रामपुर में CRPF कैंप पर हमले के आरोपितों को फांसी की सजा रद, 10 साल की कैद, जुर्माना लगाया
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा, अभियोजन प्रशिक्षित पुलिस द्वारा चलाया गया होता तो इस मामले का नतीजा कुछ और ही होता

यूपी के रामपुर जिले में स्थित CRPF कैंप पर 2007 में हुए आतंकी हमले के आरोपितों को फांसी की सजा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रद कर दी है. कोर्ट ने उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत दस साल की सजा सुनायी है और प्रत्येक पर एक लाख रुपये जुर्माना लगाया है. इसे जमा न करने की स्थिति में उन्हें दो साल की अतिरिक्त सजा भुगतनी होगी. फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्र और सिद्धार्थ वर्मा की बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों (CRPF कैंप पर हमले के) के खिलाफ मुख्य अपराध के लिए संदेह से परे मामला साबित करने में विफल रहा है.
बेंच ने कहा कि अभियोजन (CRPF कैंप पर हमले के) प्रशिक्षित पुलिस द्वारा चलाया गया होता तो इस मामले का नतीजा कुछ और ही होता. बेंच ने अपने फैसले में यह भी एड किया है कि राज्य को जाँच में हुई चूकों से उचित रूप से निपटने और दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध कानून के तहत कार्यवाही करने की स्वतंत्रता होगी.
यह घटना 31 दिसंबर 2007 की रात में हुई थी. हमले में CRPF के सात जवानों की मौत हो गयी थी और पांच घायल हो गये थे. कोर्ट ने कहा कि न्यायालय को यह पता लगाना होता है कि आरोपितों (CRPF कैंप पर हमले के) ने वास्तव में अपराध किया था या नहीं. लोअर कोर्ट से आरोपित मोहम्मद शरीफ, सबाउद्दीन, इमरान, शाहजाद और मो. फारूक को फांसी की सजा सुनायी गयी थी. हाई कोर्ट ने फांसी की सजा रद करते हुए पुलिस की विवेचना पर गंभीर टिप्पणी की.
कोर्ट ने कहा कि जब प्रत्यक्षदर्शी गवाह अभियुक्तों (CRPF कैंप पर हमले के) को पहले से नहीं पहचानते थे और घटना रात के अंधेरे में हुई तो जांच एजेंसी के लिए जरूरी था कि वह अभियुक्तों को बापर्दा रखती. कोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन और वकीलों की बहस सुनने के बाद पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाह जांच अधिकारी के सामने धारा 161 सीआरपीसी के तहत बयान दर्ज करने के समय और एफआईआर दर्ज करने के समय आरोपितों को नहीं जानते थे.
कोर्ट ने कहा कि हैंड ग्रेनेड को अपने पास रखना जो आर्म्स एक्ट की धारा 2(बी) के तहत एक गोला-बारूद है, आर्म्स एक्ट की धारा 7/25 के तहत दंडनीय है. आरोपी-अपीलकर्ताओं (CRPF कैंप पर हमले के) जंग बहादुर खान और मोहम्मद शरीफ के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत निशानदेही पर एके 47 हाई कैलिबर असॉल्ट राइफल की खाली मैगजीन की बरामदगी का सवाल है, हम पाते हैं कि एक खाली मैगजीन प्रतिबंधित हथियार के दायरे में आती है और इसे प्रतिबंधित हथियार माना जाएगा और इस तरह इसका कब्जा गैरकानूनी है.
कानून एक खाली मैगजीन और एक भरी हुई मैगजीन के बीच अंतर नहीं करता है. हथियार की प्रकृति और उसके घटक पर ध्यान दिया जाना चाहिए. यदि किसी हथियार को प्रतिबंधित वस्तु का एक घटक माना जाता है और इसके अनधिकृत कब्जे से आर्म्स एक्ट के तहत आपराधिक आरोप लग सकता है तो कब्जा दंडनीय हो जाता है.
CRPF कैंप पर हमले के आरोपियों के पास से आग्नेयास्त्र, हथगोले, मैगजीन और कारतूस मिले थे
कोर्ट ने कहा कि इसलिए, हमारा मानना है कि चूंकि आरोपियों (CRPF कैंप पर हमले के) के पास से आग्नेयास्त्र, हथगोले, मैगजीन और कारतूस आदि मिले थे और उनके पास शस्त्र अधिनियम की धारा 7 की आवश्यकताओं को पूरा किए बिना ये प्रतिबंधित वस्तुएं थीं, इसलिए वे शस्त्र अधिनियम की धारा 25(1-ए) के तहत अपराध करने के दोषी हैं.
