मृतक के dependent की गणना 1 इकाई के रूप में होगी चाहे वह बालिग हो या नाबालिग
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज की द न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी की चुनौती याचिका

सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रावधान कि मृतक के आश्रितों (dependent) की आयु पर ध्यान दिए बिना आश्रितता (dependent) की गणना एकल इकाई के आधार पर की जानी है भले ही वह नाबालिग क्यों न हो. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का हवाला देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने द न्यू इंडिया इंश्योरेंस कंपनी की तरफ से मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, रामपुर द्वारा मोटर दुर्घटना दावा याचिका संख्या 57/2023 (श्रीमती ज्योति एवं अन्य बनाम महेश पाल एवं अन्य) में पारित दिनांक 08.08.2025 के आक्षेपित निर्णय एवं पंचाट के विरुद्ध दाखिल याचिका प्रवेश के स्तर पर ही खारिज कर दी है. यह फैसला जस्टिस संदीप जैन की सिंगल बेंच ने दिया है.
दुर्घटना दावा अधिकरण रामपुर ने 15.01.2023 को हुई दुर्घटना में 18.01.2023 को संजीव कुमार की असामयिक मृत्यु के लिए दावेदारों को 7% प्रति वर्ष की दर से ब्याज सहित 23,98,774/- रुपये का मुआवजा प्रदान किया है. जिसकी क्षतिपूर्ति अपीलकर्ता बीमा कंपनी द्वारा करने का आदेश दिया गया है.
प्रकरण के तथ्यों के अनुसार घटना 15 जनवरी 2023 को थाना मिलक जनपद रामपुर के क्षेत्राधिकार में ग्राम तिराहा में मिलक बिलासपुर रोड पर हुई थी. मृतक संजीव कुमार डिलीवरी ब्वॉय के रूप में काम करता था. घटना के समय वह अपनी बाइक से सामान की डिलीवरी के बाद ग्राम डंडिया से मिलक की ओर चला रहा था. रास्ते में पीछे से आई कार ने टक्कर मार दी.
घटना में संजीव कुमार को गंभीर चोटें आईं. उन्हें गंभीर अवस्था में नवोदय अस्पताल बरेली में भर्ती कराया गया. उपचार के दौरान 18 जनवरी 2023 को उनकी मृत्यु हो गई. मृत्यु के समय मृतक की आयु लगभग 27 वर्ष थी. डिलीवरी ब्वॉय के रूप में उसे 11,000 रुपये प्रति माह वेतन प्राप्त होता था.
प्रकरण की सुनवाई के दौरान न्यायाधिकरण ने उसकी आय का आकलन संबंधित समय में अकुशल श्रमिकों को दी जाने वाली न्यूनतम मजदूरी के आधार पर किया जो 9,743 रुपये प्रति माह थी. चूंकि मृतक की आयु 40 वर्ष से कम थी इसलिए न्यायाधिकरण ने भविष्य की संभावनाओं का 40% प्रदान किया है. चूंकि चार आश्रित (dependent)थे, न्यायाधिकरण ने स्वयं के व्यय के लिए 1/4 राशि काट ली और 17 का गुणक लागू किया है.
अंतिम संस्कार के खर्च और संपत्ति के नुकसान के लिए प्रत्येक को 16,500/- रुपये प्रदान किए और मृतक की विधवा दो नाबालिग बेटों और मां प्रत्येक को 40,000/- रुपये और उपचार के खर्च के लिए 1,18,820/- रुपये का कंसोर्टियम प्रदान किया. न्यायाधिकरण ने दावेदारों को 7% प्रति वर्ष ब्याज सहित कुल 23,98,774/- रुपये का मुआवजा प्रदान किया जिसके विरुद्ध बीमा कंपनी ने अपील दायर की है.

