाने की स्वतंत्रता के साथ रिकॉर्ड में भेज दिया गया.