अपीलकर्ताओं (CRPF कैंप पर हमले के) को शस्त्र अधिनियम की धारा 25(1-ए) के तहत किए गए अपराधों का दोषी पाते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी जाती है. हमारा इरादा अधिक कठोर दंड लगाने का था, लेकिन चूंकि वर्ष 2008 यानी घटना के वर्ष में प्रचलित कानून के अनुसार अधिकतम सजा 10 वर्ष थी, इसलिए हम खुद को कोई अधिक कठोर दंड देने से रोक रहे हैं.
हालांकि, हम अपीलकर्ताओं में से प्रत्येक मोहम्मद शरीफ, सबाउद्दीन, इमरान शहजाद, मोहम्मद फारूक और जंग बहादुर पर शस्त्र अधिनियम के तहत उनके द्वारा किए गए अपराध के लिए 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाना उचित समझते हैं. अपीलकर्ताओं द्वारा काटी गई कारावास की अवधि अपीलकर्ताओं को दी गई उपरोक्त सजा में समायोजित की जाएगी.
इलाहाबाद हाई कोर्ट

शस्त्र अधिनियम की धारा 25(1-ए) के तहत अपराध शस्त्र अधिनियम की धारा 27(3) के तहत अपराध की तुलना में एक मामूली अपराध है, जो वर्तमान अपील में साबित नहीं पाया गया है और उन्हें शस्त्र अधिनियम की धारा 27(3) के आरोप से बरी किया जाता है. शस्त्र अधिनियम की धारा 25(1-ए) के तहत आरोप के लिए प्रत्येक अपीलकर्ता (CRPF कैंप पर हमले के) पर लगाए गए 1 लाख रुपये के जुर्माने को जमा न करने की स्थिति में, अपीलकर्ताओं को अतिरिक्त दो वर्ष का साधारण कारावास भुगतना होगा.
कोर्ट ने कहा कि यदि अपीलकर्ता (CRPF कैंप पर हमले के) पहले ही दस वर्ष के कठोर कारावास की सजा काट चुके हैं तथापि, यदि उन्होंने 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा नहीं काटी है तो उन्हें सभी 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा पूरी करनी होगी. जब भी अपीलकर्ताओं को रिहा किया जाएगा, तो उनके द्वारा धारा 437ए सीआरपीसी के प्रावधानों का पालन किया जाएगा और वे तुरंत ट्रायल कोर्ट के समक्ष उपस्थित होंगे और ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के लिए आवश्यक व्यक्तिगत बांड और जमानत दाखिल करेंगे.
इस मामले से विदा लेने से पहले, हम यह जरूर कहना चाहेंगे कि अगर जाँच और अभियोजन पक्ष ज्यादा प्रशिक्षित पुलिस द्वारा चलाया गया होता, तो इस मामले का नतीजा कुछ और ही होता. जब चश्मदीद गवाह अभियुक्तों को पहले से नहीं जानते थे और घटना रात के अंधेरे में हुई थी, तो जाँच एजेंसियों के लिए गिरफ्तार व्यक्तियों को बापर्दा रखना जरूरी था. अभियोजन पक्ष को शिनाख़्त परेड की माँग करनी चाहिए थी.
हमारा यह भी मानना है कि जब मामले को परिस्थितिजन्य साक्ष्य के सिद्धांतों के आधार पर सुलझाना था, तब भी, 1.1.2008 को सीआरपीएफ कैंप के शीशों से कथित तौर पर उठाए गए उंगलियों के निशान अत्यंत सुरक्षित रखे जाने चाहिए थे. साथ ही, घटनास्थल से बरामद खाली कारतूस, आग्नेयास्त्र आदि पुलिस के मालखाने में रखे जाने चाहिए थे. समय-समय पर, राज्य सरकार और केंद्र सरकार मालखाने के संचालन के संबंध में विभिन्न नियम और अधिसूचनाएँ जारी करती रही हैं, लेकिन इस मामले में, हम पाते हैं कि पुलिस और जाँच एजेंसियों द्वारा उन निर्देशों का कहीं भी पालन नहीं किया गया.
कोर्ट
जाँच में त्रुटि मामले की जड़ तक पहुँच गई और अंततः अभियुक्तों को बरी कर दिया गया. हम अपराध की भयावहता और व्यापकता से अत्यंत चिंतित हैं और साथ ही हम यह भी कहने को बाध्य हैं कि अभियोजन पक्ष मुख्य अपराध के लिए अभियुक्त के विरुद्ध मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में बुरी तरह विफल रहा, जो कि आपराधिक न्यायशास्त्र के जाल में एक स्वर्णिम नियम है.