सुनवाई के दौरान कोर्ट में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मैग्मा जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम नानू राम उर्फ चुहरू राम एवं अन्य (2018) 18 एससीसी 130 के मामले का हवाला दिया गया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि दावेदार वैवाहिक संघ, पैतृक संघ और संतान संघ के हकदार हैं और सर्वोच्च न्यायालय ने प्रत्येक दावेदार को 40,000/- रुपये का संघ प्रदान किया है.
वर्तमान मामले में, मृतक संजीव कुमार के चार आश्रित (dependent)हैं, जिनमें एक विधवा श्रीमती ज्योति, उनके दो नाबालिग बेटे श्रेयांश और शिवाय गंगवार और उनकी मां श्रीमती लक्ष्मी देवी हैं. कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने चारों दावेदारों (dependent) को 40,000/- रुपये का संघ प्रदान किया है, जिसे मैग्मा जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (सुप्रा) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानून को ध्यान में रखते हुए गलत नहीं कहा जा सकता.
अपीलकर्ता बीमा कंपनी के वकील ने तर्क दिया कि न्यायाधिकरण ने यह निष्कर्ष निकालने में गलती की है कि मृतक के चार आश्रित (dependent) थे. अधिवक्ता ने तर्क दिया कि मृतक के नाबालिग आश्रितों (dependent) को आधी-आधी इकाई के रूप में लिया जाना चाहिए, लेकिन न्यायाधिकरण ने उन्हें एक इकाई के रूप में लेने में त्रुटि की है.
यह भी तर्क दिया गया कि न्यायाधिकरण ने प्रत्येक दावेदार को 40,000/- रुपये का कंसोर्टियम प्रदान किया है जो कि नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी एवं अन्य, (2017), 16 एससीसी 680 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को ध्यान में रखते हुए त्रुटिपूर्ण है.
Dependent की गणना करने के तरीके में कोई अंतर नहीं
इस पर कोर्ट ने कहा कि हमने अपीलकर्ता बीमा कंपनी के अधिवक्ता को सुना है और अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तुत आक्षेपित निर्णय और दस्तावेजों का अवलोकन किया है. यह सही है कि उत्तर प्रदेश मोटर वाहन नियम, 1998 के नियम 220-ए(2) के अनुसार, जहाँ मृतक का कोई नाबालिग आश्रित (dependent) है, तो उसे आधा माना जाना चाहिए.

लेकिन प्रणय सेठी (सुप्रा) मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के निर्णय के अनुसार, जिसने श्रीमती सरला वर्मा (श्रीमती) एवं अन्य बनाम दिल्ली परिवहन निगम एवं अन्य (2009) 6 एससीसी 121 मामले में सर्वोच्च न्यायालय के पिछले निर्णय की पुष्टि की है, प्रत्येक आश्रित (dependent) की गणना एक इकाई के रूप में की जानी है, चाहे वह बालिग हो या नाबालिग. जहाँ तक आश्रितों की आयु का संबंध है आश्रितता (dependent)की गणना करने के तरीके में कोई अंतर नहीं है.
कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम उर्मिला शुक्ला एवं अन्य (2021) 20 एससीसी 800 के मामले में यह माना है कि यदि कोई संकेत वैधानिक साधन के रूप में उपलब्ध कराया जाता है जो अनुकूल व्यवहार प्रदान करता है तो प्रणय सेठी के मामले में लिए गए निर्णय को ऐसे वैधानिक प्रावधान के संचालन को सीमित करने वाला नहीं माना जा सकता, खासकर जब नियमों की वैधता को कोई चुनौती नहीं दी गई हो.
यह भी माना गया कि चूँकि मोटर वाहन अधिनियम एक लाभकारी कानून है, इसलिए दावेदारों को कानून के अनुसार मुआवज़ा दिया जाना चाहिए, जो उनके लिए अधिक लाभदायक हो, जिससे उन्हें बेहतर या अधिक लाभ हो.उपर्युक्त चर्चा के मद्देनजर, इस अपील में कोई दम नहीं है और यह प्रवेश स्तर पर खारिज किए जाने योग्य है.